शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

गांधी चबूतरा

  गांधी के आने की खबर आग की तरह फैल गई थी।  
  देश में आजादी का आंदोलन चल रहा था। गांव-शहर-कस्बे इस आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने में पूरी तरह मुब्तिला थे। दिल्ली से बहुत दूर गाजीपुर जिले का जमानियां स्टेशन भी अंग्रेजों की गुलामी के जुए को उतार फेंक देना चाहता था। आंदोलन दर आंदोलन जारी था। पड़ोस में धानापुरकांड हो चुका था। आजादी के सिपाहियों ने थाने पर यूनियन जैक उतारकर तिरंगा लहरा दिया था। गरम और नरम दल दोनों अपने-अपने ढंग से देश को आजाद कराने में सक्रिय थे। गान्ही बाबा का अलग प्रभाव था। उनकी छवि ज्यादा प्रभावित कर रही था। तन पर महज एक कपड़ा। उन्हें लोग महात्मा ठीक ही कह रहे थे। लोग सोचते, असल महात्मा यही हैं। वे नहीं, जो मठों-मंदिरों मंे बैठकर रामनाम गाते हुए आडंबरपूर्ण जीवन जीते हुए अपनी तोंद बढ़ा रहे हैं। हवा में करो या मरो की अनुगूंज साफ सुनाई देने लगी थी। आंख मचियाते हुए एक सुबह जब सूरज अपनी आंखें खोल रहा था तभी जमानियां स्टेशन में उड़ती खबर कहीं से आई कि महात्मा गांधी टेन से पटना की ओर जा रहे हैं। किस टेन से, यह ठीक-ठीक पता नहीं था। लेकिन खबर पक्की थी। गान्ही बाबा के दर्शन का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा- प्यारे लाल ने सोचा। लेकिन दिक्कत यह थी कि गाड़ी रुके कैसे?
   खबर के बाद कुछ उत्साही युवाओं ने टेन को प्लेटफार्म पर रोकने की सोची ताकि महात्मा गांधी का दर्शन लाभ मिल सके। स्टेशन छोटा था, लोग छोटे थे, लेकिन सपने बड़े थे। सोचने का सिलसिला शुरू हुआ तो आखिर में गाड़ी को रोकने की तरकीब मिल ही गई। इसके बाद तो सैकड़ों लोग स्टेशन पर दर्शन करने के लिए जमा हो गए। गाड़ी के आने की सूचना घंटी द्वारा मिल चुकी थी। थोड़ी देर बाद गाड़ी की खबर होते हुए सिग्नल भी हरा हो गया। अब इसे लाल करना था ताकि गाड़ी रुक सके। कुछ उत्साही प्लेटफार्म से दूर, दक्षिणी छोर पर सिग्नल पोल के नीचे खड़े हो गए और किसी तरह तरकीब निकालकर हरा सिग्नल को लाल कर दिया। उत्साह और बढ़ गया। सिटी बजाती हुई दूर से टेन दिखाई देने लगी। सिग्नल लाल देखकर आखिरकार टेन आहिस्ते-आहिस्ते प्लेटफार्म को छूती हुई रुक गई। गान्ही बाबा की जय, महात्मा गांधी की जय से स्टेशन का प्लेटफार्म गूंजने लगा। सैकड़ों की संख्या में लोग महात्मा का दर्शन करने आए थे। उत्साह की कोई सीमा नहीं थी, लेकिन इस उत्साह में स्टेशन मास्टर के हाथ-पांव फूलने लगे। जिस गाड़ी का यहां ठहराव ही नहीं था, और जिसमें महात्मा गांधी सफर कर रहे हों, वह बिना ठहराव के प्लेटफार्म पर बिना किसी पूर्व सूचना के रुक गई थी। इधर, जयकारा और नारा और तेज होने लगा। तब किसी तरह गान्ही बाबा अपनी लाठी लिए चिरपरिचित अंदाज के साथ बोगी से बाहर आए और ‘दर्शन’ देकर फिर बोगी में समाने लगे, तभी नाटे कद के महावीर जायसवाल ने समय की नजाकत भांपते हुए गांधीजी से एक फरियाद कर दी।
 -महाराज इहां की पुलिस बहुते तंग करती है। जेहल भेजने की धमकी देती है।
गांधीजी अचानक इस फरियाद की अपेक्षा नहीं किए थे। उन्हांेने भी तुरंत सादे कागज की फरमाइश कर दी-
कागज दो-गांधी जी ने कहा।
महावीर ने तत्काल एक कागज का टुकड़ा और कलम भी मौके की नजाकत को देखते हुए थमा दिया। जैसे पहलेे से इसका अंदेशा हो...।
 गांधीजी ने लिखकर उस को वापस कर दिया।
 चीट पर बस इतना ही लिखा था, इन्हें तंग न किया जाए। नीचे संक्षित हस्ताक्षर था-‘गांधी’।
  ये महावीर जायसवाल थे, जिनका पेशा अखबार बांटना था। उस समय ‘आज’ की एकमात्रा अखबार था, जो बनारस में छपता था और 70 किमी दूर जमानियां टेन से पहुंचता था। महावीर यही काम करते थे। 1947 का समय आया और देश आजाद हुआ। आजादी के बाद महावीर जायसवाल ने जुगत भिड़ाकर सरकारी कोटे की दुकान ले ली। पर अखबार बेचने का काम भी साथ-साथ चलता रहा। कोटे के दुकान से कभी-कभी घटतौली भी जाने-अनजाने हो जाया करती थी। गरीब-गुरबा शिकायत करती तो पुलिस आती और फिर महावीर गांधीजी का वही चीट दिखा देते, फिर पुलिस कुछ नहीं बोलती और चुपचाप चली जाती। उसे लगता कि इस आदमी की पहुंच बहुत दूर तक है। गांधीजी दुनिया में नहीं थे, उनकी चीट महावीर के लिए किसी सनद से कम नहीं थी। तो महावीर का आजादी में कुल योगदान यही था, उन्होंने जमानियां वालों को गान्ही बाबा का दर्शन करा दिया था।
 इस तरह उस ऐतिहासिक घटना की याद में उस छोटे से बाजार में एक चबूतरा गांधीजी के नाम पर बन गया। चबूतरा एक तिराहे पर सड़क के किनारे बना, जिसे लोग चौक नाम देते थे। पर, रास्ता तीन ओर ही जाता था, और इन तीन के अलावा एक गली की ओर भी रास्ता खुलता है। शायद, गली को भी इसमें जोड़ दिया गया। इसलिए, लोग उसे चौक ही पुकारते हैं।
  लंबा अरसा गुजर गया। इस बीच कितने बसंत आए, चले गए। कई शरद की ऋतुएं आईं और चुपचाप चली गईं। पर 1998 का साल कुछ और था। शरद की शाम थी। दुर्गापूजा को लेकर बाजार में चहल-पहल बढ़ गई थी। स्टेशन के पास मां दुर्गा का पंडाल सजा था। सप्तमी की तिथि थी। मां का पट खुल चुका था। एक ओर महिलाओं की लाइन लगी थी और एक ओर पुरुाों की। डॉ ईश्वरचंद्र जायसवाल, जो डॉक्टरी कम, समाजसेवा ज्यादा करते थे, अग्रिम पंक्ति में खड़े मां का ध्यान कर रहे थे। हाथ जोड़े। आंख बंद। मन ही मन संस्कृत के श्लोक ओठों से बुंदबुंदा रहे थे कि  भक्तों का प्रसाद चढ़ाने वाले पंडाल के एक स्वयंसेवक सतीश ने उनके कंधे को हिलाते हुए आहिस्ते से उनके कान में बोला...ऐ डॉक्टर, डॉक्टर...;
  डॉक्टर ने अचकचाकर अचानक आंख खोली। बोला-तोहके पुलिस खोजत बा। यह सुनते ही डॉक्टर को जोर का धक्का बहुत जोर से लगा। सांस तेज हो गई और दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।...डॉक्टर सोच रहे थे, प्रसाद देने के लिए झकझोर रहा है। पर पुलिस का नाम सुनते ही डॉक्टर के होश उड़ गए। नवरात्रा-दशहरा का समय और इधर पुलिस...। डॉक्टर के शरीर का रक्तसंचार अचानक जैसे रुक गया। चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। थोड़ी देर पहले से उत्सव का जो रौनक उनके चेहरे पर था, गायब हो गई। चेहरा जैसे पीला पड़ता जा रहा था....। आस-पास जलती हजारों झालरों की लाइटें अचानक बुझती प्रतीत हुईं। चारों ओर अंधेरा पसरने लगा। भक्तों की भीड़ का शोर भी निर्जन वन की तरह सांय-सांय करने लगा। डॉक्टर अपने बेजान पैरों से किसी तरह चुपचाप पंडाल से निकले और मुख्य मार्ग छोड़कर स्टेशन के रास्ते छिपते-छिपाते घर में समा गए। फिर घर का दरवाजा बाहर से भी बंद कर दिया। पत्नी ने बाहर से ताला लगा दिया। कोई आकर पूछता, डॉक्टर हैं, घर के भीतर से आवाज आती, नहीं...। मरीज देखने गए हैं। डॉक्टर की आंखों से नींद गायब थी। सांसें रह-रहकर धोखा दे रही थीं। सिर बहुत भारी हो रहा था। सोच रहे थे, किस मुसीबत मंे पड़ गए हैं। जो भीे काम हाथ में लेते हैं, कोई न कोई विघ्न आ ही जाता है....।      
 सन् 1997 में जब देश में आजादी की पचासवीं वर्ागांठ मनाई जा रही थी जो जमानियां में इसका भव्य आयोजन उसी चौक पर हुआ, जहां एक ओर बिना गांधी के पिरामिड आकार का पांच फीट का चबूतरा खड़ा था। बुजुर्ग लोग कहते, यह चबूतरा उसी घटना की याद में बनाया गया, लेकिन चबूतरा के बाद ऐसा कभी संयोग ही नहीं आया कि उस पर कोई गांधी की प्रतिमा स्थापित हो सके। इसी साल प्रज्ज्वलित सेवा संस्थान ने एक पत्रिका निकालने की सोची और इसी साल यह संकल्प भी लिया गया कि यहां अब गांधी लंबे समय तक वनवास नहीं भोगेंगे। अब वनवास खत्म हो गया और यहां गांधीजी की प्रतिमा स्थापित होकर रहेगी। इस तरह योजनाएं बनने लगीं। इटिंग-मीटिंग के चले लंबे दौर के बाद निर्णय हुआ कि इस नगर पालिका को भी शामिल कर लिया और पालिका के अध्यक्ष से गांधीजी की प्रतिमा ली जाए, बाकी खर्च संस्थान व्यवस्था करेगा। नगर पालिका से बातचीत हो गई। वह तैयार हो गया और इस तरह उसने गांधीजी की आवक्ष प्रतिमा बनवाकर पानी टंकी के कार्यालय में रखवा दिया। इधर, संस्थान ने चबूतरे पर संगमरमर लगवा दिया और एक संस्थान का शिलापटृ भी। नगर पालिका के शिलापटृट के लिए सबसे उ$पर जगह छोड़ दिया गया था। अब सारी तैयारियां अंतिम दौर में पहुंच गई थीं कि नगर पालिका के अध्यक्ष को किसी ने समझा दिया कि चबूतरे पर संस्थान का कोई शिलापट्ट नहीं लगेगा। नगर पालिका का लगेगा। अध्यक्ष भी बहकावे में आ गए। बहुत समझाने पर भी अध्यक्ष नहीं मानंे। पानी टंकी के कार्यालय में, जो निगम का एक तरह से उस समय अस्थायी कार्यालय हुआ करता था, उसमें संस्थान और नगर पालिका के प्रतिनिधि के अलावा मंदिर समिति के लोग साथ बैठे, लेकिन कोई हल नहीं निकला। मंदिर समिति के अंदर ही चबूतरा आता था। इसलिए वह भी एक पक्ष था। नगर पालिका के प्रतिनिधि ने संस्थान की ओर व्यंग्य मारा--नगर पालिका एक बड़ी संस्था है। टेबल पर रखे चाय का कुल्हड़ की ओर इशारा करते हुए जोड़ा, और आप इस कुल्हड़ की तरह?? यह बात मिर्ची की तरह लग गई। मामला बहुत गर्म हो गया...। नगर पालिका के प्रतिनिधि को जवाब दे दिया, आप अपनी मूर्ति अपने पास रखें। आपकी मूर्ति नहीं लगेगी। यह बात मिर्ची की तरह लगी और अध्यक्ष तक बात मिर्च-मसाला के साथ पहुंची। अहंकार को ठेस लगा और चबूतरा नपवाने की धमकी दे डाली। बात कोतवाली तक गई। वहां भी कोई समझौता नहीं हो सका और अंततः पालिका ने जमीन नपवाने की ठानी। लोगांे ने इसका भारी विरोध किया। मंदिर समिति ने जोरदार आवाज उठाई, चबूतरा मंदिर की जमीन मंे है। नगर पालिका का कोई अधिकार नहीं है! पर पालिका के अध्यक्ष की पहंुच बहुत दूर तक थी। लखनउ$ एक तरह उनका दूसरा घर था। पुलिस-थाना भी उनका। पानी टंकी में गांधी की प्रतिमा बोरे में कैद थी। एक विचार आया कि रात में उस प्रतिमा को उठाकर यहां स्थापित कर दिया। स्थापित होने के बाद कोई कुछ नहीं कर सकता? लेकिन इसे स्थगित कर दिया गया। अब इस तनातनी में गांधीकी प्रतिमा के लिए पैसा चाहिए। जो पैसा था, सब संगमरमर और मजदूरी में खत्म हो गया। लेकिन बात अब आन-बान-शान और जमानियां की थी। एक ही आसरा था, उम्मीद वहीं थीं। मिल पर पहुंचे और अनिल भैया से कहा गया कुछ मदद कीजिए। पहले तो खूब गाली दी। यह उनका अधिकार था। जब भी जरूरत होती, सामाजिक कार्यों में वे मदद करते। इस बार भी यहीं आसरा था। हम लोग पहले गाली खाए और फिर वे अंदर गए और कुछ पैसा लाकर दिए। अभी कुछ और की जरूरत थी। वहीं पर भाई जान यानी अजहर खान मिल गए। सब बात सुनाई गई तो उन्हांेने तुरंत मदद की। कुछ और लोग भी आए और फिर शाम तक मूर्ति के लिए पैसा जुट गया। अब बनारस के लिए गाड़ी की जरूरत थी। एक मित्रा की वैन मिल गई और इस तरह बनारस से गांधीजी की प्रतिमा तत्काल खरीदकर लाई गई। बनारस से नौ बजे रात को चले और 11 बजे तक जमानियां के बाहरी अलंग पर गाड़ी को रोक दिए। चांदनी छिटक रही थी और खेत दुधिया रोशनी से नहाए हुए थे। रात को हवा भी बहुत सुंदर बह रही थी। प्रकृति का यह नजारा देख सारी थकान मिट गई थी। आधी रात के बाद वैन आगे बढ़ी और फिर गांधी चौक पहंुची। यहां पांच-छह साथी पहले से तैयार थे। प्रतिमा को चिपकाने वाला मसाला भी तैयार था। चुपचाप चौक पर संगमरमर की भारी प्रतिमा को बोरे से आजाद किया गया और फिर किसी तरह उसे चबूतरे पर स्थापित की गई। स्थापित करने में पसीने छूट रहे थे। एक तो भय। कोई देख न ले। कोई पुलिस वाला गश्ती करते हुए यहां न पहुंच जाए। अन्यथा सब खेल गुड़-गोबर। इसे पूरी तरह गोपनीय रखा गया था। कुछ लोगों को ही यह बात पता थी। जल्दी-जल्दी प्रतिमा को चबूतरे पर स्थापित करने के बाद जिसे बोरे से उन्हें आजाद किया गया था, उसी बोरे से फिर गांधीजी को ढंक दिया गया। पूरी तसल्ली के बाद उस रात सभी अपने-अपने घर गए और लंबे समय के बाद चैन की नींद सोए।
   सुबह जब सूरज ने आंखें खोली तो लोगों की आंखें चौंधिया गई। अचानक चबूतरे पर उन्हें कुछ भारी-भरकम चीज दिखी। समझने में देर नहीं लगी कि यह गांधीजी की प्रतिमा है। फिर तो सामने चाय की दुकान पर काना-फूंसी होने लगी। तरह-तरह की चर्चा। गांधीजी स्थापित हो चुके थे और यह बात जमानियां से 14 किमी दूर नगर पालिका अध्यक्ष के कान में पहंुचने में देर नहीं लगी। काटो तो खून नहीं। लौंडों ने नगर पालिका को चुनौती दे दी थीं। यह हंसी का खेल नहीं था। लेकिन गांधीजी तो गांधीजी ठहरे। टस से मस नहीं हुए। उनकी प्रतिमा को वहां से हटाना मतलब राटद्रोह...। बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले...। अब जब नगर पालिक थक-हार गई तो मंदिर समिति को न जाने कहां से सद्बुद्धि आ गई और उसने दांवा ठोंक दिया। मंदिर के पुजारी आकर शिलापट्ट ही उखाड़ने लगे। उन्हें पता नहीं था कि जहां गांधी बाबा स्थापित हो गए, वहां की एक ईंट भी उखाड़ना कानून की नजर में अपराध था। पुजारी बाबा छेनी-हथौड़ा लेकर उखाड़ने जा ही रहे थे कि सामने पान की दुकान में पान खा रहे थानेदार ने उन्हंे ऐसा डपटा कि तेजी से वहां भागे। इसके बाद तो यहां पुलिस वालों का पहरा भी लग गया। पुलिस वालों तक बात पहुंची। उन्हें नगर पालिका ने बरगलाया और वह संस्थान के लोगांे को खोजने लगा। अब क्या था? दशहर के पर्व और पुलिस की खोजबीन....पुलिस हम सबको तलाश रही थी। उसी पान की दुकान पर भाजपा के नेता और व्यवसायी दारोगा सेठ ने थानेदार से कहा कि एक भी लड़के को गिरफ्तार किया तो परिणाम बुरा होगा। पर्व-त्योहार चल रहा है। यह बात पता चला किसी तो पुलिस चौकी नहीं बचेगी। अब पुलिस वाले भी इस पचड़े में नहीं पड़ना मुनासिब समझा। त्योहार के समय कुछ उ$ंच-नीच हो गया तो मामला दूसरा रंग भी ले सकता है। लेकिन यह खबर तो फैल ही गई थी कि लोगांे को पुलिस खोज रही है। डॉक्टर तक यह बात पहुंची तो वे तेजी से घर की ओर लपके...।
  दिन बीते, रात आई। इस तरह दिसंबर का महीना आ गया। दिसंबर की एक सांझ, भव्य समारोह में बोरे से महात्मा गांधीजी आजाद कर दिए गए। गांधीजी आज भी चौक पर अपनी निगाह गड़ाए हैं।

