बुधवार, 22 नवंबर 2017

अपने अपने जयपाल सिंह

प्रो गिरिधारी राम गौंझू

गोपाल दास मुंजाल और बलवीर दत्त दोनों जन्मना पंजाब (अब पाकिस्तान) के पंजाबी भारतीय लेखक, संपादक, पत्रकार, साहित्यकार और राँची निवासी हैं। दोनों जयपाल सिंह से गहरे रूप से जुड़े हुए हैं। गोपाल दास मुंजाल की 16 जनवरी 1955 अंक 3 ‘अबुआ झारखण्ड’ जयपाल सिंह विशेषांक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुई। इसमें आवरण पृष्ठ पर लिखा है - ‘मुण्डा जाति का अनमोल रत्न’ - ‘लाखों लाख झारखण्डियों के मरङ गोमके श्री जयपाल सिंह जिन्होंने राजनीतिक महारथियों को विस्मय चकित सा कर रखा है।’
और बलबीर दत्त की पुस्तक आयी झारखण्ड निर्माण के 17 वर्षों की तपस्या के उपरान्त अप्रेल 2017 में - ‘जयपाल सिंह एक रोमांचक अनकही कहानी (जीवनी, संस्मरण एवं ऐतिहासिक दस्तावेज)’ इसके अनुक्रम के कुछ प्रकरण देखिए वे जयपाल सिंह को किस नजरिए से देखते रहे हैं -
“1. जयपाल सिंह एक रोमांचक अनकही कहानी,
2. एक जीनियस का दिशाहीन सफर
3. जयपाल सिंह का रहस्मय जीवन
4. इतिहास की निष्ठुर शक्ति
5. राँची के लोगों से जयपाल सिंह की शिकायत
6. अनमोल प्रतिभा का दुरूपयोग
7. निष्ठा और साहसपूर्ण प्रतिबद्धता की कमी
8. पुस्तक में बहुत ही कड़वीं सच्चाइयाँ
9. धर्म परिवर्त्तन का डर
10. फाइनल (अमस्टरडम ओलम्पिक हॉकी 1928) में नहीं खेले जयपाल
11. क्यों नहीं बन सके आई. सी. एस. अफसर?
12. ब्रिटेन के प्रति वफादारी
13. मुख्य मंत्री (श्री कृष्ण सिंह-बिहार) से तीखी तकरार-नतीजा सिफर
14. बेकार की कसरत
15. गांधी जी की राँची यात्रा पर हड़ताल का विचित्र आह्वान
   (जयपाल सिंह का)
16. कहाँ गाँधी कहाँ जयपाल ?
17. दोनों नावों पर सवार
18. सुभाष बाबू मुझे जेल जाने से डर लगता है!
19. डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद से जयपाल सिंह की लंबी रंजिश
20. बिहारी विरोधी रवैया
21. जयपाल सिंह का मुसलिम लीग का फंड
22. सहयोगियोें की किनाराकशी
23. राँची में जयपाल सिंह के विरूद्ध विशाल भंडा फोड़ रैली।
24. आदिवासियों के विदोहन का आरोप
25. किस्मत की रोटी
26. झारखण्ड या नागपुरी प्रदेश
27. चुनाव में हारते हारते बचे जयपाल सिंह
28. तन कांग्रेस में मन झारखण्ड पार्टी में
29. भूमि अधिग्रहण व विस्थापन - कहाँ थी झारखण्ड पार्टी
30. जयपाल बनाम कार्तिक
31. जिंदगी की दो महागलतियाँ
32. मदिरा प्रेम का अनर्थ
33. नायक पूजा एक अभिशाप
34. जवानी का बुढ़ापा बनाम बुढ़ापे की जवानी
35. नेहरू ने धोखा दिया कितना सच कितना झूठ?
36. जयपाल सिंह को चुनौती: कार्यकर्त्ताओं के नाम हरमन लकड़ा का    
   खुला-पत्र।
37. झारखण्ड आन्दोलन के साथ विश्वास घात आदि“
लहलहाते धान के खेतों से कोई घास काटता है कोई धान। इन प्रकरणों से लेखक पाठकों को क्या बताना चाहते हैं?
श्री गोपाल दास मुंजाल ने - मरङ गोमके जयपाल सिंह : एक महान व्यक्तित्व की भूमिका में किन-किन विशेषणों का प्रयोग किया है देखिए --
“- नेतृत्व की अदभुत क्षमता
- महान आदिवासी
- मुण्डा जाति का वीर पुत्र
- महान व्यक्तित्व का केवल रेखा चित्र
श्री मुंजाल ने इस छोटी पुस्तक के आरंभ में जयपाल सिंह के ओलम्पिक हॉकी खेल के वर्णन से किया है --
“सन् 1928 के अमस्टरडम में होने वाले नवें ओलम्पिक में श्री जयपाल सिंह ने हॉकी खेलने में अपने जिस अद्भुत कौशल का प्रदर्शन किया था उसे देख कर खिलाड़ियों का सारा संसार बिस्मित तथा मुग्ध हो उठा था। उस दिन विश्व के महान खिलाड़ियों ने 25 वर्षीय जयपाल को एक स्वर से सारे संसार का सर्वश्रेष्ठ हॉकी खेलने वाला स्वीकार किया। जयपाल भारतीय हॉकी टीम के कैप्टन थे। इनके नेतृत्व में ही उस वर्ष भारत ने हॉकी का विश्व चैम्पियनशिप प्राप्त किया था। उस दिन प्रथम बार सारी दुनिया ने जयपाल सिंह मुण्डा को अद्भुत क्षमता के दर्शन किये थे।“(पृ0 1)
- जिस जाति ने बिरसा भगवान जैसे देश भक्त, वीर तथा त्यागी नेता को जन्म दिया था, आप उसी मुण्डा जाति के अनमोल रत्न हैं। (पृ01)
- दृढ़ चरित्र
- नेतृत्व क्षमता
- पढ़ने-लिखने की विलक्षण प्रतिभा
- छात्र-गुरु जन विस्मय भरी प्रशंसा करते थे
- अपने क्लास में सदा प्रथम आता था
- फुटबॉल का कुशल खिलाड़ी
- स्कूली हॉकी टीम का कैप्टन
- सभी हिन्दू मुसलमान ईसाई छात्र अपना नेता मानते थे।
- समाज कल्याण
- जन्म सिद्ध नेता
- दृष्टिकोण विस्तृत
- संेट पॉल राँची के प्राचार्य का कथन - प्रत्येक दृष्टिकोण से उसके
  चरित्र की श्रेष्ठता एवं दृढ़ता का मैं आरंभ से ही प्रशंसक रहा हूँ।(पृ02)
- रेव. केनोन कौसग्रेभ जयपाल सिंह की प्रतिभा से इतने अधिक
  प्रभावित तथा मुग्ध हुए कि सन् 1919 में उन्हें उच्च शिक्षा दिलाने के लिए अपने साथ ही इंग्लैण्ड ले गए।(पृ0 2)
- इंग्लैण्ड के ब्रिटिश शिक्षक एच.ए. जेम्स ने  17-6-1924 के पत्र में लिखा - “जयपाल एक अन्य  श्रेष्ठ विद्याभ्यासी  तथा दृढ़ चरित्र का युवक है। मेरा यह विश्वास है कि यह युवक जीवन के जिस क्षेत्र में भी प्रवेश करेगा, उसी क्षेत्र में यह असाधारण   सफलता प्राप्त करेगा। जयपाल में एक दीप्ति है जो इसे हर कहीं प्रकाशमान रखेगी।“(पृ02)
- इनके कॉलेज के एक प्रो0 जे. एल. स्टोक्स ने अपने 18-6-1924 के पत्र में लिखा है वह  (जयपाल सिंह)  - जब भाषण देता है तो श्रोताओं को जैसे किसी मंत्रवल से मुगध सा कर लेता है। जयपाल के वक्तव्य, श्रोताओं में एक अविचल  तथा  अखण्ड  विश्वास की सृष्टि करने की क्षमता से भरे  होते  हैं।  इसके  बोलने  का   ढंग  श्रोताओं को इस पर भरोसा रखने के लिए सशक्त रूप से प्रेरित करता है।(पृ0 3)
- श्री ध्यानचंद, श्री मैनेजर तथा श्री शौकत अली आदि भारत के प्रसिद्ध खिलाड़ी इस टीम में सम्मिलित हुए थे, श्री एलेन गोलकीपर थे। एक महान खिलाड़ी तथा कैप्टन के रूप में हमारे मरङ गोमके श्री जयपाल सिंह ने ही इस (1928 अमस्टरडम ओलम्पिक में) टीम का नेतृत्व किया था। (पृ04)
- सन् 1932 में आपको  (जयपाल सिंह को)  लोसएजेंल्स में  होने वाले ओलियम्पिक में पुनः भारतीय टीम का कैप्टन बनकर जाने का  आमंत्रण दिया गया। किन्तु  कम्पनी के  कार्यों से अवकाश  नहीं मिल पाने के कारण आप उसमें सम्मिलित नहीं हो सके। (पृ04)
गोल्डकोस्ट कोलोनी के गवर्नर श्री रोन्टोन थोमस को लिखे 4-12-1933 के एक पत्र में रेव. ए. जी. फ्रेजर एम.ए., सी.बी.ई. ने लिखा है - “यह युवक, जयपाल सिंह शिक्षा देने की अदम्य भावना तथा योग्यता से ओत-प्रोत है। यह एक श्रेष्ठ खिलाड़ी, श्रेष्ठ व्यवस्थापक, सुसंस्कृत तथा अनेक भाषाओं का विद्वान है। शिक्षक के कार्य की इसकी दक्षता असाधारण है। अपनी शिक्षा संस्था में व्यापारिक शिक्षा देने के लिए जयपाल सिंह से और अधिक योग्य शिक्षक मिलने की आशा मुझे तनिक भी नहीं है। इसकी विद्वता बहु-प्रशंसित तथा व्यक्तित्व आकर्षक है।(पृ05)
एलेक पेटरसन ने रेव. ए. जी. फ्रेजर को बधाई देते हुए लिखा - आप बड़े ही भाग्यवान हैं जो आपको अपने कॉलेज के लिए श्री जयपाल सिंह जैसे योग्य तथा विद्वान व्यक्ति प्राप्त हुए हैं। (पृ0 5)
- जयपाल सिंह के प्राचार्य रेव. केनोन कौसग्रेभ ने लिखा है - मैं भारत के अपने दस वर्षों के आवास  में जयपाल से  अधिक दृढ़ चरित्र तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व के व्यक्ति से नहीं मिला हूँ।(पृ05)
- कलकत्ता हाई कोर्ट के जज श्री टोरिक अमीर  अली ने 27-8-1936 के एक पत्र में लिखा है - ‘जयपाल  सिंह के   व्यक्तित्व में एक ऐसा शक्तिशाली चुम्बक है कि जो  व्यक्ति  एक   बार उनसे मिल लेता है फिर वह उनसे भागने की अपनी सारी शक्ति खो बैठता है।’ (पृ0 6)
- बिहार के तत्कालीन गवर्नर ने 22-3-1937 के पत्र में लिखा - ‘मुझे यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई कि आप राजकुमार कॉलेज, रायपुर में सिनियर असिस्टेंट मास्टर के पद पर नियुक्त हो कर भारत पधार रहे हैं।’ (पृ0 6)
- राजकुमार कॉलेज रायपुर के प्रिन्सिपल ने एक पत्र में लिखा है - “मैं अपने कॉलेज के शिक्षक पद के लिए जैसे व्यक्तित्व की कामना करता था उसे मैंने आप के (जयपाल सिंह के) रूप में पा लिया है। आप का अध्ययन तथा चरित्र असाधारण है।  अध्यापन के  आपके अनुभव भी अद्वितीय हैं। छात्रों पर  पड़ने वाली  आप  के व्यक्तित्व के प्रभाव की मात्रा को देख कर तो विस्मय सा होता है।(पृ0 6)
- चारों ओर एक नयी आशा की लहर नाच रही। इस विचार से कि वीर बिरसा मुण्डा के 40 वर्षों की लम्बी अवधि के बाद आज उन्हें पुनः एक दृढ़, वीर, तेजस्वी तथा विद्वान मुण्डा (जयपाल सिंह के) का ही नेतृत्व प्राप्त होगा। जनता उत्साह तथा उल्लास से भर आयी। (पृ0 8)
- जनता  ने  जयपाल  के  दर्शन  किये - गोल  चेहरे पर अन्याय के सम्मुख  कभी  नहीं  झुकने  वाली विशिष्ट मुण्डा - रेखाएँ,  सहज ही अपनी ओर खींचने वाली आकर्षक  मुद्रा,   जनता के मन में एक क्षण को भी यह नहीं आया  कि विलायती शिक्षा तथा वेश-भूषा के कारण जयपाल मुण्डा उनसे कुछ  भिन्न हो  गया है। जयपाल आदिवासियों का था और आदिवासी जयपाल के थे। (पृ0 9)
- ऐसे विलक्षण जयपाल सिंह को उसके समस्त पृथक-पृथक गुणों की विस्तृत नाप-जोख के साथ रखने के लिए मैं शीघ्र ही पृथक से एक मोटा ग्रंथ लिखूँगा। (पृ0 11)
- हम अपने उन समस्त आदिवासी भाइयों के प्रति जो देशी राज्यों, ब्रिटिश-भारत तथा संसार के अन्य  भागों  में  बस  रहे  हैं अपनी सहानुभूति प्रकट करते हैं। हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के संघर्ष में हम सब एक हैं तथा एक ही रहेंगे। (पृ0 12)
आदिवासीस्थान के विरोध में जयपाल सिंह ने कहा था - “मुझे भय है कि अपने आप को इस तरह पृथक रखने की कोई भी चेष्टा अन्ततः हम आदिवासियों के लिए घातक सिद्ध होगा। हमें भारत के सम्पूर्ण राष्ट्रीय जीवन में (उसके एक अंग की तरह) अपने लिए एक पृथक प्रान्त चाहिए। जिसका प्रशासन हमारे हाथ में हों तथा हम अपनी संस्कृति के अनुरूप ही जिस प्रशासन के द्वारा अपनी आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक स्थिति को अपने ढंग से उन्नत कर सकें।“ (पृ0 12)
- इग्नेस बेक का कहना  है -  मेरा  विश्वास  है  कि आदिवासियों में जयपाल के अतिरिक्त अन्य कोई भी  व्यक्ति  सच्चाई  तथा निर्भीकता का प्रदर्शन  इतने उच्च स्तर पर नहीं  कर  सकता   था।“ (पृ0 13 - मुख्यमंत्री बिहार श्री कृष्ण सिंह  के  बंगले  में   जयपाल के उद्गार के संबंध में)।
मरङ गोमके जयपाल सिंह के विरोधियों के उदृगार को भी श्री गोपाल दास मुंजाल ने इस प्रकार रखा है -- “सारे बिहार में राजनैतिक विरोध  जितना  जयपाल सिंह का हुआ है, उतना अन्य किसी  भी दूसरे  नेता का  नहीं  हुआ  है।  -  विरोधी राजनैतिक संस्थाओं के समाचार  पत्र  इन्हें अपने मन पसंद की, तरह तरह की उपाधियाँ  (गालियाँ)  देते  रहे हैं - 1. जयपाल प्रतिक्रियावादी हैं, 2. जयपाल बिहार  का  राजनैतिक  शत्रु  न  एक,  3.  जयपाल  बिहार  का राहू,
4. राजनैतिक खिलाड़ी  इत्यादि।  किन्तु जयपाल ने कभी इस ओर ध्यान  भी  नहीं दिया, वह अन्धड़ और तूफान की गति से अपने रास्ते चलते चला। उसका विचार  है कि जो लोग जान बूझ कर आदिवासियों  की  उन्नति के  मार्ग में रोड़े अटकाए हुए हैं वे ही प्रतिक्रियावादी हैं,  वे ही  मानवता  के राहू हैं वे बिहार का सत्यानाश करने पर तुले हुए हैं तथा भारत के सबसे बड़े शत्रु भी वे ही हैं।“
आदिवासियों को झारखण्ड में आदिवासियों की तरह रहने तथा जीने का पूर्ण अधिकार है। “वे बिहार के गुलाम बन कर नहीं रहेंगे।“ श्रीजयपाल सिंह का यही नारा है - वे यही चाहते हैं क्या दुनियाँ का कोई भी न्याय पसन्द व्यक्ति यह कह सकता है कि जयपाल की यह मांग, आदिवासी महासभा का यह सिद्धान्त, झारखण्ड पार्टी का यह नारा अनुचित है। क्या देश के स्वतंत्र नागरिक की तरह जीने के अधिकार की चाहना प्रतिक्रियावादिता है। क्या अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाना देश की शत्रुता हैं यही वे प्रश्न हैं जो श्री जयपाल सिंह बार-बार अपने उन भाइयों के सम्मुख रखते हैं जो उन्हें प्रतिक्रियावादी, राहु तथा देश का शत्रु नम्बर एक कहते हैं।(पृ0 13)
- निकट रहने  वाले  साथियों  का  कहना है  -  समय आया है जब जयपाल लगातार तीन-तीन दिनों तक भूखे  रह  गए हैं।   चने फांक कर पानी पी लिया है।  किसी को कहा  तक नहीं और अपनी तूफानी गति से कार्य करते रहे हैं।  आज  झारखण्ड  क्षेत्र के प्रत्येक घर में जिस राजनीतिक चेतना का स्फुरण दिखलायी  दे   रहा है वह सब केवल जयपाल सिंह के महान व्यक्तित्व अथक   श्रम  तथा इनके राजनीति की अद्भुत सूझ-बूझ के द्वारा ही संभव हो पाया है। (पृ0 14)
- पंडित जवाहर लाल नेहरू  को  संबोधित  करते  19-12-1946   के संविधान सभा में जयपाल सिंह ने कहा था - “हम चाहते हैं कि हमारे साथ ठीक वैसा ही वर्त्ताव किया जाए जैसा कि अन्य   किसी भी दूसरे भारतीय  के  साथ  किया  जाता  है। ----   भारत  के गैर आदिवासियों के द्वारा  परिचालित  विद्रोहों तथा   अराजकता के  द्वारा निरंतर शोषित तथा विस्थापित किए  जाना   ही मेरे  लोगों का सम्पूर्ण इतिहास है। फिर भी  मैं  पंडित जवाहर लाल नेहरू  के  वचन  पर विश्वास करता हूँ ----- अब  हम   अपने  जीवन का एक नया अध्याय आरंभ करने जा रहे हैं -   स्वतंत्र भारत का एक नया अध्याय, जहाँ सब लोगों को समान सुअवसर है,  जहाँ कोई  भी  उपेक्षित नहीं रहने पाएगा। मेरे समाज में जाति भेद का कोई प्रश्न नहीं हैं। हम सब बराबर हैं। (पृ0 14-15) आइए हम सब देश की  स्वतंत्रता  के  लिए साथ ही जूझें, साथ-साथ बैठे तथा साथ ही साथ काम करें। तभी हम वास्तविक स्वतंत्रता को प्राप्त करेंगे। (पृ0 15)
- झारखण्ड पार्टी  की  स्थापना  ने  झारखण्ड  क्षेत्र के  जन  जन में राजनैतिक चेतना की भेरी फूँक दी। --- प्रत्येक व्यक्ति   ‘झारखण्ड एक पृथक प्रान्त’  के  नारे से  गुंजायमान हो  रहा है।   इस  सम्पूर्ण जागृत, चेतना तथा उल्लास के पीछे जो शक्ति है,   वह  शक्ति  इस महान मुण्डा जयपाल सिंह के जादू भरे व्यक्तित्व की  ही है। (पृ0 15)
- भारत के प्रधान मंत्री  पंडित जवाहर लाल नेहरू  आप  के (जयपाल सिंह के) गुणों पर मुग्ध हैं तथा आप  का  बहुत  सम्मान   करते  हैं। दिल्ली के राजनैतिक तथा  सरकारी क्षेत्रों में किसी   महत्वपूर्ण पद पर कार्य करने वाला शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो   जो  इन्हें (जयपाल सिंह को) नहीं जानता हो तथा इनसे प्रभावित नहीं हो। (पृ0 15)
भारत स्थित विदेशी राजदूतों में से प्रायः सब के सब इनके प्रशंसक तथा मित्र हैं। हमारे मरङ गोमके दिल्ली के राजकुमार हैं। (पृ0 16)
ये कुछ उद्गार है जयपाल सिंह विशेषांक अबुआ झारखण्ड पत्र के जो श्री गोपाल दास मुंजाल द्वारा लिखे तथा संकलित किए गए हैं। दूसरी ओर बलबीर दत्त की जयपाल सिंह पर 54 वर्षों के कठिन अन्वेषण के बाद (37$17 वर्ष) प्रकाशित हुआ है। दोनों एक पंजाब (पाकिस्तान) के संपादक, पत्रकार तथा साहित्यकार हैं। दोनों तराजू के पलड़े पर तौल कर देखे मरङ गोमके जयपाल सिंह क्या हैं।