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शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

सर अली इमाम ने बनवाया था अपनी बेगम के लिए अनीस महल


हजारीबाग रोड पर कोकर चौक से आधा किमी दूरी पर दाहिने एक मजार है। आने-जाने वाले इस मजार को जरूर देखते हैं, लेकिन यह मजार किसकी है, पता नहीं। यहां हर दिन अकीदतमंदों की भीड़ भी लगी रहती है। गुरुवार को यह भीड़ और बढ़ जाती है। पर, यह किसी सूफी की मजार नहीं। बल्कि यह मजार एक जज और नेता की है, वह नेता, जिसने पहली बार बंगाल से बिहार को अलग करने की मांग की थी और बाद में भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाने का प्रस्ताव दिया था। 



यह मजार, अली इमाम की है। 11 फरवरी 1869 को पटना जिले के नियोरा गांव में नवाब सैयद इमदाद इमाम के घर उनका जन्म हुआ था और 31 अक्टूबर, 1932 की रात रांची में उनका देहांत। मौत से चंद घंटे पहले अपने बेटे नकी इमाम को अपने बाग के एक गोशे में ले गए और छड़ी से जमीन के एक हिस्से पर निशान बनाया और कहा, इसी जगह मेरी कब्र बनेगी। उसी रात जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा तो तमाम मलाजिमों को अपने पास बुलाया और सभी से माफी मांगी। उस सुबह


वे ठेकेदार पर बहुत गुस्सा हो गए थे, उसको भी बुलाकर माफी मांगी और बेटे नकी इमाम को का कि मेरे तमाम अजीजों, दोस्तों, रिश्तेदारों को मेरा सलाम कहना और कहना कि मेरी जात से अगर कोई तकलीफ पहुंची है तो मुझे माफ करें। इसी दौरान उन्होंने आखिरी सांस ली। सर अली इमाम के परदादा, खान बहादुर सैयद इमदाद अली पटना के सब ऑडिनेट जज के पद से रिटायर हुए। उनके बेटे, खान बहादुर शम्स-उल-उलेमा सैयद वाहिद-उद दीन पहले हिंदुस्तानी थे, जिन्हें जिला मजिस्ट्रेट बनाया गया था। अली इमाम के पिता सैयद इमदाद इमाम असर पटना कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर के साथ एक शायर भी थे। इनके बड़े भाई सैयद हसन इमाम भी जज रहे और उनका निधन 19 अप्रैल, 1933 को 61 साल की उम्र में जपला, पलामू में हुआ।

प्रेम की गवाह इमाम कोठी 
मजार के पीछे ही उनकी एक कोठी है। लाल ईंटों और सूर्खी से बनी। इसे लोग इमाम कोठी आज भी कहते हैं, लेकिन अब यह बिक गई है। इसे मालिक अब दूसरे हैं। पर सौ साल से ज्यादा पुरानी यह कोठी उसी तरह बुलंद है, जो स्कॉटिश कैसल स्टाइल में बनी है। लोग कहते हैं, यह कोठी प्रेम का प्रतीक है। अंग्रेजी हुकूमत के पहले बिहारी बैरिस्टर अली इमाम हैदराबाद डेक्कन के प्रधानमंत्री भी थे। अपनी बेगम अनीस फातिमा के लिए इसे बनवाया था। अनीस बेगम सर सैयद अली इमाम की तीसरी बेगम थी और उन्हीं के लिए उन्होंने रांची में यह इमारत बनवाई थी। उनकी चाहत तो यह थी कि मरने के बाद उनकी और उनकी बेगम की कब्र साथ रहे, जिससे वे मरकर भी जुदा न हों। लेकिन उनकी यह चाहत पूरी न हो सकी। उनकी मजार तो यहां बन गई। उन्हें यहां दफन भी कर दिया गया, लेकिन जब बेगम का निधन हुआ तो उस समय वे पटना में थीं और उन्हें पटना में ही दफन कर दिया गया, लेकिन आज भी एक मजार खाली है।

कोठी को बनने में लगे बीस साल 
इमाम कोठी को बनने में 20 साल लगे थे। इसका निर्माण सन् 1913 में शुरू हुआ था और 1932 में यह पूर्ण हुआ। उस समय इसे बनाने में 20-30 लाख रुपए लगे थे। यह कोठी, जिसे अनीस कैसल भी कहा जाता है, 21 एकड़ में था और यहां 500 लीची और आम के पेड़ थे, लेकिन आज यह जगह सिमट गई है। तीन तल्ले वाली इस कोठी में 120 कमरे हैं। इसमें प्रवेश करने के लिए छह दिशाओं से दरवाजे बने हुए हैं। उनके समय में इस कोठी में अंग्रेज ऑफिसर्स भी आया-जाया करते थे। जिस साल उनके सपनों का यह महल बनकर तैयार हुआ, दुर्भाग्य से उसी साल 1932 में उनका निधन हो गया। इसके बाद तो कोठी बेरौनक होने लगी।

पहली पत्नी के निधन के बाद ईसाई महिला से की शादी
अपनी पहली पत्नी नईमा खातून के निधन के बाद 1916 में उन्होंने एक ईसाई महिला रोज मैरी से शादी की। शादी के बाद रोज मैरी, मरियम बनी। अली इमाम ने मरियम के लिए अनीसाबाद में मरियम मंजिल बनवाया। यह जब तक बन कर तैयार हुआ, मरियम का निधन हो गया। अली इमाम को इस बात का दु:ख हमेशा रहा कि इस इमारत के बनने के बाद मरियम ज्यादा दिनों तक उनके साथ नही रह सकीं। इसके बाद अली इमाम ने तीसरी शादी अनीस फातिमा से की। जो लेडी अनीस के नाम से मशहूर हुईं। उनके लिए रांची में एक बेहद खूबसूरत ईमारत बनवाया जो अनीस कैसल के नाम से जाना गया और बाद में इमाम कोठी।

बेगम ने बनवाई मजार
रांची में इस मजार को उनकी विधवा बेगम ने बनवाया। मजार के अंदर एक पत्थर पर इसका जिक्र भी है। 1932 में सर अली इमाम का देहांत हुआ और तीन साल में यानी 1935 बनकर तैयार हो गया। फर्श संगमरमर का है और दीवारें लाल पत्थर की हैं।

एक हिदू कर रहे हैं मजार की देखभाल
सत्रह सालों से एक ङ्क्षहदू मजार की देखभाल कर रहे हैं। पहले काफी उपेक्षित था। घास-फूस जमा हो गए थे, लेकिन फिर इसकी देखभाल शुरू हुई। आफ यह मजार साफ-सुथरा है और हर सुबह लोग यहां आते हैं। गुरुवार को भीड़ ज्यादा रहती है। यहां लोग आते हैं, मत्था टेकते हैं, दुआ मांगते हैं।


1917 में पटना हाई कोर्ट के बने जज
अली इमाम बैरिस्ट्री की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। वहां से वे जून, 1890 में पटना वापस आए और नवंबर 1890 से कलकत्ता हाई कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू कर दी। बाद में वे पटना हाई कोर्ट में 1917 में जज बने। वकालत के साथ-साथ राजनीति में भी सक्रिय रहे। 1906 में जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई तो अली इमाम की प्रमुख भूमिका रही। अप्रैल 1908 में पहला बिहार राज्य सम्मेलन हुआ तो इसकी अध्यक्षता अली इमाम ने की। जिसकी पूरी जिम्मेदारी सच्चिदानंद सिन्हा और मजहरुल हक के कंधों पर थी। 30 दिसंबर 1908 को अली इमाम की अध्यक्षता में मुस्लिम लीग का दूसरा सत्र अमृतसर में हुआ। इसी साल उन्हें सर की उपाधि प्रदान की गई। 1911 में वे भारत के गवर्नर जनरल के एग्जीक्यूटिव कौंसिल के सदस्य बने और फिर इसके उपाध्यक्ष। 25 अगस्त 1911 को सर अली ईमाम ने ङ्क्षहदुस्तान की राजधानी कलकत्ता को बदल कर नई दिल्ली करने का पूरा खाका उस समय भारत के वायसराय लार्ड हार्डिंग के सामने पेश किया, जिसे स्वीकारते हुए अंग्रेजों ने भारत की राजधानी कलकत्ता को बदल कर नई दिल्ली करने का एलान कर दिया।
बांकीपुर पटना की एक सभा में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रासाद ने सर अली इमाम को आधुनिक बिहार के निर्माता की संज्ञा दी। 1910 से 1913 के बीच वक्फ बिल उनकी निगरानी में तैयार हुआ। 1914 मे उन्हे नाईट कमांडर (के.सी.एस.आई) के खिताब से नवाज गया। 1915 मे लॉ मेंबर के पद से रिटायर हुए। 3 फरवरी 1916 को पटना हाई कोर्ट की स्थापना जब हुई तो उसके बाद सितंबर 1917 मे सर अली ईमाम को पटना हाई कोर्ट का जज बना दिया गया। वे दो साल तक रहे। अगस्त 1919 में निजाम हैदरबाद के प्रधानमंत्री बने। वे 1922 तक रहे। 1923 में फिर से पटना हाई कोर्ट वकालत शुरू की और साथ ही देश की आजादी के लिए खुल कर हिस्सा लेने लगे। कांग्रेस की कई नीतियों का खुल कर समर्थन किया। स्वराज और स्वादेशी की पैरवी की। 1927 में सर अली ईमाम ने साइमन कमीशन का जमकर विरोध किया। 1931 में सर अली ईमाम ने गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया और अगले साल ही इनका निधन हो गया।  

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

तत्रभवान् राजा रामपाल सिंह

गोपालराम गहमरी
  राजा रामपाल सिंह हिन्दी के प्रमियों मे थे। उन्होंने विलायत में 14 वर्ष प्रवास किया था। वहां से हिन्दी और अंगरेजी में एक साप्ताहिक पत्रा ‘हिन्दोस्थान’ निकालते थे। आपने स्वदेश लौटकर हिन्दी में पहले पहल ‘ हिन्दोस्थान’ दैनिक निकाला था उसके पहले कानपुर से ‘भारतोदय’ कुछ दिनों तक उदय होकर अस्त हो गया था। स्थायी रूप से कालाकांकर ‘हिन्दोस्था
न’ ही हिन्दी रसिकों को रोज दर्शन देने वाला हुआ।
   राजा रामपाल सिंह देशी नरेशों में उस समय एक हो कांग्रेसी थे। हम बात सन् 1888 ई की कहना चाहते हैं जिन दिनों मिल्टर जार्ज यूलके सभापतित्व में कांग्रेस का चौथा अधिवेशन करने के लिए प्रयाग के सुयशवान कांग्रेसी श्री अयोध्या नाथ महोदय अथक परिश्रम कर रहे थे। उस अधिवेशन के हम इसलिए प्रशंसक हैं कि उसी अधिवेशन में पहले पहल कांग्रेस के सभापति का अभिभाषण हिन्दी भाषा में प्रकाशित हुआ था। उसका प्रकाशन करने वाले कालाकांकर नरेश राजा रामपाल सिंह ही थे। कालाकांकर हनुमत् प्रेस की एक शाखा प्रयाग स्टेशन के पास ग्रेट ईस्टर्न होटल में थी जिसके मैनेजर श्री गुरुदा शुक्ल थे। उन्हीं शुक्ल जी ने जार्ज यूल साहब की स्पीच को हिन्दी में छापकर कांग्रेस के अधिवेेशन में वितरित कराया था। उस होटल को राजा साहब ने खरीदकर उसका नाम राजा-होटल रखा था जब आप प्रयाग पधारते तब उसी में ठहरते थे। उस समय के प्रसिद्ध कांग्रेस महारथी श्री अयोध्या नाथ जी ने राजपूताने में कांग्रेस प्रचार आदि का कार्य-भार कालाकांकर नरेश राजा रामपाल सिंह को ही सौंप दिया था। राजा साहब अपना अधिक समय कांग्रेस कार्य में व्यतीत होता था। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर आदि रजवाड़े में जाकर इस कार्य के लिए उस साल राजा रामपाल सिंह ने अनेक व्याख्यान दिये।
   राजा साहब कोट, पैंट और हैटधारी थे। एकबार महाराजा उदयपुर से इसी अवसर पर जब मिलने गये और समय निश्चय करने के बाद महलों में पहुंचे तब भी भीतर बूट पहने ही चले जा रहे थे। उदयपुरीधीश के यहां जब यह खबर पहुंची तो आपने कोई निश्चित मखमली बहुमूल्य कालीन अगले कमरे में बिछा देने की आज्ञा दी। उसी समय उसकी तामीली हुई।
   राजा रामपाल सिंह जब अगले कमरे में जाने के लिए चौखट पर पहुंचे तब उस फर्श को देखकर वह स्वयं एक ब एक रुक गये और झट आपने अपने नौकर को बूट खोलने का इशारा किया। बिना किसी के निवेदन के ही राजा साहब बूट उतार कर अंदर गये। उस कमरे में जो कारचोबी की सजावट से भरा अनमोल कालीन बिछा देखा, उसपर मुग्ध होकर राजा साहब ने स्वयं बूट छोड़ कर ही भीतर जाना उचित समझा। वहां महाराज उदयपुर से राजा रामपाल सिंह की राजनीतिक विषयों पर बहुत बातें हुई। महाराजा साहब को आपने कांग्रेस कार्य उसके उद्देश्य अच्छी तरह समझाये और देशी राज्यों का कांग्रेस के प्रति कर्ाव्य बतलाया।
  महाराजा साहब ने सब बातें सहानुभूतिपूर्वक सुनी और कांग्रेस कार्यकर्ााओं से देशभक्तिपूर्ण कार्यों की सराहना की थी।
   कांग्रेस का जब प्रयाग में चौैथा अधिवेशन हुआ तब एंटी कांग्रेस कहलाने वाले दो नामी आदमी कांग्रेस के स्टेज पर व्याख्यान देने के लिए उतावले थे एक राजा शिव प्रसाद सितारेहिन्द और दूसरे थे लखनउ$ के मुंशी नवल किशोर साहब, जिनका पुस्तक प्रकाशन कार्य में आज भी प्रांत में सुनाम है।
   लेकिन ज्योंही ये दोनों महाशय मंच पर बारी बारी से बोलने गये। कांग्रेस पंडाल में विरोध की आवाज बुलंद हुई कि कुछ भी बोलने से पहले असमर्थ होकर उन्हें लौट जाना पड़ा। विरोधी की बात सुनने की शक्ति या सामर्थ्य उस समय कांग्रेस में नहीं थी।
   व्याख्यान वाचस्पति दीनदयाल शर्मा जी उन दिनों भारत वर्ष में सुप्रसिद्ध हिन्दी वक्ता थे, जिनके व्याख्यानों की भारत भर में धूम मची हुई थी। कांग्रेस मंच पर उन्हें व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया। यह सदुद्योग महामना पूज्य पंडित मदनमोहन मालवीय जी द्वारा हुआ था। व्याख्यान वाचस्पति जी ने सहर्ष स्वीकार करके यह अभिप्राय प्रकट किया कि वह व्याख्यान हिन्दी में देंगे और विषय दो में से एक कोई हो। पहला गोरक्षा हो या हिन्दी भाषा हो।
   उस कांग्रेस अधिकारियों को यह स्वीकार नहीं हुआ।
   जब विरोध और हो-हल्ले के मारे राजा शिव प्रसाद और सितारे-हिन्द मुंशी नवलकिशोर महोदय कांग्रेस मंच पर बोलने से वंचित होकर लौटे तब बड़ी छीछालेदर हुई। लेकिन ससम्मान दोनों महाशय पंडाल से विदा हुए।
   प्रयाग में कालविन साहब बैरिस्टर कांग्रेस के पक्ष में थे और लेिटनेंट गर्वनर सर कालविन सरकार के। सरकार का जो भाव कांग्रेस के प्रति था और है, वही भाव उनका था। सुना दोनों भाई-भाई थे। मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्नाका उदाहरण वहां साक्षात् वर्ामान था। कांग्रेस का काम उनदिनों बहुत जोरों पर था। सर्व श्री डब्ल्यू. सी. बनर्जी., दादाभाई नौरोजी, बदरूीन तैयबजी, के.टी. तैलंग जी, लोकमान्य तिलक जी, सर फिरोज शाह मेहता, आनन्दाचार्य, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, हसन इमाम, सर सत्येंद्र प्रसाद सिंह, रहमतुल्ला-सयानी, सी. शंकर नायर आनंद-मोहन बसु, सर रमेशचंद्र दा, दिनशा एदलजी बाचा, लालमोहन घोष, गोपाल कृष्ण गोखले, रासविहारी घोष, अंबिका चरण मजूमदार, विशन नारायण दर, भूपेंद्रनाथ बोस, एनी बेसेंट, सर बिलभाई पटेल, मोतीलाल नेहरू, विजयराघवाचार्य, सुब्रण्यम अयर, लाला लाजपतराय, विपिन चन्द्र पाल और विदेशी सज्जन सर्वश्री हेनरी काटन, बेब साहब, बेव वर्न हू ब्राडला आदि जीवित थे।
   राजा रामपाल कहा करते थे कि जो भारतीय श्वेतांगों से मार खाकर या अपमानित होकर अपनी मान मरम्मत के लिए अदालत की शरण में जाते हैं वे कायर ही नहीं भारतीय वीरों के मुंह पर दाग लगाने वाले हैं। श्वेतांग इस कायरपन को बहुत हेय समझते हैं। उनसे अपमानित होने पर जो भारतीय ‘फेस टू फेस’ लड़ जाते हैं, ‘फूट टू फूट’ भिड़ जाते हैं, उनकी वीरता से वे लोग नाखुश नहीं होते। मार खानेपर हिंदुस्तानी श्वेतांगों पर मानहानि की नालिश करते हैं पर श्वेतांग इस व्यहार को इतना नीच समझते हैं कि मार खानेपर किसी से उसका जिक्र भी नहीं करते।
   एक बार राजा साहब बंबई जा रहे थे। इन पंियों का लेखक भी उनके साथ था। इलाहाबाद स्टेशन पर अपना सामान फर्स्ट क्लास में रखवा कर वे प्लेटफार्म पर टहल रहे थे। उस कंपार्टमंेट पर ‘यूरोपवालों’ के वास्ते, लिखा था। इतने में जल्दी जल्दी एक साहब वहां पहुंचा और कोई हिंदुस्तानी सवार है सुन कर नौकरों से उनका सामान प्लेटफार्म पर फेंका कर आप उसमें सवार हुए। गाड़ी खुलने के समय जब राजा साहब अपने बर्थ पर पहुंचे तब सामान प्लेटफार्म पर देखकर झल्लाये, साहब से बातें हुई। उन्होंने अपने हाथ की छड़ी से राजा साहब को वहो देखने का इशारा किया जहां ‘फॉर यूरोपियन’ लिखा था। राजा साहब ने छड़ी छीन कर साहब को इतना मारा कि वे गाड़ी से गिर गये। तब उन्हें उठाकर प्लेटफार्म पर रखा दिया। नौकरों ने उनका सामान उतार अपना सामान लादा। गाड़ी सीटी देकर चलने लगी। स्टेशन मास्टर यूरोपियन थे। खबर पाकर पहुंचे लेकिन गाड़ी चल चुकी थी। जब आपने सब हाल सुना और मालूम किया कि राजा रामपाल सिंह थे, वे चुप हो रहे। साहब ने भी कहीं कुछ फरयाद नहीं की। मैंने राजा साहब से ही सुना वह कोई हिन्दुस्तान में रहने वाले साहब थे। उसकी मां प्रसव के समय विलायत गयी और वहां उनके पैदा होने पर फिर भारत लौट आयी। राजा साहब उन्हें मारते वक्त कह रहे थे कि तेरी मां जन्म के समय विलायत गयी तो तू यूरोपियन हो गया। हम चौदह वर्ष तक विलायत में रहकर यूरोपियन नहीं हुए?
  एक बार राजा साहब अपने राज्य होटल के कमरे में ठहरे थे। राजा साहब का रात को जगने और दिन को सोने का अभ्यास था। उस रात को गानवाद्य हो रहा था। राजा साहब के किसी नौकर ने आधीरात को खबर दी कि बगल वाले कमरे के द्वार पर कोेई श्वतांग कुछ बक रहा है। राजा साहब ने बाहर आकर सुना तो वह गालियां बक रहा था। वहीं पटक कर बड़ी मार दी। फिर नौकर उन्हें बेहोशी में उनके बिछौने पर कर आये। उनकी इच्छा न होने पर भी मामला अदालत गया।
    अदालत में साहब ने जिरह में कह दिया कि जिसने हमको मारा उसके मुंह से शराब की बू आ रही थी। अदालत में राजा साहब के वकील ने कहा कि हमारे राजा साहब कालकांकर नरेश कभी शराब नहीं पीते। इस बयान पर मुकदमा खारिज हो गया। लेकिन दो सिपाही छः महीने के वास्ते मुकर्रर हुए कि देखे राजा साहब शराब पीते हैं या नहीं। राजा साहब ने छः महीने तक शराब की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की, यद्यपि निरीक्षण करने वाले सिपाही कालकांकर से बहुत दूर रहते थे लेकिन राजा साहब में ऐसी इच्छा शक्ति थी कि छः महीने तक छुई तक नहीं। राजा साहब जुल्फ रखते थे। जुल्फ के बाल खिचड़ी थे। हमने स्वयं देखा था, वे कभी जुल्फ में तेल नहीं लगाते थे। उनके यहां मिस्टर मेेल्हर नामक एक श्वेतांग उनकी सर्विस में थे। उनको हम उर्दू पढ़ाया करते थे। उस समय उनके दो भाई श्रीमान लाल राम प्रसाद सिंह और श्री नारायण सिंह जी बहादुर थे। राजा साहब की मृत्यु लकवा से हो गयी। उनके पश्चात् श्री मान लाल राम प्रसाद सिंह के माननीय पुत्रा अधिकार हुए। उन्हीं के वंशज कालाकांकर नरेश हैं।