मंगलवार, 14 नवंबर 2017

बिरसा का गांव

सरवदा चर्च पर पहला तीर चलाया गया
खूंटी गांव कांप उठा।
डिप्टी कमिश्नर आए।
वह बिरसा का पीछा कर रहे थे।
बुद्धिमान लोग (बिरसा के अनुयायी) डोम्बारी पहाड़ पर चले गए।
उन लोगों ने  (ब्रिटिश सैनिकों का) मुंह बनाया
और चुनौती दी।
फौजों (ब्रिटिश) ने उन पर गोलियां चलाईं।
एक मुंडा बच्चा जमीन पर गिरी अपनी मृत मां का दूध पीने की 
कोशिश कर रहा था।
 (अंग्रेज) महिला (डिप्टी कमिश्नर की पत्नी) बहुत द्रवित हुई।
बच्चे का क्या हुआ?
यह कोई खुशी की बात न थी।
रांची से जब मुरहू प्रखंड होते हुए सुदूर उस सरवदा गांव में पहुंचे, जहां 1881 से विशाल चर्च खड़ा हुआ था, तो अचानक 117 साल पहले रचित यह गीत कानों में गूंजने लगा। बिरसा की बहादुरी में रचित यह गीत अपने समय का इतिहास भी दर्ज करता है। जब यह चर्च बना, तब खूंटी जिला नहीं बना था। वह रांची का अनुमंडल भर था। आज जरूर ताज्ज्बुब करेंगे, जब यह चर्च बना। उस समय इतनी आबादी भी नहीं रही होगी और जाने का रास्ता तो अब बना है। उस समय, मिशनरियों के विश्वास और धैर्य को याद कीजिए। यहीं पर जर्मन के विद्वान फादर हाफमैन रहते थे, जहां दो बार बिरसा के अनुयायियों ने हमला किया था। चर्च के पीछे ही वह ऐतिहासिक पहाड़ी सिंबुआ है, जहां बिरसा की बैठकें भी होती थीं। यहां रह रहे फादर जेवियर केरकेट्टा कहते हैं कि इसे बनाने के लिए कलकत्ते से बैलगाड़ी से लादकर सामान यहां आया था। करीब सौ फीट से ऊंची इसकी मीनार होगी, जो दूर से ही दिखाई देती है। सरवदा का चर्च आज भी खड़ा है और उसके परिसर में कई पत्थगड़ी में वहां का इतिहास भी दर्ज है। यहीं पर उसी समय का एक स्कूल भी है, जहां के बच्चे नंगे पैर हॉकी स्टीक लेकर दो मैदानों में एक छोर से दूसरे छोर तक दौड़ते हुए एक दूसरे को हराने के लिए पसीना बहाते हैं। फादर बाद में जर्मनी चले गए, लेकिन जाने से पहले उनका तीन महत्वपूर्ण योगदान को याद करना चाहिए। पहला, बिरसा की शहादत के बाद अंग्रेजों ने जो कानून बनाया, छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम-1908। इसमें फादर का ही मुख्य काम है। दूसरा, उन्होंने छोटानागपुर काथलिक मिशन कॉपरेटिव क्रेडिट सोसाइटी की स्थापना 1909 में की और 1928 में मुंडारी विश्वकोश तैयार किया। सरवदा चर्च के एक कमरे में उनकी किताबें धूल फांकती मिल जाएंगी और उनकी तस्वीर भी, जिसे दीमक अपना निवाला बनाने का आतुर दिखे।
खैर, यहां बच्चों का उत्साह चरम पर था। उनका खेल देखने लायक था, लेकिन हमारे राज्य के खेल विभाग को इन गांवों में देखने को फुर्सत नहीं है। खेल विभाग का पैसा कहां खर्च होता है, वह विभाग ही जानता है। यह वह इलाका है, जहां अपराधियों का बोलबाला है। नक्सली हैं, माओवादी हैं। युवाओं के पास कोई काम नहीं है।
यह नजारा सरवदा से लेकर उलिहातू और डोंबारी गांव तक दिखा। सरवदा से जब बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू पहुंचे तो यहां भी युवा ताश के पत्ते फेंट रहे थे। जन्म स्थली पर ताला लटका हुआ था और बाहर बिना ड्राइवर एक एंबुलेंस खड़ी थी। सरकार का पूरा विकास यहीं दिखता है। बिरसा के वंशजों का घर पक्का का बन गया है और खूंटी से उलिहातू तक की सड़क तेजी से फोरलेन बन रही है। बाकी गांव, अपनी किस्मत पर जी रहा है। बकरियां सुस्त पड़ी थीं। एक महिला धान ओसा रही थी। एक बच्ची एक बच्चे को चुप करा रही थी। गांव में बना बिरसा मुंडा परिसर चमक रहा था। यहां बिरसा की प्रतिमा को सोने की चमक दे दी गई थी। सूरज की किरण पड़ते ही प्रतिमा की आभा देखते बनती थी। सरकार ने यहीं विकास किया है।
लेकिन उलिहातू से जब डोंबारी बुरू जाएं तो फिर विकास दूर-दूर तक नजर नहीं आता। यहां डॉ रामदयाल मुंडा व जगदीश त्रिगुणायत के प्रयास से डोंबारी बुरू पर 100 फीट का एक स्मारक बनाया गया है। यहां पहाड़ तक एक पतली सड़क जाती है। यह उसी समय की बनी है। इसके बाद सरकार ने ध्यान नहीं दिया। यहीं पर सौ बेड का अस्पताल भी बनना था, लेकिन आज तक नहीं बना। मुख्य सड़क से डोंबारी बुरू की दूरी करीब दस किमी है, लेकिन इस दस किमी में विकास कैसा हुआ, कहां हुआ, यह दिख जाता है। जैसे, यह इलाका अभी भी सौ साल पहले की अवस्था में जी रहा है। गांव से लौटते हुए फिर एक गीत याद आने लगा-

डोंबारी पहाड़ी पर बिरसा के अनुयायी इक_े हुए
नीचे घाटी में गोरे सिपाही बड़ी तादाद में जमा थे।
बिरसा के अनुयायी उनकी खिल्ली उड़ा रहे थे, उन्हें चुनौती दे रहे थे, 
गोरे सिपाहियों ने हड़बड़ी में गोली चलाई...। 

खैर, लोग उनके शहादत दिवस नौ जून और 15 नवंबर, उनके जन्म दिवस पर यहां मेला लगाते हैं। नौ जनवरी को भी यहां भारी संख्या में लोग जुटते हैं, क्योंकि अंग्रेजों ने नौ जनवरी 1900 को हजारों मुंडाओं का बेरहमी से नरसंहार कर दिया था। इसमें महिलाएं और बच्चे काफी संख्या में कत्ल किए गए थे। इस पहाड़ी पर बिरसा मुंडा अपने प्रमुख 12 शिष्यों सहित हजारों मुंडाओं को जल-जंगल-जमीन बचाने को लेकर संबोधित कर रहे थे। आस-पास के दर्जनों गांवों से लोग एकत्रित होकर भगवान बिरसा को सुनने गए थे। बात अभी शुरू ही हुई थी कि अंगरेजों ने डोम्बारी बुरु को घेर लिया। हथियार डालने के लिए अंगरेज मुंडाओं को ललकारने लगे। लेकिन मुंडाओं ने हथियार डालने की बजाय शहीद होने का रास्ता चुना। यहां डोंबारी बुरु की तलहटी में एक मंच बना है। इसके साथ पत्थलगड़ी भी की गई है। पत्थलगड़ी नौ जनवरी 2014 को किया गया है। इस पर नौ जनवरी 1900 को शहीद हुए लोगों के नाम की सूची है-
हाथीराम मुंडा, गांव गुटुहातु, मुरहू
हाड़ी मुंडी,  गांव गुटुहातु, मुरहू
सिंगराय मुंडा, बरटोली, मुरहू
बंकन मुंडा की पत्नी जिउरी, मुरहू
मझिया मुंडा की पत्नी, मुरहू
डुन्डुन्ग मुंडा की पत्नी, मुरहू।
 --------------