सोमवार, 10 जुलाई 2017

प्रेमचंद परिवार में मेरे वे दिन

 श्यामा देवी

बात बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक की है, जब विदेश यात्रा से लौटने वाला अथवा विधवा-विवाह करने वाला व्यक्ति समाज में बहिष्कृत कर दिया जाता था। मेरे पिता मुंशी गुलहजारी लाल एक कट्टर आर्य समाजी थे-सामाजिक कुरीतियों और ढकोसलों के घोर विरोधी। ऐसी अनर्गल बातों और रीति-रिवाजों के विरुद्ध संघर्ष करने में सदैव अग्रणी रहे। उनका प्रतिरोध केवल मौखिक तर्कों तक ही सीमित न रहा, बल्कि उन्होंने उसे कार्यरूप में भी परिणत कर दिखाया। अपनी ज्येष्ठ पुत्री के विवाह के लिए उन्होंने चुना उस समय के लखनऊ के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ महेश चरण सिन्हा को, जो वर्षों तक सारी दुनिया रौंद कर तथा विदेशों से विज्ञान की उच्च डिग्रियां लेकर स्वदेश लौटे थे। उन्हीं डा. महेश चरण सिन्हा की सुयोग्य ज्येष्ठ पुत्री हैं, हिंदी की सुप्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती सुमित्रा कुमारी सिन्हा। उक्त संबंध की उस समय समाज में काफी चर्चा रही और बड़ी-बड़ी आलोचनाएं हुईं। किंतु मेरे पिता अडिग एवं अविचल रहे। मैं उनकी दूसरी संतान थी और मेरे लिए उन्होंने वर चुना उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के अनुज, स्व महताब राय को। यह सर्व विदित है कि प्रेमचंद ने भी उस समय शिवरानी देवी से विधवा-विवाह कर समाज में एक उथल-पुथल सी मचा दी थी। अत: मेरे पिता ने सामाजिक कुरीतियों से इस प्रकार डट कर संघर्ष करने वाले साहसी व्यक्ति के अनुज से मेरा संबंध जोडऩे का उचित ही निर्णय किया। यहां इस बात का उल्लेख कर देना भी असंगत न होगा कि मेरी कनिष्ठ भगिनी सावित्री का विवाह स्व डा. संपूर्णानंद के साथ हुआ था। 

सन् 1919 में मैं प्रेमचंद की अनुज वधू बनकर लमही ग्राम में आयी। प्रेमचंद (जिन्हें में आगे भाई के नाम से संबोधित करुंगी) मेरे पतिदेव स्व महताब राय (जिन्हें आगे की पंक्तियों में बाबूजी से संबोधित करुंगी) के न केवल अग्रज बल्कि पिता तुल्य भी थे। बाबूजी जब तुतलाना सीख रहे थे, उसी समय उनके पिता गोलोकवासी हो गए और उनके भरण-पोषण का सारा भार आ पड़ा भाई जी पर। भाई जी के ही संरक्षण में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई और उन्होंने ही बाबूजी का विवाह भी किया। बाबूजी का भी अपने बड़े भाई के प्रति अगाध स्नेह था और वे उनका अत्यधिक आदर और सम्मान करते थे। अतीत के कुछ संस्मरण सुनाते हुए एक बार बाबूजी ने बतलाया कि उन्हें शहर से गांव (लमही) लौटने में रात्रि के लगभग 12 बज गए। डरते-डरते उन्होंने धीरे से द्वार की सांकल खटखटायी। चाहते थे कि उनके आने की खबर भैया को बिल्कुल न लगे और मां अथवा भावज द्वार खोल दें किंतु आशा के विपरीत भैया ने ही आकर द्वार खोला। देखकर बाबूजी के होश उड़ गये और पैरों तले से धरती जैसे खिसक गयी। धड़कते हृदय से चुपचाप अपने कमरे में दाखिल हो गये। सुबह जब बाबू जी सोकर उठे तो लोटा उठाकर शौच के लिए चले, तो भाईजी ने पूछा-क्यों छोटक, रात जब तुम आये तो कोई चार बजा रहा होगा? इतनी देर कहां कर दी तुमने?
बाबूजी ने सहमते हुए उत्तर दिया, 'नहीं भैया, बारह बजे थे। कुछ काम में फंस गया, जिससे देर हो गयी।Ó 
'अरे, मैंने तो समझा कि सवेरा हो चला है। तभी से बैठा लिख रहा था।Ó
ऐसी थी बाबू जी की भाई जी के प्रति आदर भावना और ऐसी थी भाई जी की तन्मयता कि सारी रात बैठे लिखते रहे और उन्हें समय का भी पता नहीं चल सका।
यों तो भाई जी के प्रति बाबूजी का स्नेह तथा आदर भाव कभी कम नहीं हुआ और मेरी ज्येष्ठानी श्रीमती शिवरानी देवी का भी मेरे प्रति बराबर स्नेह बना रहा, लेकिन नौकरी के सिलसिले में दोनों भाइयों को पृथक जिलों में रहना पड़ा और छठे-छमासे भेंट मुलाकात हो जाती। बाबूजी ने गांव में अपने पैतृक मकान के सामने एक पुख्ता बैठक बनवायी। कुछ दिनों पश्चात जब भाईजी सरकारी नौकरी  पर लात मारकर लमही आये, तो उन्होंने उस बैठक का विस्तार कर मकान का रूप दे दिया और अपने परिवार के साथ उसी में रहने लगे। बाबूजी तथा हमलोग जब कभी गांव आते तो पैतृक मकान में रहते। इस प्रकार बिना किसी कानूनी बंटवारे के ही गांव में एक के स्थान पर आमने-सामने दो घर हो गये और रहना-सहना भी अलग होने लगा।

सन् 1921-22 में बाबूजी कलकत्ता में श्री महावीर प्रसाद पोद्दार के प्रेस के व्यवस्थापक थे। उन्हीं दिनों वाराणसी में बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने ज्ञान मंडल यंत्रालय की स्थापना की थी और हिंदी दैनिक 'आजÓ तथा अंग्रेजी दैनिक 'टुडेÓ के संपादक थे बाबू संपूर्णानंद। बाबू शिवप्रसाद गुप्त तथा श्री श्रीप्रकाश जी बाबूजी को कलकत्ता से खींचकर वाराणसी लाये और ज्ञानमंडल यंत्रालय का व्यवस्थापक बनाया। मुश्किल से दो वर्ष वहां बीते थे कि भाईजी ने बाबूजी के समक्ष अपना निजी प्रेस खोलने तथा नौकरी छोड़कर उसकी व्यवस्था का भार संभालने का प्रस्ताव रखा। आज्ञाकारी अनुज ने भाई की आज्ञा शिरोधार्य कर नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बाबू शिवप्रसाद गुप्त तथा श्रीप्रकाश जी ने बहुत समझाया, किंतु वे टस से मस न हुए। साझे में अपना सरस्वती प्रेस खोला और बाबूजी उसकी व्यवस्था देखने लगे। किंतु उन दिनों छापेखानों की दशा आज जैसी न थी। बड़ी मुश्किल से खर्च चलता था और आय बहुत थोड़ी होती थी।
और इस तरह कुछ समय तक काम करने के बाद जरूरी हो गया कि सरस्वती प्रेस से पृथक होकर कुछ और कार्य किया जाये। बाबूजी मिर्जापुर में राजा साहब विजयपुर के कलित प्रेस के व्यवस्थापक तथा यहीं से प्रकाशित होने वाले मिर्जापुर गजट के संपादक होकर चले गये। सरस्वती प्रेस से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका हंस तथा साप्ताहिक जागरण, जिनका संपादन प्रेमचंद जी करते थे, की प्रतियां वे नियमित रूप से बाबूजी के पास मिर्जापुर भेजा करते थे तथा साथ ही अपनी सभी नव प्रकाशित कृतियों की प्रतियां भी बाबू को। वे लभभग 12 वर्ष मिर्जापुर में गुजारे, जिनमें से कुछ दिन तो रांची में व्यतीत हुए। किंतु उन्होंने कभी माथे पर शिकन न पडऩे दी। आर्थिक कशमकश के बीच भी वे टेनिस, क्रिकेट तथा शतरंज के खेलों में रमे रहते। इसी बीच उन्होंने कलित प्रेस की नौकरी छोड़ कर मिर्जापुर में ही अपना एक छोटा सा प्रेस चलाया। जो व्यक्ति उस समय के बड़े से बड़े प्रेसों की व्यवस्था का भार संभाल चुका था, उसे समय के थपेड़ों में पड़कर अपने छोटे से प्रेस में स्वयं काम भी करना पड़ा। परंतु इसके लिए उन्होंने कभी भाईजी को  नहीं कहा और न उनके प्रति स्नेह और आदर भाव में ही कोई कम आयी। सन् 1936 के मध्य में भाई के गंभीर रूप से बीमार होने की सूचना पाकर बाबूजी विक्षिप्त से हो उठे और अचानक बारह साल की जमी-जमायी गृहस्थी उजाड़कर मिर्जापुर को सदैव के लिए त्याग दिया और लमही चले आये। प्रेस मिर्जापुर में ही अपने एक मित्र को सुपुर्द कर आये कि उसे वाराणसी भिजवाने की व्यवस्था कर दें, किंतु मित्र महोदय ने काफी दिनों तक प्रेस से होने वाली आय का भरपूर उपयोग किया।
भाईजी उन दिनों वाराणसी नगर में धूपचंडी स्थित एक महान में किराये पर रहते थे। नीचे प्रेस था और ऊपर निवास-स्थान। किंतु लंबी अवधि तक उस घर में बीमार रहने के कारण उन्होंने मृत्यु के लगभग दो माह पूर्व मकान बदल दिया और समीप ही में राम कटोरा स्थित दूसरे मकान में चले गये। बाबूजी इस बीच निरंतर शहर जाते और भाई की सेवा टहल तथा इलाज की व्यवस्था में लगे रहत, किंतु भाईजी की दशा निरंतर बिगड़ती ही गयी और अंतत: आठ अक्टूबर 1936 को उनकी इहलीला समाप्त हो गयी। बाबूजी इस बीच निरंतर उनके निकट रहे और अंत समय में भी उनके बगल में थे। बाबूजी कहते थे कि अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भाईजी एकाधिक बार उनसे कुछ आवश्यक बातें करने की इच्छा व्यक्त की। शायद वे बाबूजी जी से अकेले में कुछ बातें करना चाहते थे, किंतु अपनी यह अभिलाषा अंतर में लिये ही चल  बसे।

बाबूजी जब तक जीवित थे, प्रेमचंद पर शोधकार्य करने वाले स्कॉलर उनके पास आया करते थे और कई-कई दिनों तक उनसे प्रेमचंद के विषय में जानकारी प्राप्त किया करते थे। आकाशवाणीवालों ने भी दो-एक इंटरव्यू की टेव रिकार्डिंग की थी। सोवियत लेनिनग्राद के एक शोध स्कॉलर बलतर बालिन, जो प्रेमचंद पर शोध कार्य करने भारत आये थे, काफी समय तक बाबूजी के पास प्रेमचंद्र के पारिवारिक जीवन के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के लिए आते रहे। 
82 वर्षीया मेरी ज्येष्ठानी शिवरानी देवी के दोनों सुयोग्य पुत्र श्रीपतराय और अमृत राय हर प्रकार से संपन्न हें। इधर कई महीनों से वे (श्रीमती शिवरानी देवी)पुन: वाराणसी में हैं। आंखों से सूझता नहीं और कान से सुनाई नहीं पड़ता। किंतु वाराणसी में ही अपने जीवन के अंतिम दिन व्यतीत करने की उनकी हार्दिक अभिलाषा है। कहती हैं-उनकी (प्रेमचंद)की आत्मा मुझे यहीं ढूंढती होगी। मेरा भी काफी समय उन्हीं के साथ व्यतीत होता है। घंटों बैठे हम लोग अतीत को याद कर दुख-सुख की बातें किया करते हैं। वे मुझे बराबर अपने साथ ही रहने को कहा करती हैं, किंतु पारिवारिक बंधन के कारण यह संभव नहीं हो पाता। जब कभी वे मुझे दुखी या खिन्न पाती हैं तो आश्वस्त करते हुए कहती हैं-तुम क्यों फिक्र करती हो श्यामा, मैं छोटक की शादी कर तुम्हें घर लायी थी और जब तक मैं जीवित हूं, तुम्हें कोई चिंता नहीं करनी चाहिए। देखना है, जीवन की इस दौड़ में हम दोनों में से कौन किसे पछाड़ता है!
समय के साथ उम्र बीत रही है। अतीत को दुहराते रहने के अतिरिक्त कोई काम भी नहीं, लेकिन इस तरह अतीत-जीवी भी तो नहीं रहा जा सकता! 
हर अगला पल अदृश्य की ओर ले जा रहा है। पता नहीं कब विराम मिलेगा !
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यह लेख धर्मयुग में एक अक्‍टूबर 1972 के अंक में प्रकाशित हुआ था। 

शुक्रवार, 23 जून 2017

झारखंड के अंचल में

डॉ रामखेलावन पांडेय
देहात को मैंने प्रेमचंद की आंखों से देखा था-इसे स्वीकार करने में मुझे किसी प्रकार का संकोच नहीं, किसी प्रकार की दुविधा नहीं, अत: मोटरों की पों-पों, और कोलाहल, शहर की उड़ती धूल और गंदगी तथा कर्माकुल व्यस्त जीवन से त्राण या झारखंड के एक अंचल में-सभ्यता और कृत्रिमता से दूर देश में, जब रहने का अवसर मिला तब मुझे मालूम पड़ा जैसे सारी दुनिया पीछे छुट आयी है। यह अंचल जाना हुआ तो है, मगर पहचान नहीं। कभी पहचानने की चेष्टा भी नहीं की थी मैंने। मुझे लगा जैसे यहां की घड़ी की सुइया तक शिथिल हो गई हैं। यहां काल प्रवाह है ही नहीं, एक विचित्र आलस, एक अनुभूति निश्ंिचतता इस रहस्यमय अंचल को घेरे पड़ी है। सघन हरीतिमा की छाया में मानवता जैसे स्वप्न देख रही हो, उस युग का जिसमें संघर्ष न था, संघर्ष का उन्माद न था। नीली-नीली दूर तक फैली पहाडिय़ां धरती की छाती की भांति फूल उठी हैं और उन्हें घर कर उजले, लाल, पीले और अनेक रंगों के बादलों के टुकड़े प्रकृति का सिंगार कर रहे हैं। यह सौंदर्य अपरिचित सा ही लगा मुझे! पहाडिय़ां देखी थी मैंने, उड़ते बादलों के रंगीन पख भी देखे थे, पर जान पड़ा, ऐसा सौंदर्य तो था नहीं उनमें। ऊंचा सा टीला-पत्थरों का जमघट-एक आध लहलहाते पौधे और ऊपर आसमान में शरदपूनों का हंसता हुआ चांद बादलों की गोद में खेलता-सा, फुदकता-सा जान पड़ा। नदी के उस पार से कोई मिलन-संदेश भेज रहा हे-कितना विषादमय कितना करुण, किंतु कितना मादक!  पास में था झरता हुआ क्षीण पहाड़ी झरना, पर स्पष्ट। स्वर के इनके गीत आधी रात में भटकने पर मोहक हो उठे।
इस ऊबड़खाबड़ अंचल की काली-काली चट्टानों को देखकर मैंने सोचा था, यहां के अधिवासी भी उन्हीं पत्थरों की भांति जड़ और शिथिल हैं। यह बात भी नहीं कि वैसे लोगों का अभाव है वहां, जिनके अविराम जीवन में दिन-मास-वर्ष की कोई गणना नहीं। वे चर्चिल और हिटलर को नहीं जानते, शायद गांधी और जिन्ना को भी नहीं! स्वभाव में एक विचित्र रुखाई-मिली सरलता है। सरलता जो मूर्खता की सीमा में घुसती जान पड़ती है। सच मानों, मुझे दो ही चीजें यहां प्रचुर मात्रा में मिली-एक ठंडा पानी और दूसरी सरलता। किंतु उन चट्टानों के बीच से दबकर निकलने वाले झरने भी हैं, सुस्वादु जल से पूर्ण, पर्वत की करुणा और स्नेह के प्रतीक।  
गरीबी यहां खुलकर झांकती है-लोगों के चीथड़ों से। उसे किसी प्रकार की लजा नहीं, संकोच नहीं, झिझक नहीं। और, अमीरी उस पर हंसती है, खिलखिला कर, मचल-मचलकर। शहरों की गरीबी जैसी यहां की गरीब नहीं, वह इस तरह खुल कर झांकती भी नहीं-शरमा कर चलती है, लज्जा के भार से झुकी सी। अमीरी यहां धूर्तता की अमरलता है जो गरीबी की डाल पर फैलती है, शोषण ही जिसकी नीति है।
पढ़ा करता था-पहाड़ी देशों के लोग सबल होते हैं, कारण उनका प्रकृति के साथ निरंतर संघर्ष जो चल रहा है और संघर्ष में उसी की रक्षा संभव है, जो सबल है। संघर्ष यहां का जीवन नहीं, जीवन है, सहयोग, प्रकृति के साथ निरंतर सहयोग। बादल पानी बरसाते हैं, ऊंचे-नीचे खेतों की मिट्टी खुरेद लोग धरती माता के पेट में अन्न डाल देते हैं और माता का स्नेह फूट पड़ता है हरियाली के रूप में। हवा के झोंके के चंचल हरीतिमा जैसे जीवन की लहर हो। लोग इसलिए आलसी हैं, नितांत आलसी, निष्क्रियता की सीमा तक पहुंचने वाले आलससागर में निमग्न हैं। पेट में थोड़ा अन्न हो, अंग ढंकने को मात्र आवरण, बस इतना ही पर्याप्त है। उनके लिए अतीत नहीं, भविष्य भी नहीं, केवल वर्तमान है। वर्तमान परिश्रम से चूर, अभाव से पूर्ण, किंतु अभाव उन्हें खलता नहीं, भाव यहां कभी दिखा जो नहीं। निंदा, ईष्र्या, द्वेष और कलह का मूल कारण है यही आलस। शरीर बैठा रहेगा पर मन तो नहीं। और बेकार मन की यही खुराक है। शहरों के कर्म-संकुल जीवन में इतना अवकाश कहां जो लोग दूसरों की ओर देखें। क्या अपनी ही दौड़ कम है?
मैं ऐसी भाषा सीख कर यहां आया था जो भाव छिपाना जानती है, बनावटी है, कृत्रिम है। सभ्यता आखिर अपनी प्रकृति को छिपाने का ही नाम तो है, किंतु यहां की भाषा, इसे जंगली भले न कहूं, सभ्य तो कह नहीं सकता।
बंगाल के संपर्क में आया हुआ यह प्रदेश शक्ति का उपासक है, हिंसा का, बलिदान का। दुर्गा और काली पूजा के अवसरों प मनुष्य की पशुता नाचती सी दीख पड़ी। निकट स्थित गया में आकर गौतम को बुद्धत्व मिला, किंतु मालूम होता है अहिंसा की गंध इस मिट्टी को नहीं मिली।
मनुष्य सभी को अलग-अलग कर देखने का अभ्यस्त है। ऊंच-नीच, राजा-रंक, अमीर-गरीब, काला-गोरा, सुंदर-असुंदर का भेद सर्वत्र है। शिक्षित और अशिक्षित का भेद भी इधर कम नहीं, किंतु वहां का यह भेद इतना प्रबल है कि जर्मनी में जर्मन और यहूदियों में क्या रहा होगा। भय यहां जीवन की कुंजी है, सर्वत्र ही है, किंतु भूतों का भय जैसे यहां दीख पड़ा वैसा कहीं नहीं। लड़कों और स्त्रियों की बात करें, अच्छे खासे तगड़े जवान भी भूतों की कहानी सुन अकेले आंगन में नहीं निकलते।
यह रही झारखंड के एक अंचल की झांकी-धूमिल और स्पष्ट रेखाओं में सीमित सी, किंतु वास्तव में कितनी असीम, कितनी विस्तृ।  