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

गांधी चबूतरा

  गांधी के आने की खबर आग की तरह फैल गई थी।  
  देश में आजादी का आंदोलन चल रहा था। गांव-शहर-कस्बे इस आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने में पूरी तरह मुब्तिला थे। दिल्ली से बहुत दूर गाजीपुर जिले का जमानियां स्टेशन भी अंग्रेजों की गुलामी के जुए को उतार फेंक देना चाहता था। आंदोलन दर आंदोलन जारी था। पड़ोस में धानापुरकांड हो चुका था। आजादी के सिपाहियों ने थाने पर यूनियन जैक उतारकर तिरंगा लहरा दिया था। गरम और नरम दल दोनों अपने-अपने ढंग से देश को आजाद कराने में सक्रिय थे। गान्ही बाबा का अलग प्रभाव था। उनकी छवि ज्यादा प्रभावित कर रही था। तन पर महज एक कपड़ा। उन्हें लोग महात्मा ठीक ही कह रहे थे। लोग सोचते, असल महात्मा यही हैं। वे नहीं, जो मठों-मंदिरों मंे बैठकर रामनाम गाते हुए आडंबरपूर्ण जीवन जीते हुए अपनी तोंद बढ़ा रहे हैं। हवा में करो या मरो की अनुगूंज साफ सुनाई देने लगी थी। आंख मचियाते हुए एक सुबह जब सूरज अपनी आंखें खोल रहा था तभी जमानियां स्टेशन में उड़ती खबर कहीं से आई कि महात्मा गांधी टेन से पटना की ओर जा रहे हैं। किस टेन से, यह ठीक-ठीक पता नहीं था। लेकिन खबर पक्की थी। गान्ही बाबा के दर्शन का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा- प्यारे लाल ने सोचा। लेकिन दिक्कत यह थी कि गाड़ी रुके कैसे?
   खबर के बाद कुछ उत्साही युवाओं ने टेन को प्लेटफार्म पर रोकने की सोची ताकि महात्मा गांधी का दर्शन लाभ मिल सके। स्टेशन छोटा था, लोग छोटे थे, लेकिन सपने बड़े थे। सोचने का सिलसिला शुरू हुआ तो आखिर में गाड़ी को रोकने की तरकीब मिल ही गई। इसके बाद तो सैकड़ों लोग स्टेशन पर दर्शन करने के लिए जमा हो गए। गाड़ी के आने की सूचना घंटी द्वारा मिल चुकी थी। थोड़ी देर बाद गाड़ी की खबर होते हुए सिग्नल भी हरा हो गया। अब इसे लाल करना था ताकि गाड़ी रुक सके। कुछ उत्साही प्लेटफार्म से दूर, दक्षिणी छोर पर सिग्नल पोल के नीचे खड़े हो गए और किसी तरह तरकीब निकालकर हरा सिग्नल को लाल कर दिया। उत्साह और बढ़ गया। सिटी बजाती हुई दूर से टेन दिखाई देने लगी। सिग्नल लाल देखकर आखिरकार टेन आहिस्ते-आहिस्ते प्लेटफार्म को छूती हुई रुक गई। गान्ही बाबा की जय, महात्मा गांधी की जय से स्टेशन का प्लेटफार्म गूंजने लगा। सैकड़ों की संख्या में लोग महात्मा का दर्शन करने आए थे। उत्साह की कोई सीमा नहीं थी, लेकिन इस उत्साह में स्टेशन मास्टर के हाथ-पांव फूलने लगे। जिस गाड़ी का यहां ठहराव ही नहीं था, और जिसमें महात्मा गांधी सफर कर रहे हों, वह बिना ठहराव के प्लेटफार्म पर बिना किसी पूर्व सूचना के रुक गई थी। इधर, जयकारा और नारा और तेज होने लगा। तब किसी तरह गान्ही बाबा अपनी लाठी लिए चिरपरिचित अंदाज के साथ बोगी से बाहर आए और ‘दर्शन’ देकर फिर बोगी में समाने लगे, तभी नाटे कद के महावीर जायसवाल ने समय की नजाकत भांपते हुए गांधीजी से एक फरियाद कर दी।
 -महाराज इहां की पुलिस बहुते तंग करती है। जेहल भेजने की धमकी देती है।
गांधीजी अचानक इस फरियाद की अपेक्षा नहीं किए थे। उन्हांेने भी तुरंत सादे कागज की फरमाइश कर दी-
कागज दो-गांधी जी ने कहा।
महावीर ने तत्काल एक कागज का टुकड़ा और कलम भी मौके की नजाकत को देखते हुए थमा दिया। जैसे पहलेे से इसका अंदेशा हो...।
 गांधीजी ने लिखकर उस को वापस कर दिया।
 चीट पर बस इतना ही लिखा था, इन्हें तंग न किया जाए। नीचे संक्षित हस्ताक्षर था-‘गांधी’।
  ये महावीर जायसवाल थे, जिनका पेशा अखबार बांटना था। उस समय ‘आज’ की एकमात्रा अखबार था, जो बनारस में छपता था और 70 किमी दूर जमानियां टेन से पहुंचता था। महावीर यही काम करते थे। 1947 का समय आया और देश आजाद हुआ। आजादी के बाद महावीर जायसवाल ने जुगत भिड़ाकर सरकारी कोटे की दुकान ले ली। पर अखबार बेचने का काम भी साथ-साथ चलता रहा। कोटे के दुकान से कभी-कभी घटतौली भी जाने-अनजाने हो जाया करती थी। गरीब-गुरबा शिकायत करती तो पुलिस आती और फिर महावीर गांधीजी का वही चीट दिखा देते, फिर पुलिस कुछ नहीं बोलती और चुपचाप चली जाती। उसे लगता कि इस आदमी की पहुंच बहुत दूर तक है। गांधीजी दुनिया में नहीं थे, उनकी चीट महावीर के लिए किसी सनद से कम नहीं थी। तो महावीर का आजादी में कुल योगदान यही था, उन्होंने जमानियां वालों को गान्ही बाबा का दर्शन करा दिया था।
 इस तरह उस ऐतिहासिक घटना की याद में उस छोटे से बाजार में एक चबूतरा गांधीजी के नाम पर बन गया। चबूतरा एक तिराहे पर सड़क के किनारे बना, जिसे लोग चौक नाम देते थे। पर, रास्ता तीन ओर ही जाता था, और इन तीन के अलावा एक गली की ओर भी रास्ता खुलता है। शायद, गली को भी इसमें जोड़ दिया गया। इसलिए, लोग उसे चौक ही पुकारते हैं।
  लंबा अरसा गुजर गया। इस बीच कितने बसंत आए, चले गए। कई शरद की ऋतुएं आईं और चुपचाप चली गईं। पर 1998 का साल कुछ और था। शरद की शाम थी। दुर्गापूजा को लेकर बाजार में चहल-पहल बढ़ गई थी। स्टेशन के पास मां दुर्गा का पंडाल सजा था। सप्तमी की तिथि थी। मां का पट खुल चुका था। एक ओर महिलाओं की लाइन लगी थी और एक ओर पुरुाों की। डॉ ईश्वरचंद्र जायसवाल, जो डॉक्टरी कम, समाजसेवा ज्यादा करते थे, अग्रिम पंक्ति में खड़े मां का ध्यान कर रहे थे। हाथ जोड़े। आंख बंद। मन ही मन संस्कृत के श्लोक ओठों से बुंदबुंदा रहे थे कि  भक्तों का प्रसाद चढ़ाने वाले पंडाल के एक स्वयंसेवक सतीश ने उनके कंधे को हिलाते हुए आहिस्ते से उनके कान में बोला...ऐ डॉक्टर, डॉक्टर...;
  डॉक्टर ने अचकचाकर अचानक आंख खोली। बोला-तोहके पुलिस खोजत बा। यह सुनते ही डॉक्टर को जोर का धक्का बहुत जोर से लगा। सांस तेज हो गई और दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।...डॉक्टर सोच रहे थे, प्रसाद देने के लिए झकझोर रहा है। पर पुलिस का नाम सुनते ही डॉक्टर के होश उड़ गए। नवरात्रा-दशहरा का समय और इधर पुलिस...। डॉक्टर के शरीर का रक्तसंचार अचानक जैसे रुक गया। चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। थोड़ी देर पहले से उत्सव का जो रौनक उनके चेहरे पर था, गायब हो गई। चेहरा जैसे पीला पड़ता जा रहा था....। आस-पास जलती हजारों झालरों की लाइटें अचानक बुझती प्रतीत हुईं। चारों ओर अंधेरा पसरने लगा। भक्तों की भीड़ का शोर भी निर्जन वन की तरह सांय-सांय करने लगा। डॉक्टर अपने बेजान पैरों से किसी तरह चुपचाप पंडाल से निकले और मुख्य मार्ग छोड़कर स्टेशन के रास्ते छिपते-छिपाते घर में समा गए। फिर घर का दरवाजा बाहर से भी बंद कर दिया। पत्नी ने बाहर से ताला लगा दिया। कोई आकर पूछता, डॉक्टर हैं, घर के भीतर से आवाज आती, नहीं...। मरीज देखने गए हैं। डॉक्टर की आंखों से नींद गायब थी। सांसें रह-रहकर धोखा दे रही थीं। सिर बहुत भारी हो रहा था। सोच रहे थे, किस मुसीबत मंे पड़ गए हैं। जो भीे काम हाथ में लेते हैं, कोई न कोई विघ्न आ ही जाता है....।      
 सन् 1997 में जब देश में आजादी की पचासवीं वर्ागांठ मनाई जा रही थी जो जमानियां में इसका भव्य आयोजन उसी चौक पर हुआ, जहां एक ओर बिना गांधी के पिरामिड आकार का पांच फीट का चबूतरा खड़ा था। बुजुर्ग लोग कहते, यह चबूतरा उसी घटना की याद में बनाया गया, लेकिन चबूतरा के बाद ऐसा कभी संयोग ही नहीं आया कि उस पर कोई गांधी की प्रतिमा स्थापित हो सके। इसी साल प्रज्ज्वलित सेवा संस्थान ने एक पत्रिका निकालने की सोची और इसी साल यह संकल्प भी लिया गया कि यहां अब गांधी लंबे समय तक वनवास नहीं भोगेंगे। अब वनवास खत्म हो गया और यहां गांधीजी की प्रतिमा स्थापित होकर रहेगी। इस तरह योजनाएं बनने लगीं। इटिंग-मीटिंग के चले लंबे दौर के बाद निर्णय हुआ कि इस नगर पालिका को भी शामिल कर लिया और पालिका के अध्यक्ष से गांधीजी की प्रतिमा ली जाए, बाकी खर्च संस्थान व्यवस्था करेगा। नगर पालिका से बातचीत हो गई। वह तैयार हो गया और इस तरह उसने गांधीजी की आवक्ष प्रतिमा बनवाकर पानी टंकी के कार्यालय में रखवा दिया। इधर, संस्थान ने चबूतरे पर संगमरमर लगवा दिया और एक संस्थान का शिलापटृ भी। नगर पालिका के शिलापटृट के लिए सबसे उ$पर जगह छोड़ दिया गया था। अब सारी तैयारियां अंतिम दौर में पहुंच गई थीं कि नगर पालिका के अध्यक्ष को किसी ने समझा दिया कि चबूतरे पर संस्थान का कोई शिलापट्ट नहीं लगेगा। नगर पालिका का लगेगा। अध्यक्ष भी बहकावे में आ गए। बहुत समझाने पर भी अध्यक्ष नहीं मानंे। पानी टंकी के कार्यालय में, जो निगम का एक तरह से उस समय अस्थायी कार्यालय हुआ करता था, उसमें संस्थान और नगर पालिका के प्रतिनिधि के अलावा मंदिर समिति के लोग साथ बैठे, लेकिन कोई हल नहीं निकला। मंदिर समिति के अंदर ही चबूतरा आता था। इसलिए वह भी एक पक्ष था। नगर पालिका के प्रतिनिधि ने संस्थान की ओर व्यंग्य मारा--नगर पालिका एक बड़ी संस्था है। टेबल पर रखे चाय का कुल्हड़ की ओर इशारा करते हुए जोड़ा, और आप इस कुल्हड़ की तरह?? यह बात मिर्ची की तरह लग गई। मामला बहुत गर्म हो गया...। नगर पालिका के प्रतिनिधि को जवाब दे दिया, आप अपनी मूर्ति अपने पास रखें। आपकी मूर्ति नहीं लगेगी। यह बात मिर्ची की तरह लगी और अध्यक्ष तक बात मिर्च-मसाला के साथ पहुंची। अहंकार को ठेस लगा और चबूतरा नपवाने की धमकी दे डाली। बात कोतवाली तक गई। वहां भी कोई समझौता नहीं हो सका और अंततः पालिका ने जमीन नपवाने की ठानी। लोगांे ने इसका भारी विरोध किया। मंदिर समिति ने जोरदार आवाज उठाई, चबूतरा मंदिर की जमीन मंे है। नगर पालिका का कोई अधिकार नहीं है! पर पालिका के अध्यक्ष की पहंुच बहुत दूर तक थी। लखनउ$ एक तरह उनका दूसरा घर था। पुलिस-थाना भी उनका। पानी टंकी में गांधी की प्रतिमा बोरे में कैद थी। एक विचार आया कि रात में उस प्रतिमा को उठाकर यहां स्थापित कर दिया। स्थापित होने के बाद कोई कुछ नहीं कर सकता? लेकिन इसे स्थगित कर दिया गया। अब इस तनातनी में गांधीकी प्रतिमा के लिए पैसा चाहिए। जो पैसा था, सब संगमरमर और मजदूरी में खत्म हो गया। लेकिन बात अब आन-बान-शान और जमानियां की थी। एक ही आसरा था, उम्मीद वहीं थीं। मिल पर पहुंचे और अनिल भैया से कहा गया कुछ मदद कीजिए। पहले तो खूब गाली दी। यह उनका अधिकार था। जब भी जरूरत होती, सामाजिक कार्यों में वे मदद करते। इस बार भी यहीं आसरा था। हम लोग पहले गाली खाए और फिर वे अंदर गए और कुछ पैसा लाकर दिए। अभी कुछ और की जरूरत थी। वहीं पर भाई जान यानी अजहर खान मिल गए। सब बात सुनाई गई तो उन्हांेने तुरंत मदद की। कुछ और लोग भी आए और फिर शाम तक मूर्ति के लिए पैसा जुट गया। अब बनारस के लिए गाड़ी की जरूरत थी। एक मित्रा की वैन मिल गई और इस तरह बनारस से गांधीजी की प्रतिमा तत्काल खरीदकर लाई गई। बनारस से नौ बजे रात को चले और 11 बजे तक जमानियां के बाहरी अलंग पर गाड़ी को रोक दिए। चांदनी छिटक रही थी और खेत दुधिया रोशनी से नहाए हुए थे। रात को हवा भी बहुत सुंदर बह रही थी। प्रकृति का यह नजारा देख सारी थकान मिट गई थी। आधी रात के बाद वैन आगे बढ़ी और फिर गांधी चौक पहंुची। यहां पांच-छह साथी पहले से तैयार थे। प्रतिमा को चिपकाने वाला मसाला भी तैयार था। चुपचाप चौक पर संगमरमर की भारी प्रतिमा को बोरे से आजाद किया गया और फिर किसी तरह उसे चबूतरे पर स्थापित की गई। स्थापित करने में पसीने छूट रहे थे। एक तो भय। कोई देख न ले। कोई पुलिस वाला गश्ती करते हुए यहां न पहुंच जाए। अन्यथा सब खेल गुड़-गोबर। इसे पूरी तरह गोपनीय रखा गया था। कुछ लोगों को ही यह बात पता थी। जल्दी-जल्दी प्रतिमा को चबूतरे पर स्थापित करने के बाद जिसे बोरे से उन्हें आजाद किया गया था, उसी बोरे से फिर गांधीजी को ढंक दिया गया। पूरी तसल्ली के बाद उस रात सभी अपने-अपने घर गए और लंबे समय के बाद चैन की नींद सोए।
   सुबह जब सूरज ने आंखें खोली तो लोगों की आंखें चौंधिया गई। अचानक चबूतरे पर उन्हें कुछ भारी-भरकम चीज दिखी। समझने में देर नहीं लगी कि यह गांधीजी की प्रतिमा है। फिर तो सामने चाय की दुकान पर काना-फूंसी होने लगी। तरह-तरह की चर्चा। गांधीजी स्थापित हो चुके थे और यह बात जमानियां से 14 किमी दूर नगर पालिका अध्यक्ष के कान में पहंुचने में देर नहीं लगी। काटो तो खून नहीं। लौंडों ने नगर पालिका को चुनौती दे दी थीं। यह हंसी का खेल नहीं था। लेकिन गांधीजी तो गांधीजी ठहरे। टस से मस नहीं हुए। उनकी प्रतिमा को वहां से हटाना मतलब राटद्रोह...। बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले...। अब जब नगर पालिक थक-हार गई तो मंदिर समिति को न जाने कहां से सद्बुद्धि आ गई और उसने दांवा ठोंक दिया। मंदिर के पुजारी आकर शिलापट्ट ही उखाड़ने लगे। उन्हें पता नहीं था कि जहां गांधी बाबा स्थापित हो गए, वहां की एक ईंट भी उखाड़ना कानून की नजर में अपराध था। पुजारी बाबा छेनी-हथौड़ा लेकर उखाड़ने जा ही रहे थे कि सामने पान की दुकान में पान खा रहे थानेदार ने उन्हंे ऐसा डपटा कि तेजी से वहां भागे। इसके बाद तो यहां पुलिस वालों का पहरा भी लग गया। पुलिस वालों तक बात पहुंची। उन्हें नगर पालिका ने बरगलाया और वह संस्थान के लोगांे को खोजने लगा। अब क्या था? दशहर के पर्व और पुलिस की खोजबीन....पुलिस हम सबको तलाश रही थी। उसी पान की दुकान पर भाजपा के नेता और व्यवसायी दारोगा सेठ ने थानेदार से कहा कि एक भी लड़के को गिरफ्तार किया तो परिणाम बुरा होगा। पर्व-त्योहार चल रहा है। यह बात पता चला किसी तो पुलिस चौकी नहीं बचेगी। अब पुलिस वाले भी इस पचड़े में नहीं पड़ना मुनासिब समझा। त्योहार के समय कुछ उ$ंच-नीच हो गया तो मामला दूसरा रंग भी ले सकता है। लेकिन यह खबर तो फैल ही गई थी कि लोगांे को पुलिस खोज रही है। डॉक्टर तक यह बात पहुंची तो वे तेजी से घर की ओर लपके...।
  दिन बीते, रात आई। इस तरह दिसंबर का महीना आ गया। दिसंबर की एक सांझ, भव्य समारोह में बोरे से महात्मा गांधीजी आजाद कर दिए गए। गांधीजी आज भी चौक पर अपनी निगाह गड़ाए हैं।

                                            ---

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

सर अली इमाम ने बनवाया था अपनी बेगम के लिए अनीस महल


हजारीबाग रोड पर कोकर चौक से आधा किमी दूरी पर दाहिने एक मजार है। आने-जाने वाले इस मजार को जरूर देखते हैं, लेकिन यह मजार किसकी है, पता नहीं। यहां हर दिन अकीदतमंदों की भीड़ भी लगी रहती है। गुरुवार को यह भीड़ और बढ़ जाती है। पर, यह किसी सूफी की मजार नहीं। बल्कि यह मजार एक जज और नेता की है, वह नेता, जिसने पहली बार बंगाल से बिहार को अलग करने की मांग की थी और बाद में भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाने का प्रस्ताव दिया था। 



यह मजार, अली इमाम की है। 11 फरवरी 1869 को पटना जिले के नियोरा गांव में नवाब सैयद इमदाद इमाम के घर उनका जन्म हुआ था और 31 अक्टूबर, 1932 की रात रांची में उनका देहांत। मौत से चंद घंटे पहले अपने बेटे नकी इमाम को अपने बाग के एक गोशे में ले गए और छड़ी से जमीन के एक हिस्से पर निशान बनाया और कहा, इसी जगह मेरी कब्र बनेगी। उसी रात जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा तो तमाम मलाजिमों को अपने पास बुलाया और सभी से माफी मांगी। उस सुबह


वे ठेकेदार पर बहुत गुस्सा हो गए थे, उसको भी बुलाकर माफी मांगी और बेटे नकी इमाम को का कि मेरे तमाम अजीजों, दोस्तों, रिश्तेदारों को मेरा सलाम कहना और कहना कि मेरी जात से अगर कोई तकलीफ पहुंची है तो मुझे माफ करें। इसी दौरान उन्होंने आखिरी सांस ली। सर अली इमाम के परदादा, खान बहादुर सैयद इमदाद अली पटना के सब ऑडिनेट जज के पद से रिटायर हुए। उनके बेटे, खान बहादुर शम्स-उल-उलेमा सैयद वाहिद-उद दीन पहले हिंदुस्तानी थे, जिन्हें जिला मजिस्ट्रेट बनाया गया था। अली इमाम के पिता सैयद इमदाद इमाम असर पटना कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर के साथ एक शायर भी थे। इनके बड़े भाई सैयद हसन इमाम भी जज रहे और उनका निधन 19 अप्रैल, 1933 को 61 साल की उम्र में जपला, पलामू में हुआ।

प्रेम की गवाह इमाम कोठी 
मजार के पीछे ही उनकी एक कोठी है। लाल ईंटों और सूर्खी से बनी। इसे लोग इमाम कोठी आज भी कहते हैं, लेकिन अब यह बिक गई है। इसे मालिक अब दूसरे हैं। पर सौ साल से ज्यादा पुरानी यह कोठी उसी तरह बुलंद है, जो स्कॉटिश कैसल स्टाइल में बनी है। लोग कहते हैं, यह कोठी प्रेम का प्रतीक है। अंग्रेजी हुकूमत के पहले बिहारी बैरिस्टर अली इमाम हैदराबाद डेक्कन के प्रधानमंत्री भी थे। अपनी बेगम अनीस फातिमा के लिए इसे बनवाया था। अनीस बेगम सर सैयद अली इमाम की तीसरी बेगम थी और उन्हीं के लिए उन्होंने रांची में यह इमारत बनवाई थी। उनकी चाहत तो यह थी कि मरने के बाद उनकी और उनकी बेगम की कब्र साथ रहे, जिससे वे मरकर भी जुदा न हों। लेकिन उनकी यह चाहत पूरी न हो सकी। उनकी मजार तो यहां बन गई। उन्हें यहां दफन भी कर दिया गया, लेकिन जब बेगम का निधन हुआ तो उस समय वे पटना में थीं और उन्हें पटना में ही दफन कर दिया गया, लेकिन आज भी एक मजार खाली है।

कोठी को बनने में लगे बीस साल 
इमाम कोठी को बनने में 20 साल लगे थे। इसका निर्माण सन् 1913 में शुरू हुआ था और 1932 में यह पूर्ण हुआ। उस समय इसे बनाने में 20-30 लाख रुपए लगे थे। यह कोठी, जिसे अनीस कैसल भी कहा जाता है, 21 एकड़ में था और यहां 500 लीची और आम के पेड़ थे, लेकिन आज यह जगह सिमट गई है। तीन तल्ले वाली इस कोठी में 120 कमरे हैं। इसमें प्रवेश करने के लिए छह दिशाओं से दरवाजे बने हुए हैं। उनके समय में इस कोठी में अंग्रेज ऑफिसर्स भी आया-जाया करते थे। जिस साल उनके सपनों का यह महल बनकर तैयार हुआ, दुर्भाग्य से उसी साल 1932 में उनका निधन हो गया। इसके बाद तो कोठी बेरौनक होने लगी।

पहली पत्नी के निधन के बाद ईसाई महिला से की शादी
अपनी पहली पत्नी नईमा खातून के निधन के बाद 1916 में उन्होंने एक ईसाई महिला रोज मैरी से शादी की। शादी के बाद रोज मैरी, मरियम बनी। अली इमाम ने मरियम के लिए अनीसाबाद में मरियम मंजिल बनवाया। यह जब तक बन कर तैयार हुआ, मरियम का निधन हो गया। अली इमाम को इस बात का दु:ख हमेशा रहा कि इस इमारत के बनने के बाद मरियम ज्यादा दिनों तक उनके साथ नही रह सकीं। इसके बाद अली इमाम ने तीसरी शादी अनीस फातिमा से की। जो लेडी अनीस के नाम से मशहूर हुईं। उनके लिए रांची में एक बेहद खूबसूरत ईमारत बनवाया जो अनीस कैसल के नाम से जाना गया और बाद में इमाम कोठी।

बेगम ने बनवाई मजार
रांची में इस मजार को उनकी विधवा बेगम ने बनवाया। मजार के अंदर एक पत्थर पर इसका जिक्र भी है। 1932 में सर अली इमाम का देहांत हुआ और तीन साल में यानी 1935 बनकर तैयार हो गया। फर्श संगमरमर का है और दीवारें लाल पत्थर की हैं।

एक हिदू कर रहे हैं मजार की देखभाल
सत्रह सालों से एक ङ्क्षहदू मजार की देखभाल कर रहे हैं। पहले काफी उपेक्षित था। घास-फूस जमा हो गए थे, लेकिन फिर इसकी देखभाल शुरू हुई। आफ यह मजार साफ-सुथरा है और हर सुबह लोग यहां आते हैं। गुरुवार को भीड़ ज्यादा रहती है। यहां लोग आते हैं, मत्था टेकते हैं, दुआ मांगते हैं।