शनिवार, 17 जून 2017

श्‍यामल की कहानियां -कहानी के भीतर कहानी

  कहानी की सिमटती दुनिया और सीमित अनुभव में कहानी रचाव के इस दौर में श्यामल बिहारी श्यामल अपनी कहानियों में सिर्फ एक भूगोल तक सीमित नहीं रहते। उनका दायरा किसी एक शहर तक सीमित नहीं रहता।  वैविध्यपूर्ण विषय और देखने की एक गहरी अंतरदृष्टि हमें समकाल से जोड़ती भी है और समकाल के कथाकारों से विलगाती भी है। हिंदी पाठकांे की लगातार सिमटती दुनिया में, जिसके लिए एक हद तक लेखक और उनका गिरोह  जिम्मेदार है-श्यामल इस बंद गली से निकल एक अलग और अपनी दुनिया आबाद करते हैं। इसलिए, उनकी कहानियां हमारे प्रबुद्ध आलोचकांे की नजर में नहीं चढ़ पातीं। पर जब इन कहानियों से गुजरने की ईमानदार कोशिश हो तो हम अपने समय को इसमें पाते हैं। बनारस से लेकर पलामू, रांची धनबाद की अलग-अलग संस्कृति, भाषा, समाज और उनकी रोजमर्रा की समस्याओं, चिंताआंे, फितूरों से हम रूबरू होते हैं। श्यामलजी पत्रकार हैं। इस नाते इन जगहों और यहां की गलियों, घरों, सड़कों पर घूम रहे पात्रों से बोलते-बतियाते ही इन कहानियां का जन्म हुआ है।
  बारह कहानियों के इस संग्रह में हर कहानी के भीतर एक कहानी छिपी हुई है। इसके कहने का आशय और अर्थ भी है। ‘कागज पर चिपका समय’ संग्रह की पहली कहानी है, जो बनारस पर है और अंतिम कहानी, ‘चना चबेना गंगजल भी बनारस पर। इनके भीतर पलामू, रांची और धनबाद है। पहली कहानी में हमें बनारस की वही चिरपरिचित भाषा की मिठास से साबका होता है-‘अरे भाईजान! गुरुआ ने तो नया किला भी फतह कर लिया! उसके कमरे में काफी देर से रीतिकाल छाया हुआ है। मैं एक बार आधा घंटा पहले टायलेट की तरफ से हो आया हूं, चलिए न एक बार उधर से और हो लिया जाये।’
   कहानी का यह पहला पैराग्राफ पाठक को उत्सुक बना देता है। जो बनारसी रंग को जानते हैं, वह गुरु और रीतिकाल के लक्षणार्थ से भी खूब परिचित होंगे। यह खुसूर-फुसूर बनारस के दूरदर्शन केंद्र के एक आफिस में होती है। इस कहानी में आगे क्या है, उसे आप पढि़ए, पर इसमें एक कंसेप्ट है, जो एक दूसरी कहानी को जन्म दे सकता है। दूरदर्शन के लिए एक कार्यक्रम बनाने की तैयारी चल रही है और यह कार्यक्रम भूमिहीनों और शोषितों पर कंेद्रित है। ये भूमिहीन और शोषित कौन हैं? यह आगे खुलता है-‘अरे भाई, हरहुआ के लमही गांव से लेकर पांडेयपुर और बनारस मेन सिटी में इधर जगतगंज तक का इलाका ही तो मंुशी प्रेमंचद की चौबीस घंटे सक्रियता का मूल क्षेत्रा था। लमही में जन्म और जगतगंज में निधन तो, यहां के ढेरों शोषित-दमित पात्रा उनके साहित्य में अमर हैं, ऐसे पात्रांे की दूसरी और तीसरी पीढ़ी के ज्यादातर लोग आज वैसी ही दशा में जीवन खेप रहे हैं...’
  प्रेमचंद का जब निधन हुआ तो देश गुलाम था। फिर आजादी मिली 1947 में। इसके भी हासिल किए 67 साल हो गए और प्रेमचंद के पात्रा आज भी वैसी ही दशा में हैं। यानी, दूसरी-तीसरी पीढ़ी की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ जबकि न जाने कितनी पंचवर्षीय योजनाएं आईं और चली गईं। गांव में रहने वाली 80 प्रतिशत आबादी की फिक्र देश की किसी भी सरकार ने नहीं की। नारे जरूर लगाए। एक और बात, हमने इतनी जरूर तरक्की कर ली है कि प्रेमचंद के किसानों के सामने संकट जाहे जिस रूप में आए, पर वे आत्महत्या नहीं करते थे, पर हमारी नीतियों ने इतना जरूर विकास किया कि किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। हमारा बैंक, हमारी सरकार विजय माल्यों जैसों के प्रति बहुत उदार रहती है। कुछ ऐसे पूंजीपती भी हैं, जिनका हजारों करोड़ का कर्ज एक झटके में हमारी सरकार माफ कर देती है और जबकि चंद हजार रुपये के लिए हमारे किसान आत्महत्या कर लेते हैं। जो अन्न देता है, उसे हम भूखा मार देते हैं।
  इसके भीतर एक और कहानी उभरती है-रुखसाना महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से जुड़कर बनारस के बुनकरों पर शोध कर रही है....अखबारों मे रोज आ रहा है कि बनारस के बुनकर पलायन कर रहे हैं। रोज एक न एक की खुदकुशी की खबर दर्दनाक तस्वीर सहित छप रही है उन पर सूदखोरों के जुल्म की बातें भी सामने आती रहती हैं। यह भी शोर कि बनारसी साड़ी उद्योग मर रहा है, लेकिन इसकी मार्केटिंग करने वालों के रुतबे पर तो कोई असर नहीं।’-जो हाल किसानों की, मजदूरों की, वही हाल बुनकरों की। गर्दन में फांस यहां भी है। 67 सालों में जैसे समय ठहर गया है, कागज पर चिपक गया है।
  ‘आना पलामू’ यह संग्रह की चौथी कहानी है। पलामू श्यामलजी का घर भी है। 1998 में पलामू के सूखाड़-अकाल पर ‘घपेल’ नामक उपन्यास उनका आ चुका है। यह कहानी सुखाड़-अकाल पर नहीं है, पर इससे उपजी परिस्थितियों पर है। पलामू एक अजीब जिला है। ऐसा कि इसकी भूमि पत्राकारों की अपनी खींचती रही है-पी साईनाथ, रामशरण जोशी, महाश्वेता देवी, फणीश्वरनाथ रेणु, अज्ञेय...किसने नहीं लिखा और क्या नहीं लिखा, लेकिन पलामू नहीं बदला। 1880 में संजीब चटृोपाध्याय ने ‘पलामू’ लिखी। तब से पलामू यही है, यहां भी समय जैसे कागज पर चिपक गया है। मजा देखिए, यहां से निकले नेता झारखंड और देश में अपनी पहचान बनाए-कोई केंद्रीय मंत्राी बना, कोई राज्यपाल...पर पलामू की किस्मत नहीं बदली। आज स्थिति और भी बदतर है। यहां अकाल से निपटने के लिए चालीस-चालीस से डैम बनाए जा रहे हैं। ये आज तक पूरे नहीं हुए, लेकिन हर साल इसकी राशि बढ़ जाती है। तो पलामू यह है और इस उर्वर पलामू में नक्सलवाद नक्सलबाड़ी से चलकर पड़ाव डाला जो अब अपना घर बना लिया है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि झारखंड में नक्सलवाद का प्रवेश इसी मुहाने से हुआ और आज माओवाद के अलावा एक दर्जन संगठन सक्रिय हैं, जिसे कुछ पुलिस ने भी माओवाद से निपटने के लिए खड़ा किया है। लोहा से लोहा को काटने के लिए हमारी पुलिस के पास यही उपाय है! सो, इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ता है, जो शहर नहीं जंगलों के बीच बसे गांवों में रहते हैं। यह कहानी कुछ ऐसे ही सवाल खड़ा करती है और माओवाद को लेकर द्वंद्व को भी। एक दूसरी कहानी, इसी की पूरक है-छंद में हाहाकार। इस कहानी में बस एक ही दृश्य है-जन अदालत की। जन अदालत चरमपंथी गुट की। खुलासा नहीं किया गया है कि यह माओवादियों की है या दूसरे चरमपंथी गुट की। पलामू में एक दर्जन ऐसे संगठन सक्रिय हैं-ये भी जन अदालत लगाकर अपने दोषियों को अपने ढंग से सजा देते हैं। यहां भी औरंगा नदी के तट पर घने जंगल में जन अदालत लगी है, जिसमें चार मामले आए हैं-गोसाईडीह की पिरितिया के साथ बलात्कार का मामला, गंझू परहिया की पुलिस मुखबिरी का केस, डाकू रामसूरत यादव का मुकदमा और सरकारी संत बनकर जनता को भड़काने वाले कृषि विज्ञानी रामचंद्र मिश्रा का मुद्दा। पिरितिया के साथ बलात्कार कोई सवर्ण नहीं करता है, बल्कि पलामू में चेरो आदिवासी। वह इस तरह की कई वारदातें कर चुका है, बकौल कहानीकार। गंझू परहिया, डाकू रामसूरत। सबको सजा दी जाती है-वह सजा है मौत की, लेकिन रामचंद्र बच जाते हैं क्योंकि उन पर झूठे आरोप लगे थे। वे गांवों में कृषि का कायाकल्प कर गांव के लोगांे को रोजगार मुहैया कराते हैं। जो मजूदर पलायन करते थे, वह रुक गया है। यानी, मिश्रा जी यहां हितचिंतक के तौर पर उभरते हैं और इनका मामला जांच का विषय बन जाता है और इस तरह वे जन अदालत से छूट जाते हैं। गांव की एक महिला बताती है कि ये भले आदमी हैं- ‘ऐ बाबू्! ई सही आदमी हथ! जौना-जौना गांव में इनकर काम चलत हई, उहां के लोगन के अब शहर जाके मजूरी करे के जरूरत नइखे। गांव के जे अदमी पच्चीस-तीस रोपेया कमाये खातिर बीस कोस दूर शहर-बाजार जाइत रहन उ गांव में इनकरा साथ काम करके रोज सौ रोपेया कमात हथिन!...’ इस तरह मिश्रा जी बच जाते हैं। दरअसल दोनों कहानी आपको भी आमंत्रित करती है, आइए पलामू और फिर देखिए, ‘जन्नत’ की हकीकत।
  अंतिम कहानी ‘चना चबेना गंगजल’ है। यह खांटी बनारसी कहानी है। यहां अस्सी का चौराहा भी है और घाट भी है। छल-छद्म की चादर ओढ़े आचार्य। और उनको हर दिन गरियाता उनका एक पूर्व साथी, जिसने गाढ़े समय में उनकी मदद की थी। कहानी अस्सी चौराहे से निकलकर घाट की ओर जाती है जहां एतवारू मिलते हैं-अरे हम कौनो बाबा-फाबा नाहीं हैं! क्ेवल बंस के हैं। गंगाजी में से बूड़ल लाश खोजकर निकालते हैं। यह एतवारू ही उस आचार्य को हर संझा गरियाने जाते हैं। क्यों, इसकी एक कहानी है, जो आहिस्ता-आहिस्ता खुलता है। निश्च्छल और ईमानदार। जिस लाश को गंगाजी में से पुलिस भी नहीं ढूंढ पाती, उसे एतवारू बहुत आसानी से खोज निकालते हैं।  इस विषय पर कोई कहानी दिखाई नहीं दी, जिसने एतवारू जैसे पात्रा पर कहानी लिखी हो, जबकि बनारस से कई ख्यात कहानीकार निकले। कहते हैं, कहानी तो अपने आस-पास बिखरी होती हैं, उसे देखने वाली नजर चाहिए। घुमक्कड़ मन चाहिए। डांइग रूम में बैठकर कहानी नहीं लिखी जा सकती न खूब प्रयास से। इस कहानी में हम बनारस को महसूस कर सकते हैं, उसकी धड़कन को, उसकी संस्कृति को।
  ‘अट्टाहास काल’ हमारी छिजती संवेदना की कहानी है। मणिकर्णिका के बारे में हम सब जानते हैं यहां चिता की आग कभी ठंडी नहीं होती है। 24 घंटे चिता की लपटें उठती रहती हैं। पर, कहानी यह नहीं है। कहानी यह है कि गांव वाले एक स्वाभाविक मृत्यु को कैसे भजाते और लाश पर राजनीति करते हैं और मुआवजा वसूलते हैं। लाश की राजनीति राजनेता करते रहे हैं लेकिन गांव वाले ऐसा करें तो समझना चाहिए शहर की जो बारूदी हवा अब गांवों की ओर मुड़ गई है। गांव अपने भोलेपन के लिए जाना जाता है, लेकिन आज के समय में यह बात अब नहीं कही जा सकती है। कहानियां और भी हैं और पात्रा भी। प्रेत पाठ भी रहस्य के आवरण में लिपटी एक कौतूहल पैदा करती है। पत्तों की रात, निद्रा नदी, सीधान्त, बहुत कुछ अलग-अलग स्वाद रचती हैं। वरिष्ठ कथाकार राजेंद्र राव ने व्लर्ब पर ठीक ही लिखा है, ‘ये कहानियां पाठक को लोकजीवन के नैसर्गिक प्रवाह में बड़ी कुशलता से बहा ले जाती हैं।’ इन कहानियों में कई-कई भूगोल देखते हैं। कई-कई भाषा देखते हैं और इस वैविध्यपूर्ण रोशनी में हम अपने समय और समाज को देखते हैं। हमारे लोकजीवन पर चढ़ता शहरी रंग और इस रंग में बदरंग होते मानवीय रिश्ते, स्वार्थ की परछाइयों में अपना ही बौना होता कद और थरथराती-कांपती नदियों से अपना दुखड़ा सुनाते पलामू के पहाड़-जंगल....बिना किसी लाग-लपेट और बनावटी भाषा के।    