1917 में पटना हाई कोर्ट के बने जज
अली इमाम बैरिस्ट्री की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। वहां से वे जून, 1890 में पटना वापस आए और नवंबर 1890 से कलकत्ता हाई कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी। बाद में वे पटना हाई कोर्ट में 1917 में जज बने। वकालत के साथ-साथ राजनीति में भी सक्रिय रहे। 1906 में जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई तो अली इमाम की प्रमुख भूमिका रही। अप्रैल 1908 में पहला बिहार राज्य सम्मेलन हुआ तो इसकी अध्यक्षता अली इमाम ने की। जिसकी पूरी जिम्मेदारी सच्चिदानंद सिन्हा और मजहरुल हक के कंधों पर थी। 30 दिसंबर 1908 को अली इमाम की अध्यक्षता में मुस्लिम लीग का दूसरा सत्र अमृतसर में हुआ। इसी साल उन्हें सर की उपाधि प्रदान की गई। 1911 में वे भारत के गवर्नर जनरल के एग्जीक्यूटिव कौंसिल के सदस्य बने और फिर इसके उपाध्यक्ष। 25 अगस्त 1911 को सर अली ईमाम ने ङ्क्षहदुस्तान की राजधानी कलकत्ता को बदल कर नई दिल्ली करने का पूरा खाका उस समय भारत के वायसराय लार्ड हार्डिंग के सामने पेश किया, जिसे स्वीकारते हुए अंग्रेजों ने भारत की राजधानी कलकत्ता को बदल कर नई दिल्ली करने का एलान कर दिया।
बांकीपुर पटना की एक सभा में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रासाद ने सर अली इमाम को आधुनिक बिहार के निर्माता की संज्ञा दी। 1910 से 1913 के बीच वक्फ बिल उनकी निगरानी में तैयार हुआ। 1914 मे उन्हे नाईट कमांडर (के.सी.एस.आई) के खिताब से नवाज गया। 1915 मे लॉ मेंबर के पद से रिटायर हुए। 3 फरवरी 1916 को पटना हाई कोर्ट की स्थापना जब हुई तो उसके बाद सितंबर 1917 मे सर अली ईमाम को पटना हाई कोर्ट का जज बना दिया गया। वे दो साल तक रहे। अगस्त 1919 में निजाम हैदरबाद के प्रधानमंत्री बने। वे 1922 तक रहे। 1923 में फिर से पटना हाई कोर्ट वकालत शुरू की और साथ ही देश की आजादी के लिए खुल कर हिस्सा लेने लगे। कांग्रेस की कई नीतियों का खुल कर समर्थन किया। स्वराज और स्वादेशी की पैरवी की। 1927 में सर अली ईमाम ने साइमन कमीशन का जमकर विरोध किया। 1931 में सर अली ईमाम ने गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया और अगले साल ही इनका निधन हो गया।  

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

तत्रभवान् राजा रामपाल सिंह

गोपालराम गहमरी
  राजा रामपाल सिंह हिन्दी के प्रमियों मे थे। उन्होंने विलायत में 14 वर्ष प्रवास किया था। वहां से हिन्दी और अंगरेजी में एक साप्ताहिक पत्रा ‘हिन्दोस्थान’ निकालते थे। आपने स्वदेश लौटकर हिन्दी में पहले पहल ‘ हिन्दोस्थान’ दैनिक निकाला था उसके पहले कानपुर से ‘भारतोदय’ कुछ दिनों तक उदय होकर अस्त हो गया था। स्थायी रूप से कालाकांकर ‘हिन्दोस्था
न’ ही हिन्दी रसिकों को रोज दर्शन देने वाला हुआ।
   राजा रामपाल सिंह देशी नरेशों में उस समय एक हो कांग्रेसी थे। हम बात सन् 1888 ई की कहना चाहते हैं जिन दिनों मिल्टर जार्ज यूलके सभापतित्व में कांग्रेस का चौथा अधिवेशन करने के लिए प्रयाग के सुयशवान कांग्रेसी श्री अयोध्या नाथ महोदय अथक परिश्रम कर रहे थे। उस अधिवेशन के हम इसलिए प्रशंसक हैं कि उसी अधिवेशन में पहले पहल कांग्रेस के सभापति का अभिभाषण हिन्दी भाषा में प्रकाशित हुआ था। उसका प्रकाशन करने वाले कालाकांकर नरेश राजा रामपाल सिंह ही थे। कालाकांकर हनुमत् प्रेस की एक शाखा प्रयाग स्टेशन के पास ग्रेट ईस्टर्न होटल में थी जिसके मैनेजर श्री गुरुदा शुक्ल थे। उन्हीं शुक्ल जी ने जार्ज यूल साहब की स्पीच को हिन्दी में छापकर कांग्रेस के अधिवेेशन में वितरित कराया था। उस होटल को राजा साहब ने खरीदकर उसका नाम राजा-होटल रखा था जब आप प्रयाग पधारते तब उसी में ठहरते थे। उस समय के प्रसिद्ध कांग्रेस महारथी श्री अयोध्या नाथ जी ने राजपूताने में कांग्रेस प्रचार आदि का कार्य-भार कालाकांकर नरेश राजा रामपाल सिंह को ही सौंप दिया था। राजा साहब अपना अधिक समय कांग्रेस कार्य में व्यतीत होता था। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर आदि रजवाड़े में जाकर इस कार्य के लिए उस साल राजा रामपाल सिंह ने अनेक व्याख्यान दिये।
   राजा साहब कोट, पैंट और हैटधारी थे। एकबार महाराजा उदयपुर से इसी अवसर पर जब मिलने गये और समय निश्चय करने के बाद महलों में पहुंचे तब भी भीतर बूट पहने ही चले जा रहे थे। उदयपुरीधीश के यहां जब यह खबर पहुंची तो आपने कोई निश्चित मखमली बहुमूल्य कालीन अगले कमरे में बिछा देने की आज्ञा दी। उसी समय उसकी तामीली हुई।
   राजा रामपाल सिंह जब अगले कमरे में जाने के लिए चौखट पर पहुंचे तब उस फर्श को देखकर वह स्वयं एक ब एक रुक गये और झट आपने अपने नौकर को बूट खोलने का इशारा किया। बिना किसी के निवेदन के ही राजा साहब बूट उतार कर अंदर गये। उस कमरे में जो कारचोबी की सजावट से भरा अनमोल कालीन बिछा देखा, उसपर मुग्ध होकर राजा साहब ने स्वयं बूट छोड़ कर ही भीतर जाना उचित समझा। वहां महाराज उदयपुर से राजा रामपाल सिंह की राजनीतिक विषयों पर बहुत बातें हुई। महाराजा साहब को आपने कांग्रेस कार्य उसके उद्देश्य अच्छी तरह समझाये और देशी राज्यों का कांग्रेस के प्रति कर्ाव्य बतलाया।
  महाराजा साहब ने सब बातें सहानुभूतिपूर्वक सुनी और कांग्रेस कार्यकर्ााओं से देशभक्तिपूर्ण कार्यों की सराहना की थी।
   कांग्रेस का जब प्रयाग में चौैथा अधिवेशन हुआ तब एंटी कांग्रेस कहलाने वाले दो नामी आदमी कांग्रेस के स्टेज पर व्याख्यान देने के लिए उतावले थे एक राजा शिव प्रसाद सितारेहिन्द और दूसरे थे लखनउ$ के मुंशी नवल किशोर साहब, जिनका पुस्तक प्रकाशन कार्य में आज भी प्रांत में सुनाम है।
   लेकिन ज्योंही ये दोनों महाशय मंच पर बारी बारी से बोलने गये। कांग्रेस पंडाल में विरोध की आवाज बुलंद हुई कि कुछ भी बोलने से पहले असमर्थ होकर उन्हें लौट जाना पड़ा। विरोधी की बात सुनने की शक्ति या सामर्थ्य उस समय कांग्रेस में नहीं थी।
   व्याख्यान वाचस्पति दीनदयाल शर्मा जी उन दिनों भारत वर्ष में सुप्रसिद्ध हिन्दी वक्ता थे, जिनके व्याख्यानों की भारत भर में धूम मची हुई थी। कांग्रेस मंच पर उन्हें व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया। यह सदुद्योग महामना पूज्य पंडित मदनमोहन मालवीय जी द्वारा हुआ था। व्याख्यान वाचस्पति जी ने सहर्ष स्वीकार करके यह अभिप्राय प्रकट किया कि वह व्याख्यान हिन्दी में देंगे और विषय दो में से एक कोई हो। पहला गोरक्षा हो या हिन्दी भाषा हो।
   उस कांग्रेस अधिकारियों को यह स्वीकार नहीं हुआ।
   जब विरोध और हो-हल्ले के मारे राजा शिव प्रसाद और सितारे-हिन्द मुंशी नवलकिशोर महोदय कांग्रेस मंच पर बोलने से वंचित होकर लौटे तब बड़ी छीछालेदर हुई। लेकिन ससम्मान दोनों महाशय पंडाल से विदा हुए।
   प्रयाग में कालविन साहब बैरिस्टर कांग्रेस के पक्ष में थे और लेिटनेंट गर्वनर सर कालविन सरकार के। सरकार का जो भाव कांग्रेस के प्रति था और है, वही भाव उनका था। सुना दोनों भाई-भाई थे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्नाका उदाहरण वहां साक्षात् वर्ामान था। कांग्रेस का काम उनदिनों बहुत जोरों पर था। सर्व श्री डब्ल्यू. सी. बनर्जी., दादाभाई नौरोजी, बदरूीन तैयबजी, के.टी. तैलंग जी, लोकमान्य तिलक जी, सर फिरोज शाह मेहता, आनन्दाचार्य, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, हसन इमाम, सर सत्येंद्र प्रसाद सिंह, रहमतुल्ला-सयानी, सी. शंकर नायर आनंद-मोहन बसु, सर रमेशचंद्र दा, दिनशा एदलजी बाचा, लालमोहन घोष, गोपाल कृष्ण गोखले, रासविहारी घोष, अंबिका चरण मजूमदार, विशन नारायण दर, भूपेंद्रनाथ बोस, एनी बेसेंट, सर बिलभाई पटेल, मोतीलाल नेहरू, विजयराघवाचार्य, सुब्रण्यम अयर, लाला लाजपतराय, विपिन चन्द्र पाल और विदेशी सज्जन सर्वश्री हेनरी काटन, बेब साहब, बेव वर्न हू ब्राडला आदि जीवित थे।
   राजा रामपाल कहा करते थे कि जो भारतीय श्वेतांगों से मार खाकर या अपमानित होकर अपनी मान मरम्मत के लिए अदालत की शरण में जाते हैं वे कायर ही नहीं भारतीय वीरों के मुंह पर दाग लगाने वाले हैं। श्वेतांग इस कायरपन को बहुत हेय समझते हैं। उनसे अपमानित होने पर जो भारतीय ‘फेस टू फेस’ लड़ जाते हैं, ‘फूट टू फूट’ भिड़ जाते हैं, उनकी वीरता से वे लोग नाखुश नहीं होते। मार खानेपर हिंदुस्तानी श्वेतांगों पर मानहानि की नालिश करते हैं पर श्वेतांग इस व्यहार को इतना नीच समझते हैं कि मार खानेपर किसी से उसका जिक्र भी नहीं करते।
   एक बार राजा साहब बंबई जा रहे थे। इन पंियों का लेखक भी उनके साथ था। इलाहाबाद स्टेशन पर अपना सामान फर्स्ट क्लास में रखवा कर वे प्लेटफार्म पर टहल रहे थे। उस कंपार्टमंेट पर ‘यूरोपवालों’ के वास्ते, लिखा था। इतने में जल्दी जल्दी एक साहब वहां पहुंचा और कोई हिंदुस्तानी सवार है सुन कर नौकरों से उनका सामान प्लेटफार्म पर फेंका कर आप उसमें सवार हुए। गाड़ी खुलने के समय जब राजा साहब अपने बर्थ पर पहुंचे तब सामान प्लेटफार्म पर देखकर झल्लाये, साहब से बातें हुई। उन्होंने अपने हाथ की छड़ी से राजा साहब को वहो देखने का इशारा किया जहां ‘फॉर यूरोपियन’ लिखा था। राजा साहब ने छड़ी छीन कर साहब को इतना मारा कि वे गाड़ी से गिर गये। तब उन्हें उठाकर प्लेटफार्म पर रखा दिया। नौकरों ने उनका सामान उतार अपना सामान लादा। गाड़ी सीटी देकर चलने लगी। स्टेशन मास्टर यूरोपियन थे। खबर पाकर पहुंचे लेकिन गाड़ी चल चुकी थी। जब आपने सब हाल सुना और मालूम किया कि राजा रामपाल सिंह थे, वे चुप हो रहे। साहब ने भी कहीं कुछ फरयाद नहीं की। मैंने राजा साहब से ही सुना वह कोई हिन्दुस्तान में रहने वाले साहब थे। उसकी मां प्रसव के समय विलायत गयी और वहां उनके पैदा होने पर फिर भारत लौट आयी। राजा साहब उन्हें मारते वक्त कह रहे थे कि तेरी मां जन्म के समय विलायत गयी तो तू यूरोपियन हो गया। हम चौदह वर्ष तक विलायत में रहकर यूरोपियन नहीं हुए?
  एक बार राजा साहब अपने राज्य होटल के कमरे में ठहरे थे। राजा साहब का रात को जगने और दिन को सोने का अभ्यास था। उस रात को गानवाद्य हो रहा था। राजा साहब के किसी नौकर ने आधीरात को खबर दी कि बगल वाले कमरे के द्वार पर कोेई श्वतांग कुछ बक रहा है। राजा साहब ने बाहर आकर सुना तो वह गालियां बक रहा था। वहीं पटक कर बड़ी मार दी। फिर नौकर उन्हें बेहोशी में उनके बिछौने पर कर आये। उनकी इच्छा न होने पर भी मामला अदालत गया।
    अदालत में साहब ने जिरह में कह दिया कि जिसने हमको मारा उसके मुंह से शराब की बू आ रही थी। अदालत में राजा साहब के वकील ने कहा कि हमारे राजा साहब कालकांकर नरेश कभी शराब नहीं पीते। इस बयान पर मुकदमा खारिज हो गया। लेकिन दो सिपाही छः महीने के वास्ते मुकर्रर हुए कि देखे राजा साहब शराब पीते हैं या नहीं। राजा साहब ने छः महीने तक शराब की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की, यद्यपि निरीक्षण करने वाले सिपाही कालकांकर से बहुत दूर रहते थे लेकिन राजा साहब में ऐसी इच्छा शक्ति थी कि छः महीने तक छुई तक नहीं। राजा साहब जुल्फ रखते थे। जुल्फ के बाल खिचड़ी थे। हमने स्वयं देखा था, वे कभी जुल्फ में तेल नहीं लगाते थे। उनके यहां मिस्टर मेेल्हर नामक एक श्वेतांग उनकी सर्विस में थे। उनको हम उर्दू पढ़ाया करते थे। उस समय उनके दो भाई श्रीमान लाल राम प्रसाद सिंह और श्री नारायण सिंह जी बहादुर थे। राजा साहब की मृत्यु लकवा से हो गयी। उनके पश्चात् श्री मान लाल राम प्रसाद सिंह के माननीय पुत्रा अधिकार हुए। उन्हीं के वंशज कालाकांकर नरेश हैं।

सोमवार, 10 जुलाई 2017

प्रेमचंद परिवार में मेरे वे दिन

 श्यामा देवी

बात बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक की है, जब विदेश यात्रा से लौटने वाला अथवा विधवा-विवाह करने वाला व्यक्ति समाज में बहिष्कृत कर दिया जाता था। मेरे पिता मुंशी गुलहजारी लाल एक कट्टर आर्य समाजी थे-सामाजिक कुरीतियों और ढकोसलों के घोर विरोधी। ऐसी अनर्गल बातों और रीति-रिवाजों के विरुद्ध संघर्ष करने में सदैव अग्रणी रहे। उनका प्रतिरोध केवल मौखिक तर्कों तक ही सीमित न रहा, बल्कि उन्होंने उसे कार्यरूप में भी परिणत कर दिखाया। अपनी ज्येष्ठ पुत्री के विवाह के लिए उन्होंने चुना उस समय के लखनऊ के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ महेश चरण सिन्हा को, जो वर्षों तक सारी दुनिया रौंद कर तथा विदेशों से विज्ञान की उच्च डिग्रियां लेकर स्वदेश लौटे थे। उन्हीं डा. महेश चरण सिन्हा की सुयोग्य ज्येष्ठ पुत्री हैं, हिंदी की सुप्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती सुमित्रा कुमारी सिन्हा। उक्त संबंध की उस समय समाज में काफी चर्चा रही और बड़ी-बड़ी आलोचनाएं हुईं। किंतु मेरे पिता अडिग एवं अविचल रहे। मैं उनकी दूसरी संतान थी और मेरे लिए उन्होंने वर चुना उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के अनुज, स्व महताब राय को। यह सर्व विदित है कि प्रेमचंद ने भी उस समय शिवरानी देवी से विधवा-विवाह कर समाज में एक उथल-पुथल सी मचा दी थी। अत: मेरे पिता ने सामाजिक कुरीतियों से इस प्रकार डट कर संघर्ष करने वाले साहसी व्यक्ति के अनुज से मेरा संबंध जोडऩे का उचित ही निर्णय किया। यहां इस बात का उल्लेख कर देना भी असंगत न होगा कि मेरी कनिष्ठ भगिनी सावित्री का विवाह स्व डा. संपूर्णानंद के साथ हुआ था। 

सन् 1919 में मैं प्रेमचंद की अनुज वधू बनकर लमही ग्राम में आयी। प्रेमचंद (जिन्हें में आगे भाई के नाम से संबोधित करुंगी) मेरे पतिदेव स्व महताब राय (जिन्हें आगे की पंक्तियों में बाबूजी से संबोधित करुंगी) के न केवल अग्रज बल्कि पिता तुल्य भी थे। बाबूजी जब तुतलाना सीख रहे थे, उसी समय उनके पिता गोलोकवासी हो गए और उनके भरण-पोषण का सारा भार आ पड़ा भाई जी पर। भाई जी के ही संरक्षण में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई और उन्होंने ही बाबूजी का विवाह भी किया। बाबूजी का भी अपने बड़े भाई के प्रति अगाध स्नेह था और वे उनका अत्यधिक आदर और सम्मान करते थे। अतीत के कुछ संस्मरण सुनाते हुए एक बार बाबूजी ने बतलाया कि उन्हें शहर से गांव (लमही) लौटने में रात्रि के लगभग 12 बज गए। डरते-डरते उन्होंने धीरे से द्वार की सांकल खटखटायी। चाहते थे कि उनके आने की खबर भैया को बिल्कुल न लगे और मां अथवा भावज द्वार खोल दें किंतु आशा के विपरीत भैया ने ही आकर द्वार खोला। देखकर बाबूजी के होश उड़ गये और पैरों तले से धरती जैसे खिसक गयी। धड़कते हृदय से चुपचाप अपने कमरे में दाखिल हो गये। सुबह जब बाबू जी सोकर उठे तो लोटा उठाकर शौच के लिए चले, तो भाईजी ने पूछा-क्यों छोटक, रात जब तुम आये तो कोई चार बजा रहा होगा? इतनी देर कहां कर दी तुमने?
बाबूजी ने सहमते हुए उत्तर दिया, 'नहीं भैया, बारह बजे थे। कुछ काम में फंस गया, जिससे देर हो गयी।Ó 
'अरे, मैंने तो समझा कि सवेरा हो चला है। तभी से बैठा लिख रहा था।Ó
ऐसी थी बाबू जी की भाई जी के प्रति आदर भावना और ऐसी थी भाई जी की तन्मयता कि सारी रात बैठे लिखते रहे और उन्हें समय का भी पता नहीं चल सका।
यों तो भाई जी के प्रति बाबूजी का स्नेह तथा आदर भाव कभी कम नहीं हुआ और मेरी ज्येष्ठानी श्रीमती शिवरानी देवी का भी मेरे प्रति बराबर स्नेह बना रहा, लेकिन नौकरी के सिलसिले में दोनों भाइयों को पृथक जिलों में रहना पड़ा और छठे-छमासे भेंट मुलाकात हो जाती। बाबूजी ने गांव में अपने पैतृक मकान के सामने एक पुख्ता बैठक बनवायी। कुछ दिनों पश्चात जब भाईजी सरकारी नौकरी  पर लात मारकर लमही आये, तो उन्होंने उस बैठक का विस्तार कर मकान का रूप दे दिया और अपने परिवार के साथ उसी में रहने लगे। बाबूजी तथा हमलोग जब कभी गांव आते तो पैतृक मकान में रहते। इस प्रकार बिना किसी कानूनी बंटवारे के ही गांव में एक के स्थान पर आमने-सामने दो घर हो गये और रहना-सहना भी अलग होने लगा।