साभार, लमही से।


रविवार, 11 जून 2017

शहीद शेख भिखारी

सन् 1857 की क्रांति ने भारतीय इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत की। इसे भारतीय आजादी का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों में अंग्रेजों से लड़ाई का सिलसिला 1857 से पहले ही शुरू हो गया था। हां, जंगल की आग मैदानों तक नहीं पहुंच पाई थी। 1857 की क्रांति ने पूरे देश में आजादी की चिंगारी को सुलगा दिया और इस चिंगारी से छोटानागपुर का पहाड़-पठार भी धधकने से बच नहीं सका। यहां तो बहुत पहले से ही चिंगारी रह-रहकर सुलग उठती थी, लेकिन 1857 की कहानी एक नया मोड़ देती है।
इस राष्ट्रव्यापी पहली क्रांति 1857 में शेख भिखारी ने भी अहम भूमिका निभाई। एक निहायत सामान्य बुनकर परिवार में शेख भिखारी का जन्म रांची जिले के ओरमांझी थाना अंतर्गत खुदिया गांव में 1819 में हुआ था। बचपन से वह अपने खानदानी पेशा, मोटे कपड़े तैयार करना और हाट बाजार में बेचकर अपने परिवार की परवरिश में सहयोग करते थे। जब वे 20 वर्ष के हुए तो उन्होंने छोटानागपुर के महाराज के यहां नौकरी कर ली। परंतु कुछ ही दिनों के बाद अपनी प्रतिभा और बुद्धिमत्ता के कारण उन्होंने राजा के दरबार में एक अच्छी मुकाम प्राप्त कर ली। बाद में बड़कागढ़ जगन्नाथपुर के राजा ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने उनको अपने यहां दीवान के पद पर रख लिया।  शेख भिखारी के जिम्मे बड़कागढ़ की फौज का भार दे दिया गया। उस फौज में मुस्लिम और आदिवासी नौजवान थे।
1856 ई में जब अंगरेजों ने राजा महाराजाओं पर चढ़ाई करने का मंसूबा बनाया तो इसका अंदाजा देश के राजा-महाराजाओं को होने लगा था। जब इसकी भनक ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को मिली तो उन्होंने अपने वजीर पांडेय गणपतराय, दीवान शेख भिखारी, टिकैत उमरांव सिंह से सलाह-ममशवरा किया।
इन सभी ने अंगरेजों के खिलाफ मोर्चा लेने की ठान ली और जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह से पत्राचार किया। इसी बीच में शेख भिखारी ने बड़कागढ़ की फौज में रांची एवं चाईबासा के नौजवानों को भर्ती करना शुरू कर दिया। अचानक अंगरेजों ने 1857 में चढ़ाई कर दी।
 विरोध में रामगढ़ के हिंदुस्तानी रेजिमेंट ने अपने अंगरेज अफसर को मार डाला। नादिर अली हवलदार और रामविजय सिपाही ने रामगढ़ रेजिमेंट छोड़ दिया और जगन्नाथपुर में शेख भिखारी की फौज में शामिल हो गए। इस तरह जंगे आजादी की आग छोटानागपुर में फैल गई। रांची, चाईबासा, संताल परगना के जिलों से अंगरेज भाग खड़े हुए।
चाईबासा के अंसारी नौजवान अमानत अली, सलामत अली, शेख हारू तीनों सगे भाइयों ने दुमका के अंगरेज एसडीओ को मार डाला। इस घटना से छोटानागपुर में दहशत फैल गई और यह क्षेत्र अंगरेज अफसरों से खाली हो गया। इस खुशी में ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव रांची डोरंडा में जश्न मनाने लगे। इसी बीच अंगरेजों की फौज जनरल मैकडोना के नेतृत्व में रामगढ़ पहुंच गई और चुट्टूपालू की पहाड़ी रास्ते से रांची के पलटुवार चढऩे की कोशिश करने लगी।
 उनको रोकने के लिए शेख भिखारी, टिकैत उमराव सिंह अपनी फौज लेकर चुट्टूपालू पहाड़ी पहुंच गये और अंगरेजों का रास्ता रोक दिया। शेख भिखारी ने चुट्टूपालू की घाटी पार करनेवाला पुल तोड़ दिया और सड़क के पेड़ों को काटकर रास्ता जाम कर दिया। शेख भिखारी की फौज ने अंगरेजों पर गोलियों की बौछार कर अंगरेजों के छक्के छुड़ा दिय। यह लड़ाई कई दिनों तक चली।
 शेख भिखारी के पास गोलियां खत्म होने लगी तो शेख भिखारी ने अपनी फौज को पत्थर लुढ़काने का हुक्म दिया। इससे अंगरेज फौजी कुचलकर मरने लगे। यह देखकर जनरल मैकडोन ने मुकामी लोगों को मिलाकर चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढऩे के लिए दूसरे रास्ते की जानकारी ली। फिर उस खुफिया रास्ते से चुट्टूघाटी पहाड़ पर चढ़ गये। इसकी खबर शेख भिखारी को नहीं हो सकी। अंगरेजों ने शेख भिखारी एवं टिकैत उमराव सिंह को छह जनवरी 1858 को घेर कर गिरफ्तार कर लिया और सात जनवरी 1858 को उसी जगह चुट्टूघाटी पर फौजी अदालत लगाकर मैकडोना ने शेख भिखारी और उनके साथी टिकैत उमरांव को फांसी का फैसला सुनाया।
 आठ जनवरी 1858 को आजादी के आलमे बदर शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह को चुट्टूपहाड़ी के बरगद के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गयी। वह पेड़ आज भी सलामत है। यह पेड़ आज भी हमें उनकी याद दिलाता है और यहां पर हर साल शहीद दिवस के मौके पर कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। 