सन् 1921-22 में बाबूजी कलकत्ता में श्री महावीर प्रसाद पोद्दार के प्रेस के व्यवस्थापक थे। उन्हीं दिनों वाराणसी में बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने ज्ञान मंडल यंत्रालय की स्थापना की थी और हिंदी दैनिक 'आजÓ तथा अंग्रेजी दैनिक 'टुडेÓ के संपादक थे बाबू संपूर्णानंद। बाबू शिवप्रसाद गुप्त तथा श्री श्रीप्रकाश जी बाबूजी को कलकत्ता से खींचकर वाराणसी लाये और ज्ञानमंडल यंत्रालय का व्यवस्थापक बनाया। मुश्किल से दो वर्ष वहां बीते थे कि भाईजी ने बाबूजी के समक्ष अपना निजी प्रेस खोलने तथा नौकरी छोड़कर उसकी व्यवस्था का भार संभालने का प्रस्ताव रखा। आज्ञाकारी अनुज ने भाई की आज्ञा शिरोधार्य कर नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बाबू शिवप्रसाद गुप्त तथा श्रीप्रकाश जी ने बहुत समझाया, किंतु वे टस से मस न हुए। साझे में अपना सरस्वती प्रेस खोला और बाबूजी उसकी व्यवस्था देखने लगे। किंतु उन दिनों छापेखानों की दशा आज जैसी न थी। बड़ी मुश्किल से खर्च चलता था और आय बहुत थोड़ी होती थी।
और इस तरह कुछ समय तक काम करने के बाद जरूरी हो गया कि सरस्वती प्रेस से पृथक होकर कुछ और कार्य किया जाये। बाबूजी मिर्जापुर में राजा साहब विजयपुर के कलित प्रेस के व्यवस्थापक तथा यहीं से प्रकाशित होने वाले मिर्जापुर गजट के संपादक होकर चले गये। सरस्वती प्रेस से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका हंस तथा साप्ताहिक जागरण, जिनका संपादन प्रेमचंद जी करते थे, की प्रतियां वे नियमित रूप से बाबूजी के पास मिर्जापुर भेजा करते थे तथा साथ ही अपनी सभी नव प्रकाशित कृतियों की प्रतियां भी बाबू को। वे लभभग 12 वर्ष मिर्जापुर में गुजारे, जिनमें से कुछ दिन तो रांची में व्यतीत हुए। किंतु उन्होंने कभी माथे पर शिकन न पडऩे दी। आर्थिक कशमकश के बीच भी वे टेनिस, क्रिकेट तथा शतरंज के खेलों में रमे रहते। इसी बीच उन्होंने कलित प्रेस की नौकरी छोड़ कर मिर्जापुर में ही अपना एक छोटा सा प्रेस चलाया। जो व्यक्ति उस समय के बड़े से बड़े प्रेसों की व्यवस्था का भार संभाल चुका था, उसे समय के थपेड़ों में पड़कर अपने छोटे से प्रेस में स्वयं काम भी करना पड़ा। परंतु इसके लिए उन्होंने कभी भाईजी को  नहीं कहा और न उनके प्रति स्नेह और आदर भाव में ही कोई कम आयी। सन् 1936 के मध्य में भाई के गंभीर रूप से बीमार होने की सूचना पाकर बाबूजी विक्षिप्त से हो उठे और अचानक बारह साल की जमी-जमायी गृहस्थी उजाड़कर मिर्जापुर को सदैव के लिए त्याग दिया और लमही चले आये। प्रेस मिर्जापुर में ही अपने एक मित्र को सुपुर्द कर आये कि उसे वाराणसी भिजवाने की व्यवस्था कर दें, किंतु मित्र महोदय ने काफी दिनों तक प्रेस से होने वाली आय का भरपूर उपयोग किया।
भाईजी उन दिनों वाराणसी नगर में धूपचंडी स्थित एक महान में किराये पर रहते थे। नीचे प्रेस था और ऊपर निवास-स्थान। किंतु लंबी अवधि तक उस घर में बीमार रहने के कारण उन्होंने मृत्यु के लगभग दो माह पूर्व मकान बदल दिया और समीप ही में राम कटोरा स्थित दूसरे मकान में चले गये। बाबूजी इस बीच निरंतर शहर जाते और भाई की सेवा टहल तथा इलाज की व्यवस्था में लगे रहत, किंतु भाईजी की दशा निरंतर बिगड़ती ही गयी और अंतत: आठ अक्टूबर 1936 को उनकी इहलीला समाप्त हो गयी। बाबूजी इस बीच निरंतर उनके निकट रहे और अंत समय में भी उनके बगल में थे। बाबूजी कहते थे कि अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भाईजी एकाधिक बार उनसे कुछ आवश्यक बातें करने की इच्छा व्यक्त की। शायद वे बाबूजी जी से अकेले में कुछ बातें करना चाहते थे, किंतु अपनी यह अभिलाषा अंतर में लिये ही चल  बसे।

बाबूजी जब तक जीवित थे, प्रेमचंद पर शोधकार्य करने वाले स्कॉलर उनके पास आया करते थे और कई-कई दिनों तक उनसे प्रेमचंद के विषय में जानकारी प्राप्त किया करते थे। आकाशवाणीवालों ने भी दो-एक इंटरव्यू की टेव रिकार्डिंग की थी। सोवियत लेनिनग्राद के एक शोध स्कॉलर बलतर बालिन, जो प्रेमचंद पर शोध कार्य करने भारत आये थे, काफी समय तक बाबूजी के पास प्रेमचंद्र के पारिवारिक जीवन के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए आते रहे। 
82 वर्षीया मेरी ज्येष्ठानी शिवरानी देवी के दोनों सुयोग्य पुत्र श्रीपतराय और अमृत राय हर प्रकार से संपन्न हें। इधर कई महीनों से वे (श्रीमती शिवरानी देवी)पुन: वाराणसी में हैं। आंखों से सूझता नहीं और कान से सुनाई नहीं पड़ता। किंतु वाराणसी में ही अपने जीवन के अंतिम दिन व्यतीत करने की उनकी हार्दिक अभिलाषा है। कहती हैं-उनकी (प्रेमचंद)की आत्मा मुझे यहीं ढूंढती होगी। मेरा भी काफी समय उन्हीं के साथ व्यतीत होता है। घंटों बैठे हम लोग अतीत को याद कर दुख-सुख की बातें किया करते हैं। वे मुझे बराबर अपने साथ ही रहने को कहा करती हैं, किंतु पारिवारिक बंधन के कारण यह संभव नहीं हो पाता। जब कभी वे मुझे दुखी या खिन्न पाती हैं तो आश्वस्त करते हुए कहती हैं-तुम क्यों फिक्र करती हो श्यामा, मैं छोटक की शादी कर तुम्हें घर लायी थी और जब तक मैं जीवित हूं, तुम्हें कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। देखना है, जीवन की इस दौड़ में हम दोनों में से कौन किसे पछाड़ता है!
समय के साथ उम्र बीत रही है। अतीत को दुहराते रहने के अतिरिक्त कोई काम भी नहीं, लेकिन इस तरह अतीत-जीवी भी तो नहीं रहा जा सकता! 
हर अगला पल अदृश्य की ओर ले जा रहा है। पता नहीं कब विराम मिलेगा !
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
यह लेख धर्मयुग में एक अक्‍टूबर 1972 के अंक में प्रकाशित हुआ था। 

शुक्रवार, 23 जून 2017

झारखंड के अंचल में

डॉ रामखेलावन पांडेय
देहात को मैंने प्रेमचंद की आंखों से देखा था-इसे स्वीकार करने में मुझे किसी प्रकार का संकोच नहीं, किसी प्रकार की दुविधा नहीं, अत: मोटरों की पों-पों, और कोलाहल, शहर की उड़ती धूल और गंदगी तथा कर्माकुल व्यस्त जीवन से त्राण या झारखंड के एक अंचल में-सभ्यता और कृत्रिमता से दूर देश में, जब रहने का अवसर मिला तब मुझे मालूम पड़ा जैसे सारी दुनिया पीछे छुट आयी है। यह अंचल जाना हुआ तो है, मगर पहचान नहीं। कभी पहचानने की चेष्टा भी नहीं की थी मैंने। मुझे लगा जैसे यहां की घड़ी की सुइया तक शिथिल हो गई हैं। यहां काल प्रवाह है ही नहीं, एक विचित्र आलस, एक अनुभूति निश्ंिचतता इस रहस्यमय अंचल को घेरे पड़ी है। सघन हरीतिमा की छाया में मानवता जैसे स्वप्न देख रही हो, उस युग का जिसमें संघर्ष न था, संघर्ष का उन्माद न था। नीली-नीली दूर तक फैली पहाडिय़ां धरती की छाती की भांति फूल उठी हैं और उन्हें घर कर उजले, लाल, पीले और अनेक रंगों के बादलों के टुकड़े प्रकृति का सिंगार कर रहे हैं। यह सौंदर्य अपरिचित सा ही लगा मुझे! पहाडिय़ां देखी थी मैंने, उड़ते बादलों के रंगीन पख भी देखे थे, पर जान पड़ा, ऐसा सौंदर्य तो था नहीं उनमें। ऊंचा सा टीला-पत्थरों का जमघट-एक आध लहलहाते पौधे और ऊपर आसमान में शरदपूनों का हंसता हुआ चांद बादलों की गोद में खेलता-सा, फुदकता-सा जान पड़ा। नदी के उस पार से कोई मिलन-संदेश भेज रहा हे-कितना विषादमय कितना करुण, किंतु कितना मादक!  पास में था झरता हुआ क्षीण पहाड़ी झरना, पर स्पष्ट। स्वर के इनके गीत आधी रात में भटकने पर मोहक हो उठे।
इस ऊबड़खाबड़ अंचल की काली-काली चट्टानों को देखकर मैंने सोचा था, यहां के अधिवासी भी उन्हीं पत्थरों की भांति जड़ और शिथिल हैं। यह बात भी नहीं कि वैसे लोगों का अभाव है वहां, जिनके अविराम जीवन में दिन-मास-वर्ष की कोई गणना नहीं। वे चर्चिल और हिटलर को नहीं जानते, शायद गांधी और जिन्ना को भी नहीं! स्वभाव में एक विचित्र रुखाई-मिली सरलता है। सरलता जो मूर्खता की सीमा में घुसती जान पड़ती है। सच मानों, मुझे दो ही चीजें यहां प्रचुर मात्रा में मिली-एक ठंडा पानी और दूसरी सरलता। किंतु उन चट्टानों के बीच से दबकर निकलने वाले झरने भी हैं, सुस्वादु जल से पूर्ण, पर्वत की करुणा और स्नेह के प्रतीक।  
गरीबी यहां खुलकर झांकती है-लोगों के चीथड़ों से। उसे किसी प्रकार की लजा नहीं, संकोच नहीं, झिझक नहीं। और, अमीरी उस पर हंसती है, खिलखिला कर, मचल-मचलकर। शहरों की गरीबी जैसी यहां की गरीब नहीं, वह इस तरह खुल कर झांकती भी नहीं-शरमा कर चलती है, लज्जा के भार से झुकी सी। अमीरी यहां धूर्तता की अमरलता है जो गरीबी की डाल पर फैलती है, शोषण ही जिसकी नीति है।
पढ़ा करता था-पहाड़ी देशों के लोग सबल होते हैं, कारण उनका प्रकृति के साथ निरंतर संघर्ष जो चल रहा है और संघर्ष में उसी की रक्षा संभव है, जो सबल है। संघर्ष यहां का जीवन नहीं, जीवन है, सहयोग, प्रकृति के साथ निरंतर सहयोग। बादल पानी बरसाते हैं, ऊंचे-नीचे खेतों की मिट्टी खुरेद लोग धरती माता के पेट में अन्न डाल देते हैं और माता का स्नेह फूट पड़ता है हरियाली के रूप में। हवा के झोंके के चंचल हरीतिमा जैसे जीवन की लहर हो। लोग इसलिए आलसी हैं, नितांत आलसी, निष्क्रियता की सीमा तक पहुंचने वाले आलससागर में निमग्न हैं। पेट में थोड़ा अन्न हो, अंग ढंकने को मात्र आवरण, बस इतना ही पर्याप्त है। उनके लिए अतीत नहीं, भविष्य भी नहीं, केवल वर्तमान है। वर्तमान परिश्रम से चूर, अभाव से पूर्ण, किंतु अभाव उन्हें खलता नहीं, भाव यहां कभी दिखा जो नहीं। निंदा, ईष्र्या, द्वेष और कलह का मूल कारण है यही आलस। शरीर बैठा रहेगा पर मन तो नहीं। और बेकार मन की यही खुराक है। शहरों के कर्म-संकुल जीवन में इतना अवकाश कहां जो लोग दूसरों की ओर देखें। क्या अपनी ही दौड़ कम है?
मैं ऐसी भाषा सीख कर यहां आया था जो भाव छिपाना जानती है, बनावटी है, कृत्रिम है। सभ्यता आखिर अपनी प्रकृति को छिपाने का ही नाम तो है, किंतु यहां की भाषा, इसे जंगली भले न कहूं, सभ्य तो कह नहीं सकता।
बंगाल के संपर्क में आया हुआ यह प्रदेश शक्ति का उपासक है, हिंसा का, बलिदान का। दुर्गा और काली पूजा के अवसरों प मनुष्य की पशुता नाचती सी दीख पड़ी। निकट स्थित गया में आकर गौतम को बुद्धत्व मिला, किंतु मालूम होता है अहिंसा की गंध इस मिट्टी को नहीं मिली।
मनुष्य सभी को अलग-अलग कर देखने का अभ्यस्त है। ऊंच-नीच, राजा-रंक, अमीर-गरीब, काला-गोरा, सुंदर-असुंदर का भेद सर्वत्र है। शिक्षित और अशिक्षित का भेद भी इधर कम नहीं, किंतु वहां का यह भेद इतना प्रबल है कि जर्मनी में जर्मन और यहूदियों में क्या रहा होगा। भय यहां जीवन की कुंजी है, सर्वत्र ही है, किंतु भूतों का भय जैसे यहां दीख पड़ा वैसा कहीं नहीं। लड़कों और स्त्रियों की बात करें, अच्छे खासे तगड़े जवान भी भूतों की कहानी सुन अकेले आंगन में नहीं निकलते।
यह रही झारखंड के एक अंचल की झांकी-धूमिल और स्पष्ट रेखाओं में सीमित सी, किंतु वास्तव में कितनी असीम, कितनी विस्तृ।  

शनिवार, 17 जून 2017

श्‍यामल की कहानियां -कहानी के भीतर कहानी

  कहानी की सिमटती दुनिया और सीमित अनुभव में कहानी रचाव के इस दौर में श्यामल बिहारी श्यामल अपनी कहानियों में सिर्फ एक भूगोल तक सीमित नहीं रहते। उनका दायरा किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहता।  वैविध्यपूर्ण विषय और देखने की एक गहरी अंतरदृष्टि हमें समकाल से जोड़ती भी है और समकाल के कथाकारों से विलगाती भी है। हिंदी पाठकांे की लगातार सिमटती दुनिया में, जिसके लिए एक हद तक लेखक और उनका गिरोह  जिम्मेदार है-श्यामल इस बंद गली से निकल एक अलग और अपनी दुनिया आबाद करते हैं। इसलिए, उनकी कहानियां हमारे प्रबुद्ध आलोचकांे की नजर में नहीं चढ़ पातीं। पर जब इन कहानियों से गुजरने की ईमानदार कोशिश हो तो हम अपने समय को इसमें पाते हैं। बनारस से लेकर पलामू, रांची धनबाद की अलग-अलग संस्कृति, भाषा, समाज और उनकी रोजमर्रा की समस्याओं, चिंताआंे, फितूरों से हम रूबरू होते हैं। श्यामलजी पत्रकार हैं। इस नाते इन जगहों और यहां की गलियों, घरों, सड़कों पर घूम रहे पात्रों से बोलते-बतियाते ही इन कहानियां का जन्म हुआ है।
  बारह कहानियों के इस संग्रह में हर कहानी के भीतर एक कहानी छिपी हुई है। इसके कहने का आशय और अर्थ भी है। ‘कागज पर चिपका समय’ संग्रह की पहली कहानी है, जो बनारस पर है और अंतिम कहानी, ‘चना चबेना गंगजल भी बनारस पर। इनके भीतर पलामू, रांची और धनबाद है। पहली कहानी में हमें बनारस की वही चिरपरिचित भाषा की मिठास से साबका होता है-‘अरे भाईजान! गुरुआ ने तो नया किला भी फतह कर लिया! उसके कमरे में काफी देर से रीतिकाल छाया हुआ है। मैं एक बार आधा घंटा पहले टायलेट की तरफ से हो आया हूं, चलिए न एक बार उधर से और हो लिया जाये।’
   कहानी का यह पहला पैराग्राफ पाठक को उत्सुक बना देता है। जो बनारसी रंग को जानते हैं, वह गुरु और रीतिकाल के लक्षणार्थ से भी खूब परिचित होंगे। यह खुसूर-फुसूर बनारस के दूरदर्शन केंद्र के एक आफिस में होती है। इस कहानी में आगे क्या है, उसे आप पढि़ए, पर इसमें एक कंसेप्ट है, जो एक दूसरी कहानी को जन्म दे सकता है। दूरदर्शन के लिए एक कार्यक्रम बनाने की तैयारी चल रही है और यह कार्यक्रम भूमिहीनों और शोषितों पर कंेद्रित है। ये भूमिहीन और शोषित कौन हैं? यह आगे खुलता है-‘अरे भाई, हरहुआ के लमही गांव से लेकर पांडेयपुर और बनारस मेन सिटी में इधर जगतगंज तक का इलाका ही तो मंुशी प्रेमंचद की चौबीस घंटे सक्रियता का मूल क्षेत्रा था। लमही में जन्म और जगतगंज में निधन तो, यहां के ढेरों शोषित-दमित पात्रा उनके साहित्य में अमर हैं, ऐसे पात्रांे की दूसरी और तीसरी पीढ़ी के ज्यादातर लोग आज वैसी ही दशा में जीवन खेप रहे हैं...’
  प्रेमचंद का जब निधन हुआ तो देश गुलाम था। फिर आजादी मिली 1947 में। इसके भी हासिल किए 67 साल हो गए और प्रेमचंद के पात्रा आज भी वैसी ही दशा में हैं। यानी, दूसरी-तीसरी पीढ़ी की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ जबकि न जाने कितनी पंचवर्षीय योजनाएं आईं और चली गईं। गांव में रहने वाली 80 प्रतिशत आबादी की फिक्र देश की किसी भी सरकार ने नहीं की। नारे जरूर लगाए। एक और बात, हमने इतनी जरूर तरक्की कर ली है कि प्रेमचंद के किसानों के सामने संकट जाहे जिस रूप में आए, पर वे आत्महत्या नहीं करते थे, पर हमारी नीतियों ने इतना जरूर विकास किया कि किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। हमारा बैंक, हमारी सरकार विजय माल्यों जैसों के प्रति बहुत उदार रहती है। कुछ ऐसे पूंजीपती भी हैं, जिनका हजारों करोड़ का कर्ज एक झटके में हमारी सरकार माफ कर देती है और जबकि चंद हजार रुपये के लिए हमारे किसान आत्महत्या कर लेते हैं। जो अन्न देता है, उसे हम भूखा मार देते हैं।
  इसके भीतर एक और कहानी उभरती है-रुखसाना महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जुड़कर बनारस के बुनकरों पर शोध कर रही है....अखबारों मे रोज आ रहा है कि बनारस के बुनकर पलायन कर रहे हैं। रोज एक न एक की खुदकुशी की खबर दर्दनाक तस्वीर सहित छप रही है उन पर सूदखोरों के जुल्म की बातें भी सामने आती रहती हैं। यह भी शोर कि बनारसी साड़ी उद्योग मर रहा है, लेकिन इसकी मार्केटिंग करने वालों के रुतबे पर तो कोई असर नहीं।’-जो हाल किसानों की, मजदूरों की, वही हाल बुनकरों की। गर्दन में फांस यहां भी है। 67 सालों में जैसे समय ठहर गया है, कागज पर चिपक गया है।
  ‘आना पलामू’ यह संग्रह की चौथी कहानी है। पलामू श्यामलजी का घर भी है। 1998 में पलामू के सूखाड़-अकाल पर ‘घपेल’ नामक उपन्यास उनका आ चुका है। यह कहानी सुखाड़-अकाल पर नहीं है, पर इससे उपजी परिस्थितियों पर है। पलामू एक अजीब जिला है। ऐसा कि इसकी भूमि पत्राकारों की अपनी खींचती रही है-पी साईनाथ, रामशरण जोशी, महाश्वेता देवी, फणीश्वरनाथ रेणु, अज्ञेय...किसने नहीं लिखा और क्या नहीं लिखा, लेकिन पलामू नहीं बदला। 1880 में संजीब चटृोपाध्याय ने ‘पलामू’ लिखी। तब से पलामू यही है, यहां भी समय जैसे कागज पर चिपक गया है। मजा देखिए, यहां से निकले नेता झारखंड और देश में अपनी पहचान बनाए-कोई केंद्रीय मंत्राी बना, कोई राज्यपाल...पर पलामू की किस्मत नहीं बदली। आज स्थिति और भी बदतर है। यहां अकाल से निपटने के लिए चालीस-चालीस से डैम बनाए जा रहे हैं। ये आज तक पूरे नहीं हुए, लेकिन हर साल इसकी राशि बढ़ जाती है। तो पलामू यह है और इस उर्वर पलामू में नक्सलवाद नक्सलबाड़ी से चलकर पड़ाव डाला जो अब अपना घर बना लिया है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि झारखंड में नक्सलवाद का प्रवेश इसी मुहाने से हुआ और आज माओवाद के अलावा एक दर्जन संगठन सक्रिय हैं, जिसे कुछ पुलिस ने भी माओवाद से निपटने के लिए खड़ा किया है। लोहा से लोहा को काटने के लिए हमारी पुलिस के पास यही उपाय है! सो, इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है, जो शहर नहीं जंगलों के बीच बसे गांवों में रहते हैं। यह कहानी कुछ ऐसे ही सवाल खड़ा करती है और माओवाद को लेकर द्वंद्व को भी। एक दूसरी कहानी, इसी की पूरक है-छंद में हाहाकार। इस कहानी में बस एक ही दृश्य है-जन अदालत की। जन अदालत चरमपंथी गुट की। खुलासा नहीं किया गया है कि यह माओवादियों की है या दूसरे चरमपंथी गुट की। पलामू में एक दर्जन ऐसे संगठन सक्रिय हैं-ये भी जन अदालत लगाकर अपने दोषियों को अपने ढंग से सजा देते हैं। यहां भी औरंगा नदी के तट पर घने जंगल में जन अदालत लगी है, जिसमें चार मामले आए हैं-गोसाईडीह की पिरितिया के साथ बलात्कार का मामला, गंझू परहिया की पुलिस मुखबिरी का केस, डाकू रामसूरत यादव का मुकदमा और सरकारी संत बनकर जनता को भड़काने वाले कृषि विज्ञानी रामचंद्र मिश्रा का मुद्दा। पिरितिया के साथ बलात्कार कोई सवर्ण नहीं करता है, बल्कि पलामू में चेरो आदिवासी। वह इस तरह की कई वारदातें कर चुका है, बकौल कहानीकार। गंझू परहिया, डाकू रामसूरत। सबको सजा दी जाती है-वह सजा है मौत की, लेकिन रामचंद्र बच जाते हैं क्योंकि उन पर झूठे आरोप लगे थे। वे गांवों में कृषि का कायाकल्प कर गांव के लोगांे को रोजगार मुहैया कराते हैं। जो मजूदर पलायन करते थे, वह रुक गया है। यानी, मिश्रा जी यहां हितचिंतक के तौर पर उभरते हैं और इनका मामला जांच का विषय बन जाता है और इस तरह वे जन अदालत से छूट जाते हैं। गांव की एक महिला बताती है कि ये भले आदमी हैं- ‘ऐ बाबू्! ई सही आदमी हथ! जौना-जौना गांव में इनकर काम चलत हई, उहां के लोगन के अब शहर जाके मजूरी करे के जरूरत नइखे। गांव के जे अदमी पच्चीस-तीस रोपेया कमाये खातिर बीस कोस दूर शहर-बाजार जाइत रहन उ गांव में इनकरा साथ काम करके रोज सौ रोपेया कमात हथिन!...’ इस तरह मिश्रा जी बच जाते हैं। दरअसल दोनों कहानी आपको भी आमंत्रित करती है, आइए पलामू और फिर देखिए, ‘जन्नत’ की हकीकत।
  अंतिम कहानी ‘चना चबेना गंगजल’ है। यह खांटी बनारसी कहानी है। यहां अस्सी का चौराहा भी है और घाट भी है। छल-छद्म की चादर ओढ़े आचार्य। और उनको हर दिन गरियाता उनका एक पूर्व साथी, जिसने गाढ़े समय में उनकी मदद की थी। कहानी अस्सी चौराहे से निकलकर घाट की ओर जाती है जहां एतवारू मिलते हैं-अरे हम कौनो बाबा-फाबा नाहीं हैं! क्ेवल बंस के हैं। गंगाजी में से बूड़ल लाश खोजकर निकालते हैं। यह एतवारू ही उस आचार्य को हर संझा गरियाने जाते हैं। क्यों, इसकी एक कहानी है, जो आहिस्ता-आहिस्ता खुलता है। निश्च्छल और ईमानदार। जिस लाश को गंगाजी में से पुलिस भी नहीं ढूंढ पाती, उसे एतवारू बहुत आसानी से खोज निकालते हैं।  इस विषय पर कोई कहानी दिखाई नहीं दी, जिसने एतवारू जैसे पात्रा पर कहानी लिखी हो, जबकि बनारस से कई ख्यात कहानीकार निकले। कहते हैं, कहानी तो अपने आस-पास बिखरी होती हैं, उसे देखने वाली नजर चाहिए। घुमक्कड़ मन चाहिए। डांइग रूम में बैठकर कहानी नहीं लिखी जा सकती न खूब प्रयास से। इस कहानी में हम बनारस को महसूस कर सकते हैं, उसकी धड़कन को, उसकी संस्कृति को।
  ‘अट्टाहास काल’ हमारी छिजती संवेदना की कहानी है। मणिकर्णिका के बारे में हम सब जानते हैं यहां चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती है। 24 घंटे चिता की लपटें उठती रहती हैं। पर, कहानी यह नहीं है। कहानी यह है कि गांव वाले एक स्वाभाविक मृत्यु को कैसे भजाते और लाश पर राजनीति करते हैं और मुआवजा वसूलते हैं। लाश की राजनीति राजनेता करते रहे हैं लेकिन गांव वाले ऐसा करें तो समझना चाहिए शहर की जो बारूदी हवा अब गांवों की ओर मुड़ गई है। गांव अपने भोलेपन के लिए जाना जाता है, लेकिन आज के समय में यह बात अब नहीं कही जा सकती है। कहानियां और भी हैं और पात्रा भी। प्रेत पाठ भी रहस्य के आवरण में लिपटी एक कौतूहल पैदा करती है। पत्तों की रात, निद्रा नदी, सीधान्त, बहुत कुछ अलग-अलग स्वाद रचती हैं। वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र राव ने व्लर्ब पर ठीक ही लिखा है, ‘ये कहानियां पाठक को लोकजीवन के नैसर्गिक प्रवाह में बड़ी कुशलता से बहा ले जाती हैं।’ इन कहानियों में कई-कई भूगोल देखते हैं। कई-कई भाषा देखते हैं और इस वैविध्यपूर्ण रोशनी में हम अपने समय और समाज को देखते हैं। हमारे लोकजीवन पर चढ़ता शहरी रंग और इस रंग में बदरंग होते मानवीय रिश्ते, स्वार्थ की परछाइयों में अपना ही बौना होता कद और थरथराती-कांपती नदियों से अपना दुखड़ा सुनाते पलामू के पहाड़-जंगल....बिना किसी लाग-लपेट और बनावटी भाषा के।    

साभार, लमही से।


रविवार, 11 जून 2017

शहीद शेख भिखारी

सन् 1857 की क्रांति ने भारतीय इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत की। इसे भारतीय आजादी का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में अंग्रेजों से लड़ाई का सिलसिला 1857 से पहले ही शुरू हो गया था। हां, जंगल की आग मैदानों तक नहीं पहुंच पाई थी। 1857 की क्रांति ने पूरे देश में आजादी की चिंगारी को सुलगा दिया और इस चिंगारी से छोटानागपुर का पहाड़-पठार भी धधकने से बच नहीं सका। यहां तो बहुत पहले से ही चिंगारी रह-रहकर सुलग उठती थी, लेकिन 1857 की कहानी एक नया मोड़ देती है।
इस राष्ट्रव्यापी पहली क्रांति 1857 में शेख भिखारी ने भी अहम भूमिका निभाई। एक निहायत सामान्य बुनकर परिवार में शेख भिखारी का जन्म रांची जिले के ओरमांझी थाना अंतर्गत खुदिया गांव में 1819 में हुआ था। बचपन से वह अपने खानदानी पेशा, मोटे कपड़े तैयार करना और हाट बाजार में बेचकर अपने परिवार की परवरिश में सहयोग करते थे। जब वे 20 वर्ष के हुए तो उन्होंने छोटानागपुर के महाराज के यहां नौकरी कर ली। परंतु कुछ ही दिनों के बाद अपनी प्रतिभा और बुद्धिमत्ता के कारण उन्होंने राजा के दरबार में एक अच्छी मुकाम प्राप्त कर ली। बाद में बड़कागढ़ जगन्नाथपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने उनको अपने यहां दीवान के पद पर रख लिया।  शेख भिखारी के जिम्मे बड़कागढ़ की फौज का भार दे दिया गया। उस फौज में मुस्लिम और आदिवासी नौजवान थे।
1856 ई में जब अंगरेजों ने राजा महाराजाओं पर चढ़ाई करने का मंसूबा बनाया तो इसका अंदाजा देश के राजा-महाराजाओं को होने लगा था। जब इसकी भनक ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को मिली तो उन्होंने अपने वजीर पांडेय गणपतराय, दीवान शेख भिखारी, टिकैत उमरांव सिंह से सलाह-ममशवरा किया।
इन सभी ने अंगरेजों के खिलाफ मोर्चा लेने की ठान ली और जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह से पत्राचार किया। इसी बीच में शेख भिखारी ने बड़कागढ़ की फौज में रांची एवं चाईबासा के नौजवानों को भर्ती करना शुरू कर दिया। अचानक अंगरेजों ने 1857 में चढ़ाई कर दी।
 विरोध में रामगढ़ के हिंदुस्तानी रेजिमेंट ने अपने अंगरेज अफसर को मार डाला। नादिर अली हवलदार और रामविजय सिपाही ने रामगढ़ रेजिमेंट छोड़ दिया और जगन्नाथपुर में शेख भिखारी की फौज में शामिल हो गए। इस तरह जंगे आजादी की आग छोटानागपुर में फैल गई। रांची, चाईबासा, संताल परगना के जिलों से अंगरेज भाग खड़े हुए।
चाईबासा के अंसारी नौजवान अमानत अली, सलामत अली, शेख हारू तीनों सगे भाइयों ने दुमका के अंगरेज एसडीओ को मार डाला। इस घटना से छोटानागपुर में दहशत फैल गई और यह क्षेत्र अंगरेज अफसरों से खाली हो गया। इस खुशी में ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव रांची डोरंडा में जश्न मनाने लगे। इसी बीच अंगरेजों की फौज जनरल मैकडोना के नेतृत्व में रामगढ़ पहुंच गई और चुट्टूपालू की पहाड़ी रास्ते से रांची के पलटुवार चढऩे की कोशिश करने लगी।
 उनको रोकने के लिए शेख भिखारी, टिकैत उमराव सिंह अपनी फौज लेकर चुट्टूपालू पहाड़ी पहुंच गये और अंगरेजों का रास्ता रोक दिया। शेख भिखारी ने चुट्टूपालू की घाटी पार करनेवाला पुल तोड़ दिया और सड़क के पेड़ों को काटकर रास्ता जाम कर दिया। शेख भिखारी की फौज ने अंगरेजों पर गोलियों की बौछार कर अंगरेजों के छक्के छुड़ा दिय। यह लड़ाई कई दिनों तक चली।
 शेख भिखारी के पास गोलियां खत्म होने लगी तो शेख भिखारी ने अपनी फौज को पत्थर लुढ़काने का हुक्म दिया। इससे अंगरेज फौजी कुचलकर मरने लगे। यह देखकर जनरल मैकडोन ने मुकामी लोगों को मिलाकर चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढऩे के लिए दूसरे रास्ते की जानकारी ली। फिर उस खुफिया रास्ते से चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ गये। इसकी खबर शेख भिखारी को नहीं हो सकी। अंगरेजों ने शेख भिखारी एवं टिकैत उमराव सिंह को छह जनवरी 1858 को घेर कर गिरफ्तार कर लिया और सात जनवरी 1858 को उसी जगह चुट्टूघाटी पर फौजी अदालत लगाकर मैकडोना ने शेख भिखारी और उनके साथी टिकैत उमरांव को फांसी का फैसला सुनाया।
 आठ जनवरी 1858 को आजादी के आलमे बदर शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह को चुट्टूपहाड़ी के बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गयी। वह पेड़ आज भी सलामत है। यह पेड़ आज भी हमें उनकी याद दिलाता है और यहां पर हर साल शहीद दिवस के मौके पर कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। 

रविवार, 4 जून 2017

चंपारन, गांधी और रांची

चंपारन आंदोलन का यह सौंवा साल चल रहा है। इन सौ सालों में बहुत कुछ बदला और इसके साक्षी हम सभी हैं। देश को आजाद हुए भी 69 साल हो गए है और समाज ही नहीं, देश की राजनीति ने भी अपना एक नया कलेवर और चरित्रा धारण कर लिया है। यह रोज-रोज दिखाई देता है। इस राजनीति में विलग आज चंपारन को फिर-फिर पढ़ने-देखने की जरूरत महसूस हो रही है ताकि हम देख सकें कि उस दौर में चंपारन के लोगों ने, उस समय के अपने तमाम बड़े नेताओं, खासकर, बिहार में भी, रहते हुए आखिर मोहनदास करमचंद गांधी में अपनी मुक्ति क्यों देखी? जबकि चंपारन के किसानों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं थी। कानपुर का ‘प्रताप’ अखबार और बिहार से प्रकाशित ‘बिहार बंधु’ में चंपारन के दुख-दर्द-दुर्दशा की कहानियां प्रकाशित होती रहती थीं। तब भी कोई ‘बड़ा’ नेता किसानों की समस्याओं को दूर करने की पहल करते नहीं दिखाई देता है। तो क्या, प्रकृति अपना काम कर रही थी या कोई अदृश्य शक्ति? एक लंबे समय से नीलवरों द्वारा प्रताडि़त रैयतों को जब मोहनदास करमचंद गांधी का साथ मिला तो एक दो साल में ही चंपारन नीलवरों के अत्याचार से आजाद ही नहीं हुआ, बल्कि नीलवरों को अपना बोडि़या-बिस्तर भी समेटना पड़ा। यद्यपि, इसी समय यानी 1916-17 में ही नई तकनीक से नील बनाने की कला इजाद हो गई थी, जिसके कारण भी यह धंधा रसातल की ओर जा रहा था। इसलिए भी नीलवरों को अपना धंधा समेटने के अलावा कोई दूसरा विकल्प उनके सामने नहीं था।
यदि इस पूरे आंदोलन पर नजर डालें तो दो बातें निकलकर आती हैं। पहला यह कि भारत लौटने के बाद गांधी ने पहला आंदोलन अपने हाथ में लिया और अहिंसा के अस्त्रा से इस आंदोलन में जीत हासिल की। उनका आत्मविश्वास भी इस आंदोलन से बढ़ा और दूसरा यह कि मोहनदास से महात्मा की राह यहीं से शुरू हुई, जो असयोग आंदोलन में और पुख्ता हुई। गांधी के अध्येता यह भली-भांति जानते हैं। ‘मोहनदास’ से ‘गांधी’ और फिर ‘महात्मा’ की यात्रा का उत्स यही चंपारन ही था। चंपारन एक ऐसा पड़ाव है, जहां से गांधी की प्रतिष्ठा और पहचान जुड़ी है। गांधी के इस आंदोलन में कूदने के कई फायदे हैं और उनके शांतिपूर्ण आंदोलन के कारण अंग्रेजांे को अपनी क्रूरता पर तरस आया और फिर वे अपने शोषण पर तार्किक ढंग से विचार करने और किसानों के पक्ष में कानून बनाने के लिए बाध्य हुए। इसका बहुत कुछ श्रेय गांधी को जाता है और गांधी को नीलहे गोरों की करतूत के बारे में जानकारी देने वाले राजकुमार शुक्ल को भी, जो गांधी को चंपारन ले आए। इसके लिए उन्होंने काफी मुश्किलों का सामना किया। इस आंदोलन में नींव के पत्थर की तरह काम किए राजकुमार शुक्ल। इन्हें भी जानना जरूरी है। यह वही थे, जिन्होंने गांधी को पं चंपारन चलने के लिए बाध्य किया। इसका जिक्र खुद गांधीजी ने भी किया है। गांधीजी ने पूरी ईमानदारी से यह स्वीकार किया है कि चंपारन आंदोलन की सफलता के कारण ही वे भारत से भी अंग्रेजों को खदेड़ने में कामयाब हुए। लुई फिशर ने भी इसका उल्लेख अपनी पुस्तक ‘गांधी की कहानी’ में किया है। लुई के शब्द हैं- ‘जब मैं 1942 में सेवाग्राम आश्रम में गांधीजी से पहलीबार मिला तो उन्होंने मुझसे कहा-‘‘मैं तुम्हें बतलाउ$ंगा कि वह कौनसी घटना थी, जिसके कारण मैंने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर जोर देने का निश्चय किया। यह घटना 1917 की है।’’
फिशर ने आगे कहा है, -गांधीजी कांग्रेस के दिसंबर 1916 के लखनउ$-अधिवेशन में शामिल होने लिए गए थे। गांधीजी ने लिखा है--‘जब कांग्रेस की कार्रवाई चल रही थी, एक किसान, भारत के अन्य किसानों की तरह गरीब और कृश तन दिखाई देने वाला मेरे पास आया और बोला-मैं राजकुमार शुक्ल हूं। मैं चंपारन से आया हूं और चाहता हूं कि आप मेरे जिले में चलें।’ गांधीजी ने चंपारन का नाम पहले कभी नहीं सुना था। यह लुई जोड़ते हैं।
‘बहुत दिनों से चली आ रही व्यवस्था के अनुसार चंपारन के किसान तीन कठिए थे। राज कुमार शुक्ल भी ऐसे किसानों में थे। वह कांग्रेस-अधिवेशन में चंपारन की इस जमींदारी प्रथा के विरुद्ध शिकायत करने आए थे और शायद किसी ने उसे सलाह दी थी कि गांधीजी से बात करें।’
गांधीजी अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में भी इस घटना का जिक्र करते हैं,- मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि वहां जाने से पहले मैं चंपारन का नाम तक नहीं जानता था। नील की खेती होती है, इसका ख्याल भी नहीं के बराबर था। नील की गोटियां मैंने देखी थीं, पर वे चंपारन में बनती हैं, और उनके कारण हजारों किसानों को कष्ट भोगना पड़ता है, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी।’...‘राजकुमार शुक्ल नामक चंपारन के एक किसान थे। उन पर दुख पड़ा था। यह दुख उन्हें अखरता था। लेकिन अपने इस दुख के कारण उनमें नील के इस दाग को सबके लिए धो डालने की तीव्र लगन पैदा हो गई थी। जब मैं लखनउ$ कांग्रेस में गया तो वहां इस किसान ने मेरा पीछा पकड़ा।’
राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी ने चंपारन आने का निवेदन किया और बताया कि इस बारे में वकील बाबू यानी गांधी के प्रिय साथी ब्रजकिशोर बाबू आपको सब बता देंगे। यही हुआ।
गांधीजी आगे लिखते हैं-मैंने उनसे चंपारन की थोड़ी कथा सुनी। अपने रिवाज के अनुसार मैंने जवाब दिया, ‘खुद देखे बिना इस विषय पर मैं कोई राय नहीं दे सकता। आप कांग्रेस में बोलिएगा। मुझे तो फिलहाल छोड़ ही दीजिए।’ राजकुमार शुक्ल को कांग्रेस की मदद की तो जरूरत थी ही। ब्रजकिशोर बाबू कांग्रेस में चंपारन के बारे में बोले और सहानुभूति-सूचक प्रस्ताव पास हुआ।’
गांधी को राजकुमार शुक्ल ने इस बात के लिए मना लिया कि वे अपनी आंखों से चंपारन को देखें। गांधी ने तिथि बता दी और कलकत्ते जाकर गांधी को चंपारन ले आए। गांधी ने चंपारन को देखा। चंपारन के साथ-साथ छुआछूत से सामना हुआ। कई और समस्याआंे को देखा। निलहे के अत्याचार के साथ-साथ छुआछूत और शिक्षा पर भी गांधी ने ध्यान दिया और इस तरफ भी कदम बढ़ाए। पूरे आंदोलन पर दृष्टिपात करें तो इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि एक तरह से चंपारन ने ही गांधी को गढ़ा और आगे का रास्ता दिखाया। चंपारन के अनुभव ने आजादी के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई।
पर, इस पूरे आंदोलन में राजकुमार शुक्ल के साथ कई लोग जुड़े थे, जो सिर्फ इतिहास में सिमट कर रह गए और रांची, जहां चंपारन की कार्यवाहियां हुई, आंदोलन की रूपरेखा बनी, वह भी भूला दी गई। रांची का जिक्र एकाध जगह राजकुमार शुक्ल की जीवनीकार राय प्रभाकर प्रसाद ने किया है और डॉ राजेंद्र प्रसाद ने भी अपनी आत्मकथा और फिर ‘चंपारन में महात्मा गांधी’ में किया है। यद्यपि गांधी वांगमय में पूरे विस्तार से रांची आती है। यह ध्यान रखने की बात है कि जब राजकुमार शुक्ल गांधी से मिले और चंपारन आने के लिए बार-बार आग्रह कर रहे थे, उस समय उनकी उम्र 41 साल थी और गांधी उनसे छह साल बड़े यानी 47 साल के थे। यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि दक्षिण अफ्रीका से भारत आने से पहले गांधीजी की कहानी भारत पहुंच चुकी थी।

कहते हैं, पं बंगाल के बाद 1813 में चंपारन में नील का पहला कारखाना कर्नल हिक्की चकिया रेलवे स्टेशन के करीब एक किमी दक्षिण बारा या बाराकिया में स्थापित किया था। पहले यहां के किसान गन्ने की खेती करते थे। इससे काफी आय भी होती थी, लेकिन 1850 में नील के भाव काफी बढ़ गए तो चीनी के कारखानों के स्थान पर नील के कारखानों ने जगह ले ली। शुरू-शुरू में जहां जहां नील और ईख की खेती के लिए मिट्टी अच्छी होती है, वहां नील के कारखाने स्थापित होते गए। लेकिन 1875 तक आते-आते निलहे गोरों ने अपना दबदबा कायम कर लिया। 1892-97 में एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि चंपारन में नील के 21 कारखाने तथा उनकी 48 कोठियों में करीब 33 हजार कामगार थे और 95,970 एकड़ अर्थात कुल कृषि भूमि के सात प्रतिशत भाग में नील की खेती हो रही थी। इसी तरह निलहों का अत्याचार भी रैयतों पर बढ़ने लगा था। इसी बीच 1897 में विश्व में कृत्रिम नील बाजार में आ गया। इससे नील का भाव गिर गया। पटना से प्रकाशित ‘बिहार बंधु’ के 20 जनवरी, 1899 के अंक मंे छपा कि आजकल नील बहुत मंदी है। और 20 अगस्त 1899 के अंक में छपा कि इस वर्ष की वर्षा से मुजफ्फरपुर में नील की बहुत बर्बादी हुई, लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ जाने के कारण जर्मनी से कृत्रिम नील आना बंद हो गया और बिहार में नील का भाव उछलकर 675 रुपये प्रति मन हो गया। जिस नील की कीमत 234 रुपये मन रहता था, गिरकर सौ रुपये मन हो जाता है; अचानक उसकी कीमत में इतना भारी उछाल हो जाता है। निलहे गोरों की बांछे खिल जाती है। अब नील की खेती के लिए अत्याचार का दूसरा दौर शुरू हो जाता है। बेतिया राज का प्रबंध यूरोपियों के हाथ में रहने कारण यहां निलहों की मनमानी चलती है। एक तरफ दमन शुरू होता है और दूसरी ओर विरोध के स्वर भी उठने लगते हैं।
चंपारन में नील की खेती के साथ ही इसका विरोध भी शुरू हो गया। कई तरह के लगान भी जबदरस्ती वसूले जाते हैं। इससे किसानों की परेशानी बढ़ती जाती है। जिस बेतिया राजा के अधीन यह क्षेत्रा था, वह पहले ही अंग्रेजों से कर्ज लेकर अपनी सीमा खींच दी थी। अब किसानों के सामने खुद अपनी बात रखने, लड़ने और आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं था। धीरे-धीरे कुछ गांवों के किसान नीलहों की कारगुजारी से लड़ने की हिम्मत जुटाते और 1907 तक आते आते सतबरिया के राजकुमार शुक्ल, साठी गांव के शेख गुलाब, मठिया गांव के शीतल राय आगे बढ़ते हैं। शेख गुलाब के नेतृत्व में मुसलमान रैयत मिटिंग करते हैं और नील की खेती छोड़ देते हैं। पर, इतने से ही समस्या का समाधान नहीं होना था। तीनों पीडि़त किसानों से चंदा वसूलकर कुछ राशि एकत्रित करते हैं ताकि मुकदमें लड़े जा सकें। मुकदमा लड़ना भी इन किसानों के बस में नहीं था। लड़ तो रहे थे, लेकिन नीलहों का अत्याचार भी कम नहीं हो रहा था। कहीं कोई रोशनी नहीं दिखाई दे रही थी। वैसाख की तपती दोपहरी की तरह किसानों का जीवन भी तप रहा था। राजकुमार शुक्ल ने दूसरी तरकीब भी निकाली और वे गांव-गांव घूमकर लोगों में अलख जगाने लगे और उस समय के समाचार पत्रों कानपुर के प्रताप, इलाहाबाद के अभ्युदय और नागपुर के हिंद केशरी में नीलहों के अत्याचार और किसानों की दुर्दशा का जिक्र कर पत्रा छपवाने लगे। इसके अलावा तीन अप्रैल, 1915 को छपरा में आयोजित बिहार प्रांतीय राजनीतिक सम्मेलन के मंच से अपना दुखड़ा कह सुनाया। इसी साल मई 1915 में ब्रज किशोर प्रसाद ने विधान परिषद में भी प्रस्ताव रखा, जिसे अनसुना कर दिया गया। पर उसी साल जून में एक अफसर ने रिपोर्ट प्रस्तुत कर नीलहों के अत्याचार को सही ठहराया। इन सबके बावजूद अत्याचार कम नहीं हो रहे थे और न शुक्ल हार मान रहे थे। अगले साल 1916 के दिसंबर के आखिरी सप्ताह में लखनउ$ में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था तो वहां भी ब्रजकिशोर बाबू के साथ शुक्ल जी गांधी के पैरों पर गिर पड़े। उनसे अनुरोध किया कि चंपारन के किसानों की दुर्दशा पर एक प्रस्ताव लाएं, लेकिन गांधी ने जवाब दिया कि जब तक अपनी आंखों से देख न लें, तब तक इस पर अपना विचार नहीं दे सकता। गांधी के जवाब के बाद प्रस्ताव बाबू ब्रजकिशोर ने पेश किया और राजकुमार शुक्ल ने उसका समर्थन किया।
डॉॅ राजेंद्र प्रसाद ‘ बापू के कदमों में’ में इसका उल्लेख इन शब्दों में करते हैं--‘कांग्रेस के बाद सब लोग अपने-अपने स्थान को चले गए, पर राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी से वचन ले लिया कि जब वह कभी बिहार की ओर से गुजरेंगे तो चंपारन भी जाएंगे और वहां की हालत देखेंगे। मार्च 1917 में गांधीजी को एक बार कलकत्ता की ओर जाना पड़ा और उन्होंने राजकुमार शुक्ल को पत्रा लिखा कि उनसे वह कलकत्ता में मिलें और वहां से उनको अपने साथ चंपारन ले जाएं। पर दुर्भाग्यवश यह पत्रा राजकुमार शुक्ल को देर से मिला और तब तक गांधीजी कलकत्ता से वापस चले जा चुके थे।’ हालांकि इसका दुख राजकुमार शुक्ल को हुआ, लेकिन इसमें इनकी क्या गलती। डाक विभाग ने पत्रा ही बहुत देर से दिया। हालांकि दूसरा मौका भी जल्द मिल गया। डॉ राजेंद्र प्रसाद लिखते हैं, ‘अप्रैल 1917 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक कलकत्ता में, ईस्टर की छुट्टियों में होने वाली थी। गांधीजी उसमें शरीक होने कलकत्ता गए और इस बात की सूचना उन्होंने राजकुमार शुक्ल को दे दी।’ पत्रा समय से मिल गया और राजकुमार शुक्ल भी समय से कलकत्ता पहुंच गए और गांधीजी को पटना लेकर पहुंचे। इस अधिवेशन में डॉ राजेंद्र प्रसाद भी गए थे, लेकिन उस समय तक गांधीजी और राजेंद्र बाबू एक दूसरे से अपरिचित थे। उन्हीं के शब्दों में, -मैं अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी का सदस्य था और उस जलसे में शरीक था। इत्तिफाक से जलसे में में गांधीजी के बहुत नजदीक बैठा था, पर वह मुझे जानते नहीं थे और न मैं यह जानता कि वह कलकत्ता से ही सीधे बिहार जाने वाले हैं। राजकुमार शुक्ल उनके सभा तक ले गए थे, पर बाहर ही ठहर गए थे, इसलिए मेरी मुलाकात उनसे भी नहीं हुई। सभा समाप्त होने पर मैं जगन्नाथपुरी चला गया और इधर गांधीजी राजकुमार शुक्ल के साथ पटना चले आए।’ राजेंद्र बाबू वहां से पुरी चले गए और गांधीजी को शुक्ल जी साथ लेकर राजेंद्र बाबू के घर पटना पहुंचे।
यहां गांधीजी को समझना जरूरी है। गांधीजी का एक व्यक्तित्व बन चुका था और सादगी ने उनके जीवन में प्रवेश कर लिया था। दूसरे नेताओं की तरह चमक-दमक उनके पहनावे में नहीं था। इसलिए जब वे राजेंद्र प्रसाद के आवास पर पहुंचे तो राजेंद्र बाबू का नौकर उन्हें एक देहाती मुवक्किल ही समझा। राजकुमार शुक्ल तो देहाती थे ही और उनकी बोली-बानी भी। इसलिए नौकर की नजर में दोनों ही देहाती थे। गांधीजी का उस समय का पहनावा ग्रामीण भारतीय की तरह ही था। धोती, अचकन और काठियावाड़ी पगड़ी। कभी-कभी वह धोती-कुरता के साथ एक मामूली टोपी भी पहन लिया करते थे, जो बाद में गांधीटोपी के नाम से मशहूर हो गया। और यह टोपी खादी की होती थी। नौकर ने दोनों के साथ मुवक्किल की तरह ही बरताव किया और उस पाखाने का भी इस्तेमाल करने नहीं दिया, जो खास घर के मालिक के इस्तेमाल में रहा करते थे। गांधीजी ने नित्यक्रिया और स्नानादि नहीं किया था। कुछ समय बाद पटना के मजहरूल हक को खबर लग गई कि गांधीजी पटना आए हैं तो वे खुद राजेंद्र बाबू के घर पहुंचकर अपने घर लिवा आए। मजहरूल साहब इंग्लैंड से वकालत पढ़ने के बाद गांधीजी के साथ ही जहाज से वापस आए थे। इसलिए दोनों के एक दूसरे से पूर्व परिचित थे। यहां से फिर चंपारन की यात्रा शुरू होती है। बीच में कृपलानी मिलते हैं। इस तरह चंपारन की धरती पर गांधीजी के कदम पड़े।
लेकिन यहीं पर यह कहना मुनासिब होगा कि आखिर जब बिहार में एक से एक नेता थे, तो उन्होंने चंपारन के किसानों की दुर्दशा को दूर करने के लिए क्यों नहीं कुछ किया? कुछ वकील मुकदमा तो लड़ते रहे, लेकिन उन्हें अपनी फीस से मतलब थी। इसका दुख पीर मुहम्मद मूनिस ने प्रताप के 13 मार्च, 1916 के अंक में ‘दुखी’ नाम से लिखे अपने लेख ‘चंपारण में अंधेरे’ में किया है। लेख की अंतिम पंक्तियां हैं-‘हमारी समझ में यह बात नहीं आती कि जिस प्रांत में मि. मजहरूल हक, सैयद अली इमाम, स. हसन इमाम, मि. दास जैसे प्रभावशाली नेता रहते हैं, वहां की प्रजा भी अनेक दुःखों से ग्रसित रहे। बिहार के नेताओं को लज्जा आनी चाहिए कि उनके 18 लाख भाई इस प्रकार के दुःख भोगे, पशुवत जिंदगी बिताएं और आप मौज से सुख चैन की बंसी बजाते फिरें, उनकी कोई खबर ही न लें। श्रीयुक्त पांडेय जगन्नाथ प्रसादजी से हमारी प्रार्थना है कि जयप्रकाश मैदान में आकर देश के सामने चंपारण की प्रजा का आर्तनाद सुनने की चेष्टा कीजिए, देश अवश्य सहायता करेगा। मगर जरा यह भी ध्यान रहे कि ‘‘जो अपनी सहायता आप करता है, उसकी सहायता परमात्मा भी करता है।’’
पीर मुनिस के बारे में भी जान लेना जरूरी है। आचार्य शिवपूजन सहाय ने इनके बारे में लिखा है, ‘पीर मुहम्मद मुनिस बिहार के चंपारण जिले के निवासी थे। बेतिया नगर में उनका मकान था। उनकी आर्थिक दशा जितनी शोचनीय थी, उतनी ही उनकी देशभक्ति अभिनंदनीय थी। आजीवन वे हिंदी और हिंदुस्तानी की सेवा में निस्पृह भाव से तत्पर रहे। चंपारण के निलहे गोरों के अत्याचार से उत्पीडि़त जनता की आह से द्रवित होकर उन्होंने अपनी वास्तविक स्थिति बिसार दी। कानपुर के हिंदी साप्ताहिक प्रताप में, उसके प्रकाशन के आरंभ काल 1913 से ही, वे पीडि़त प्रजा की दुःखगाथा नियमित रूप से देशवासियों को सुनाने लगे। प्रताप के प्रतापी संपादक श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के उत्तेजन और प्रोत्साहन से वे बड़ी निर्भीकता के साथ आततायी गोरों के भीषण कुकृत्यों का भंडाफोड़ करते रहे।’
ये वही पीर मुनिस थे, जिनसे राजकुमार शुक्ल ने गांधी के नाम पत्रा लिखवाया था। उस पत्रा को भी देख लेना चाहिए ताकि चंपारण के घोर देहात में रहने वाले भी गांधीजी के बारे में क्या-क्या जानते थे। इस पत्रा से भी चंपारण की स्थिति को समझ सकते हैं-
बेतिया
27 फरवरी, 1917
मान्यवर महात्मा,
सुनते ही रोज औरों के
आज मेरी भी दास्तान सुनो।
आपने उस अनहोनी को प्रत्यक्ष का कार्यरूप में परिणत कर दिखाया, जिसे टॉलस्टाय जैसे महात्मा केवल विचारा करते थे। उसी आशा और विश्वास के वशीभूत होकर हम आपके निकट अपनी राम कहानी सुनाने के लिए तैयार हैं। हमारी दुःख भरी कथा उस दक्षिण अफ्रीका के अत्याचार से, जो आप और आपके अनुयायी वरी सत्याग्रही बहनों और भाइयों के साथ हुआ कहीं अधिक है। हम अपना वह दुःख जो हमारी 19 लाख आत्माओं के हृदय पर बीत रहा है, सुनाकर आपके कोमल हृदय को दुखित करना उचित नहीं समझते। बस, केवल इतनी ही प्रार्थना है कि आप स्वयं आकर अपनी आंखांे से देख लीजिए, तब आपको अच्छी तरह विश्वास हो जाएगा कि भारतवर्ष के एक कोने में में यहां की प्रजा, जिसको ब्रिटिश छत्रा की सुशीतल छाया में रहने का अभिमान प्राप्त है, किस प्रकार के कष्ट सहकर पशुवत जीवन व्यतीत कर रही है। हम और अधिक न लिखकर आपका ध्यान उस प्रतिज्ञा की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं, जो लखनउ$ कांग्रेस के समय और फिर वहां से लौटते समय कानपुर में आपने की थी, अर्थात मार्च-अप्रैल के महीने में चंपारण आउ$ंगा, बस अब समय आ गया है। श्रीमान् अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करें। चंपारण की 19 लाख की दुःखी प्रजा श्रीमान् के चरण-कमल के दर्शन की टकटकी लगाए बैठी है। और उन्हें आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि जिस प्रकार भगवान् श्रीरामचंद्र के चरण स्पर्श से अहिल्या तर गई, उसी प्रकार श्रीमान् के चंपारण में पैर रखते ही हम 19 लाख प्रजाओं का उद्धार हो जाएगा। 
श्रीमान का दर्शनाभिलाषी
राजकुमार शुक्ल

ध्यान दें तो इस पत्रा में गांधीजी को महात्मा संबोधित किया गया है। क्या सबसे पहले राजकुमार शुक्ल ने ही उन्हें महात्मा शब्द से संबोधित किया और दूसरा यह कि बिहार में तमाम बड़े नेताओं के रहते हुए भी चंपारण की अनपढ़ जनता आखिर गांधीजी में ही अपनी मुक्ति क्यों देखती थी? दक्षिण अफ्रीका की कहानी जरूर यहां तक पहंुच चुकी थी, लेकिन भारत आने के बाद उन्होंने ऐसा कोई आंदोलन नहीं किया था, जिसे देखकर चंपारण की जनता आंख मंूद कर विश्वास करे, लेकिन पढ़े-लिखों से चंपारण की जनता दूरदर्शी साबित हुई।


महात्मा गांधी ने राजेंद्र प्रसाद, बाबू ब्रजकिशोर के साथ अपना काम शुरू कर दिया और इधर धीरे-धीरे नीलहों में डर भी पैदा होने लगा। किसानों की दर्दभरी कहानियां लिपिबद्ध होने लगी और इसमें काफी समय लगा। गांधी के इस आंदोलन में शामिल हो जाने के बाद अंगरेज अधिकारियों ने अपने स्तर से इसकी निगरानी शुरू कर दी। गांधीजी ने वहां के किसानों में निडरता भरी। अपनी बात किसी के भी सामने खुलकर बोलने का जज्बा पैदा किया। मजिस्ट्रेट ने एक लंबी रिपोर्ट गवर्नमेंट को लिखी, जिसका सारांश यह था कि रैयतों में इतनी खलबली हो गई कि अब वे नीलहों को ही नहीं, बल्कि सरकारी अफसरों को भी कुछ नहीं समझते। करीब दस हजार से अधिक रैयतों का बयान लिया जा चुका था। इसकी खबर अंग्रेज सरकार को थी। इस बीच गवर्नमेंट का एक पत्रा आया कि जांच पूरी हो गई होगी, इसलिए रेवन्यु बोर्ड के मेंबर को, जो उ$ंचे पदाधिकारी होते थे, एक सीनियर सिविलियन अंगरेज अफसर थे, गवर्नमेंट रांची से पटना भेज रही है। गांधीजी उनसे मिलें और बातें करें और अपनी जांच का नतीजा बतावें। गांधीजी बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद के साथ पटना गए और रेवन्यु मेंबर से मुलाकात की। रेवन्यु मेंबर ने रिपोर्ट पाकर, गवर्नमेंट के हुक्म से उसकी प्रतियां नीलवरों, सरकारी कर्मचारियों और कुछ दूसरे लोगों के पास भेज दी। रिपोर्ट के उत्तर में सरकारी कर्मचारियों और नीलहों ने अपने-अपने बयान गवर्नमेंट को भेज दी। खलबली चारों तरफ थी कि इसी बीच फिर एक पत्रा रांची से चंपारन पहुंचा। सरकार अब गांधीजी को चंपारन से हटाने पर विचार कर रही थी। इसलिए रांची में रह रहे लेफ्टिनेंट गर्वनर सर एडवर्ट गेट चाहते हैं कि गांधीजी उनसे मिल लें। पत्रा पाकर गांधीजी रांची में चंपारन के किसानों की समस्याओं को लेकर आड्रे हाउस में लेफ्निेेंट गर्वनर से मिले। इसके बाद मुख्य सचिव आदि से भी मिले, जो उस समय यहीं रहते थे। गांधी की यह छोटी अवधि की यात्रा थी। इसके बाद वे बिहार चले गए। इसके बाद आठ जुलाई को लिखे गए दो पत्रा भी रांची के पते से मिलते हैं। इसके बाद 23 सितंबर, 1917 का पत्रा रांची से लिखा मिलता है, जिसे मगनलाल गांधी को लिखा गया था। वह फिर चंपारन समिति की बैठक के सिलसिले में रांची आए थे। 24 सितंबर को चंपारन समिति की बैठक रांची में ही हुई थी। यह बैठक काफी लंबी चली और आंदोलन को लेकर काफी विमर्श हुआ। 25 जुलाई 1917 को गांधी जी ने लीडर अखबार के संपादक के नाम पत्रा रांची से ही लिखा। इसमें कहा कि दक्षिण अफ्रिका से भारत आए मुझे ढाई साल से कुछ अधिक समय हो गया। इस समय का एक चतुर्थांश मैंने स्वेच्छापूर्वक भारतीय रेलों के तीसरे दर्जे में यात्रा करने में बिताया। यह पत्रा काफी लंबा है, जिसे लीडर ने चार अक्टूबर को छापा। 25 सितंबर को ही जमनालाल बजाज को भी पत्रा लिखा। इसके बाद मगन लाल गांधी को, जिसें जिक्र किया कि बुखार से मुक्त नहीं हुआ हंू। बुखार में भी वे चंपारन समिति की बैठक में भाग लेते रहे। एक पत्रा 27 सितंबर को जीए नटेसन को लिखा और उसमें भी अंत में लिखा कि ‘मेरे ज्वर के कारण आप चिंतित न हों। वह अपने समय से ही जाएगा। वह यहां अक्टूबर के पहले सप्ताह तक रांची रहे। रांची में गांधीजी के रहने के बारे में चार अक्टूबर 1917 तक का जिक्र मिलता है। चंपारन के इस आंदोलन में रांची भी जुड़ गया और यह एक प्रमुख केंद्र बन गया। गेट ने एक कमीशन बना दी और गांधीजी को इसका मेंबर बनाने के लिए राजी कर लिया। इसके बाद कमीशन का काम बेतिया से शुरू हुआ। राजेंद्र प्रसाद लिखते हैं-‘ कुछ सरकारी अफसरों और कुछ नीलवरों ने अपने-अपने लिखित बयान दिए, उनके जबानी इजहार भी लिए गए। कमिशन मोतिहारी में भी कई दिनों तक बैठा। उनके मेंबरों ने कितनी ही नील-कोठियों में जाकर नीलवरों के इजहार लिए और उनके कागज-पत्रा भी देखे गए।...इजहार का काम खत्म हो जाने पर रिपोर्ट लिखने का समय आया। सर एडवर्ड गेट ने महात्माजी से कह दिया कि कमीशन यदि सर्वसम्मति से रिपोर्ट देगा तो उस रिपोर्ट पर गवर्नमेंट आसानी से काम कर सकेगी। पर यदि रिपोर्ट में भिन्न-भिन्न मत सदस्यों ने प्रकट किए तो गवर्नमेंट को उस रिपोर्ट के आधार पर काम करने में कठिनाई होगी।’ अंततः रिपोर्ट सर्वसम्मति से सरकार को भेजी गई। जांच रिपोर्ट की प्रायः सभी बातें मंजूर कर 18 अक्टूबर 1917 को सरकार ने अपना मंतव्य प्रकाशित कर दिया। उसके बाद निलहों में खलबली मच गई। सरकार ने रिपोर्ट के आधार पर एक कानून बनाया, जिसके जरिए तीन कठिया प्रथा गैरकानूनी करार दी गई और लगान में इजाफा भी उपर्युक्त मात्रा में कम कर दिया गया। 19 नवंबर को विधान परिषद में मि मौड ने चंपारण भूमि विधेयक प्रस्तुत किया। इस अवसर पर उन्होंने एक व्याख्यान दिया और 50-60 वर्षों का चंपारन में नील-संबंधी झगड़ों का संक्षिप्त इतिहास भी प्रस्तुत किया। यह विधेयक एक प्रवर समिति को विचारार्थ भेज दिया गया। समिति ने कुछ संशोधन की बात कही। संशोधित विधेयक 20 फरवरी 1918 को सरकारी गजट मंे प्रकाशित हुआ। अंत में चार मार्च 1918 को परिषद इस विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर देती है। इस अधिनियम का सार यह था कि मालिक और रैयत के बीच किसी अनुबंध के बावजूद रैयत मालिक के लिए अपनी जोत के किसी हिस्से में कोई खास फसल उपजाने के लिए बाध्य नहीं होगा तथा उक्त अनुबंध रद समझा जाएगा। इस प्रकार की कोई प्रविष्टि यदि सर्वे खतियान में है तो उसे भी रद कर दिया जाता है। अब रैयत की स्वेच्छा पर निर्भर है कि वह मालिक को किसी खास फसल की निश्चित रकम तौलकर देने के लिए अनुबंध कर सके, पर उसकी जोत पर पाबंदी नहीं रह जाती। इस प्रकार तिनकठिया प्रथा समाप्त हुई और नील का झगड़ा भी। हालांकि कुछ लोगों ने टीका-टिप्पणी भी की, लेकिन गांधीजी को विश्वास था कि तीन कठिया प्रथा उठ जाने के बाद नीलहे यहां ज्यादा दिन ठहर नहीं सकते, क्योंकि उनका कारबार जुल्म और जबरदस्ती से चलता था-अगर यह बंद हो जाए तो वे यहां ठहर नहीं सकते। हुआ भी यही। महात्मा गांधी के चंपारन जाने और इस जांच तथा रिपोर्ट और नए कानून बनने के थोड़े दिन बाद नीलहे अपनी जमीन, कोठी, माल-मवेशी बेचकर चले गए। गांधीजी के पहुंचते ही उनका रोब उठ गया था। उन्होंने उन्हीें रैयतों और बेतिया राज के हाथों में अपना सबकुछ बेच डाला।

गांधीजी की यह पहली जीत थी, जिसमें एक बूंद रक्त भी नहीं बहा था। इस जीत से चंपारन के रैयतों का भी आत्मविश्वास बढ़ा और उनके भीतर का डर गायब हुआ। इसका परिणाम आगे चलकर भी दिखा। पर गांधीजी इस जीत से ही उत्साहित नहीं थे। वे पिछड़े गांवों में कुछ सकारात्मक काम भी करना चाहते थे। छुआछूत का शिकार तो आते ही हुए थे, लेकिन कुछ और भी समस्याएं थीं। वह जानते थे कि शिक्षा बहुत जरूरी है। आज नीलहे गए, कल दूसरे आ जाएंगे और जुुल्म कभी र$केगा नहीं। इसलिए तीन-चार पाठशालाएं खोलीं। इन पाठशालों में पढ़ाने वाले त्यागी कार्यकर्ता बिहार से न्यून महाराष्ट्र और गुजरात से ज्यादा थे। इनमें महिलाएं भी शामिल थीं। बिहारियों में केवल धरणीधर एक स्कूल चलाते थे। बाहर के महादेव भाई देसाई, उनकी पत्नी दुर्गाबाई, साबरमती आश्रम के श्री नरहरि पारिख, उनकी पत्नी मणि बहन, स्वयं कस्तूरबा भी रहीं। बंबई के वामन गोखले सहित कई नाम। पर ये नाम अब खो गए हैं?
बहरहाल, चंपारन नीलहों के आतंक से मुक्त हुआ। इसका पूरा-पूरा श्रेय राजकुमार शुक्ल को जाता है, जिन्होंने गांधीजी को चंपारन आने के लिए विवश किया। चंपारन के बाद गांधीजी अब देश की आजादी में सक्रिय हो जाते हैं और राजकुमार शुक्ल अपने अवसान की ओर। एक बड़ा मार्मिक प्रसंग का हवाला राय प्रभाकर प्रसाद ने दिया है---
शुक्लजी गांधीजी को कई पत्रा लिखते हैं। वे लिखते हैं कि अब बुझने ही वाला हूं, क्या आप चंपारन नहीं आएंगे? शुक्ल जी धैर्य टूट जाता है औरवे एक दिन मोतिहारी से साबरमती के लिए प्रस्थान कर जाते हैं। पंद्रहवें-सोलहवें दिन उन्हें गांधी और बा के दर्शन होते हैं। बा की आंखें भर जाती हैं। पूछती हैं-यह आपको क्या हो गया पंडितजी? शुक्लजी की आंखें डबडबा जाती हैं, गला रुंध जाता है। गांधीजी उनसे कहते हैं, आपकी तपस्या अवश्य रंग लाएगी। आज नहीं तो कल देश आजाद होगा। लेकिन शुक्लजी पूछते हैं, क्या वह दिन मैं देख सकूंगा, तो गांधीजी निरुत्तर हो जाते हैं। आश्रम में कुछ दिन ठहरकर शुक्लजी वापस चंपारन आ जाते हैं और 20मई, 1929 को उनका निधन हो जाता है और चंदे से उनका दाह-संस्कार होता है। जब शुक्लजी के निधन की खबर क्रूर-अत्याचारी नीलहे एमन को मिलती है तो वह खुश नहीं होता है। उसके चेहरे पर विषाद छा जाता है। वह अनायास बोल पड़ता है, ‘चंपारन का वह अकेला मर्द था, जो मुझसे 25 साल तक लड़ता रहा।’ ऐमन इस बात को जानता था कि शुक्लजी के घर-परिवार की सारी संपत्ति कोठियों से मुकदमा लड़ते-लड़ते तथा गरीबों और मजदूरों की मदद करते-करते समाप्त हो गई है। उनके घर परिवार में कोई कमाउ$ व्यक्ति नहीं है। अपने एक कर्मचारी के मार्फत ऐमन शुक्लजी के श्राद्ध के लिए विधवा तथा बेटी दामाद को तीन सौ रुपये भेजवाता है। कर्मचारी रुपये लेकर हक्का-बक्का साहब का मुंह ताक रहा है। कुछ क्षण बाद बोलता है, ‘हुजूर वह तो आपका दुश्मन था...’ बात काटकर ऐमन कहता है, ‘तुम उसकी कीमत नहीं समझोगे।’ 
श्राद्ध के दिन डॉ राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह बाबू, ब्रजकिशोर बाबू आदि दर्जनों नेता सतवरिया में शामिल हुए। ऐमन भी उसमें शामिल हुआ। राजेंद्र बाबू उससे पूछते हैं, आपका दुश्मन तो चला गया, अब खुश होइए। ऐमन वही बात दुहराता है...फिर कहता है, अब ज्यादा दिन मैं भी नहीं बचूंगा। चलते-चलते ऐमन शुक्लजी के बड़े दामाद सरयू राय को अगले दिन कोठी पर बुलाता है। वह मोतिहारी के पुलिस कप्तान के नाम एक पत्रा देता है। उसी पत्रा के आधार पर सरयू राय को पुलिस जमादार की नौकरी मिलती है। उसके सात महीने बाद ऐमन भी इस दुनिया से विदा हो जाता है।
इस शताब्दी वर्ष में अपने भूले नायकों को भी याद करने की जरूरत है, पीछे मुड़कर देखने की भी।