रविवार, 4 जून 2017

चंपारन, गांधी और रांची

चंपारन आंदोलन का यह सौंवा साल चल रहा है। इन सौ सालों में बहुत कुछ बदला और इसके साक्षी हम सभी हैं। देश को आजाद हुए भी 69 साल हो गए है और समाज ही नहीं, देश की राजनीति ने भी अपना एक नया कलेवर और चरित्रा धारण कर लिया है। यह रोज-रोज दिखाई देता है। इस राजनीति में विलग आज चंपारन को फिर-फिर पढ़ने-देखने की जरूरत महसूस हो रही है ताकि हम देख सकें कि उस दौर में चंपारन के लोगों ने, उस समय के अपने तमाम बड़े नेताओं, खासकर, बिहार में भी, रहते हुए आखिर मोहनदास करमचंद गांधी में अपनी मुक्ति क्यों देखी? जबकि चंपारन के किसानों की दुर्दशा किसी से छिपी नहीं थी। कानपुर का ‘प्रताप’ अखबार और बिहार से प्रकाशित ‘बिहार बंधु’ में चंपारन के दुख-दर्द-दुर्दशा की कहानियां प्रकाशित होती रहती थीं। तब भी कोई ‘बड़ा’ नेता किसानों की समस्याओं को दूर करने की पहल करते नहीं दिखाई देता है। तो क्या, प्रकृति अपना काम कर रही थी या कोई अदृश्य शक्ति? एक लंबे समय से नीलवरों द्वारा प्रताडि़त रैयतों को जब मोहनदास करमचंद गांधी का साथ मिला तो एक दो साल में ही चंपारन नीलवरों के अत्याचार से आजाद ही नहीं हुआ, बल्कि नीलवरों को अपना बोडि़या-बिस्तर भी समेटना पड़ा। यद्यपि, इसी समय यानी 1916-17 में ही नई तकनीक से नील बनाने की कला इजाद हो गई थी, जिसके कारण भी यह धंधा रसातल की ओर जा रहा था। इसलिए भी नीलवरों को अपना धंधा समेटने के अलावा कोई दूसरा विकल्प उनके सामने नहीं था।
यदि इस पूरे आंदोलन पर नजर डालें तो दो बातें निकलकर आती हैं। पहला यह कि भारत लौटने के बाद गांधी ने पहला आंदोलन अपने हाथ में लिया और अहिंसा के अस्त्रा से इस आंदोलन में जीत हासिल की। उनका आत्मविश्वास भी इस आंदोलन से बढ़ा और दूसरा यह कि मोहनदास से महात्मा की राह यहीं से शुरू हुई, जो असयोग आंदोलन में और पुख्ता हुई। गांधी के अध्येता यह भली-भांति जानते हैं। ‘मोहनदास’ से ‘गांधी’ और फिर ‘महात्मा’ की यात्रा का उत्स यही चंपारन ही था। चंपारन एक ऐसा पड़ाव है, जहां से गांधी की प्रतिष्ठा और पहचान जुड़ी है। गांधी के इस आंदोलन में कूदने के कई फायदे हैं और उनके शांतिपूर्ण आंदोलन के कारण अंग्रेजांे को अपनी क्रूरता पर तरस आया और फिर वे अपने शोषण पर तार्किक ढंग से विचार करने और किसानों के पक्ष में कानून बनाने के लिए बाध्य हुए। इसका बहुत कुछ श्रेय गांधी को जाता है और गांधी को नीलहे गोरों की करतूत के बारे में जानकारी देने वाले राजकुमार शुक्ल को भी, जो गांधी को चंपारन ले आए। इसके लिए उन्होंने काफी मुश्किलों का सामना किया। इस आंदोलन में नींव के पत्थर की तरह काम किए राजकुमार शुक्ल। इन्हें भी जानना जरूरी है। यह वही थे, जिन्होंने गांधी को पं चंपारन चलने के लिए बाध्य किया। इसका जिक्र खुद गांधीजी ने भी किया है। गांधीजी ने पूरी ईमानदारी से यह स्वीकार किया है कि चंपारन आंदोलन की सफलता के कारण ही वे भारत से भी अंग्रेजों को खदेड़ने में कामयाब हुए। लुई फिशर ने भी इसका उल्लेख अपनी पुस्तक ‘गांधी की कहानी’ में किया है। लुई के शब्द हैं- ‘जब मैं 1942 में सेवाग्राम आश्रम में गांधीजी से पहलीबार मिला तो उन्होंने मुझसे कहा-‘‘मैं तुम्हें बतलाउ$ंगा कि वह कौनसी घटना थी, जिसके कारण मैंने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर जोर देने का निश्चय किया। यह घटना 1917 की है।’’
फिशर ने आगे कहा है, -गांधीजी कांग्रेस के दिसंबर 1916 के लखनउ$-अधिवेशन में शामिल होने लिए गए थे। गांधीजी ने लिखा है--‘जब कांग्रेस की कार्रवाई चल रही थी, एक किसान, भारत के अन्य किसानों की तरह गरीब और कृश तन दिखाई देने वाला मेरे पास आया और बोला-मैं राजकुमार शुक्ल हूं। मैं चंपारन से आया हूं और चाहता हूं कि आप मेरे जिले में चलें।’ गांधीजी ने चंपारन का नाम पहले कभी नहीं सुना था। यह लुई जोड़ते हैं।
‘बहुत दिनों से चली आ रही व्यवस्था के अनुसार चंपारन के किसान तीन कठिए थे। राज कुमार शुक्ल भी ऐसे किसानों में थे। वह कांग्रेस-अधिवेशन में चंपारन की इस जमींदारी प्रथा के विरुद्ध शिकायत करने आए थे और शायद किसी ने उसे सलाह दी थी कि गांधीजी से बात करें।’
गांधीजी अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में भी इस घटना का जिक्र करते हैं,- मुझे यह स्वीकार करना चाहिए कि वहां जाने से पहले मैं चंपारन का नाम तक नहीं जानता था। नील की खेती होती है, इसका ख्याल भी नहीं के बराबर था। नील की गोटियां मैंने देखी थीं, पर वे चंपारन में बनती हैं, और उनके कारण हजारों किसानों को कष्ट भोगना पड़ता है, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं थी।’...‘राजकुमार शुक्ल नामक चंपारन के एक किसान थे। उन पर दुख पड़ा था। यह दुख उन्हें अखरता था। लेकिन अपने इस दुख के कारण उनमें नील के इस दाग को सबके लिए धो डालने की तीव्र लगन पैदा हो गई थी। जब मैं लखनउ$ कांग्रेस में गया तो वहां इस किसान ने मेरा पीछा पकड़ा।’
राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी ने चंपारन आने का निवेदन किया और बताया कि इस बारे में वकील बाबू यानी गांधी के प्रिय साथी ब्रजकिशोर बाबू आपको सब बता देंगे। यही हुआ।
गांधीजी आगे लिखते हैं-मैंने उनसे चंपारन की थोड़ी कथा सुनी। अपने रिवाज के अनुसार मैंने जवाब दिया, ‘खुद देखे बिना इस विषय पर मैं कोई राय नहीं दे सकता। आप कांग्रेस में बोलिएगा। मुझे तो फिलहाल छोड़ ही दीजिए।’ राजकुमार शुक्ल को कांग्रेस की मदद की तो जरूरत थी ही। ब्रजकिशोर बाबू कांग्रेस में चंपारन के बारे में बोले और सहानुभूति-सूचक प्रस्ताव पास हुआ।’
गांधी को राजकुमार शुक्ल ने इस बात के लिए मना लिया कि वे अपनी आंखों से चंपारन को देखें। गांधी ने तिथि बता दी और कलकत्ते जाकर गांधी को चंपारन ले आए। गांधी ने चंपारन को देखा। चंपारन के साथ-साथ छुआछूत से सामना हुआ। कई और समस्याआंे को देखा। निलहे के अत्याचार के साथ-साथ छुआछूत और शिक्षा पर भी गांधी ने ध्यान दिया और इस तरफ भी कदम बढ़ाए। पूरे आंदोलन पर दृष्टिपात करें तो इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि एक तरह से चंपारन ने ही गांधी को गढ़ा और आगे का रास्ता दिखाया। चंपारन के अनुभव ने आजादी के आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई।
पर, इस पूरे आंदोलन में राजकुमार शुक्ल के साथ कई लोग जुड़े थे, जो सिर्फ इतिहास में सिमट कर रह गए और रांची, जहां चंपारन की कार्यवाहियां हुई, आंदोलन की रूपरेखा बनी, वह भी भूला दी गई। रांची का जिक्र एकाध जगह राजकुमार शुक्ल की जीवनीकार राय प्रभाकर प्रसाद ने किया है और डॉ राजेंद्र प्रसाद ने भी अपनी आत्मकथा और फिर ‘चंपारन में महात्मा गांधी’ में किया है। यद्यपि गांधी वांगमय में पूरे विस्तार से रांची आती है। यह ध्यान रखने की बात है कि जब राजकुमार शुक्ल गांधी से मिले और चंपारन आने के लिए बार-बार आग्रह कर रहे थे, उस समय उनकी उम्र 41 साल थी और गांधी उनसे छह साल बड़े यानी 47 साल के थे। यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि दक्षिण अफ्रीका से भारत आने से पहले गांधीजी की कहानी भारत पहुंच चुकी थी।

कहते हैं, पं बंगाल के बाद 1813 में चंपारन में नील का पहला कारखाना कर्नल हिक्की चकिया रेलवे स्टेशन के करीब एक किमी दक्षिण बारा या बाराकिया में स्थापित किया था। पहले यहां के किसान गन्ने की खेती करते थे। इससे काफी आय भी होती थी, लेकिन 1850 में नील के भाव काफी बढ़ गए तो चीनी के कारखानों के स्थान पर नील के कारखानों ने जगह ले ली। शुरू-शुरू में जहां जहां नील और ईख की खेती के लिए मिट्टी अच्छी होती है, वहां नील के कारखाने स्थापित होते गए। लेकिन 1875 तक आते-आते निलहे गोरों ने अपना दबदबा कायम कर लिया। 1892-97 में एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि चंपारन में नील के 21 कारखाने तथा उनकी 48 कोठियों में करीब 33 हजार कामगार थे और 95,970 एकड़ अर्थात कुल कृषि भूमि के सात प्रतिशत भाग में नील की खेती हो रही थी। इसी तरह निलहों का अत्याचार भी रैयतों पर बढ़ने लगा था। इसी बीच 1897 में विश्व में कृत्रिम नील बाजार में आ गया। इससे नील का भाव गिर गया। पटना से प्रकाशित ‘बिहार बंधु’ के 20 जनवरी, 1899 के अंक मंे छपा कि आजकल नील बहुत मंदी है। और 20 अगस्त 1899 के अंक में छपा कि इस वर्ष की वर्षा से मुजफ्फरपुर में नील की बहुत बर्बादी हुई, लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध छिड़ जाने के कारण जर्मनी से कृत्रिम नील आना बंद हो गया और बिहार में नील का भाव उछलकर 675 रुपये प्रति मन हो गया। जिस नील की कीमत 234 रुपये मन रहता था, गिरकर सौ रुपये मन हो जाता है; अचानक उसकी कीमत में इतना भारी उछाल हो जाता है। निलहे गोरों की बांछे खिल जाती है। अब नील की खेती के लिए अत्याचार का दूसरा दौर शुरू हो जाता है। बेतिया राज का प्रबंध यूरोपियों के हाथ में रहने कारण यहां निलहों की मनमानी चलती है। एक तरफ दमन शुरू होता है और दूसरी ओर विरोध के स्वर भी उठने लगते हैं।
चंपारन में नील की खेती के साथ ही इसका विरोध भी शुरू हो गया। कई तरह के लगान भी जबदरस्ती वसूले जाते हैं। इससे किसानों की परेशानी बढ़ती जाती है। जिस बेतिया राजा के अधीन यह क्षेत्रा था, वह पहले ही अंग्रेजों से कर्ज लेकर अपनी सीमा खींच दी थी। अब किसानों के सामने खुद अपनी बात रखने, लड़ने और आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं था। धीरे-धीरे कुछ गांवों के किसान नीलहों की कारगुजारी से लड़ने की हिम्मत जुटाते और 1907 तक आते आते सतबरिया के राजकुमार शुक्ल, साठी गांव के शेख गुलाब, मठिया गांव के शीतल राय आगे बढ़ते हैं। शेख गुलाब के नेतृत्व में मुसलमान रैयत मिटिंग करते हैं और नील की खेती छोड़ देते हैं। पर, इतने से ही समस्या का समाधान नहीं होना था। तीनों पीडि़त किसानों से चंदा वसूलकर कुछ राशि एकत्रित करते हैं ताकि मुकदमें लड़े जा सकें। मुकदमा लड़ना भी इन किसानों के बस में नहीं था। लड़ तो रहे थे, लेकिन नीलहों का अत्याचार भी कम नहीं हो रहा था। कहीं कोई रोशनी नहीं दिखाई दे रही थी। वैसाख की तपती दोपहरी की तरह किसानों का जीवन भी तप रहा था। राजकुमार शुक्ल ने दूसरी तरकीब भी निकाली और वे गांव-गांव घूमकर लोगों में अलख जगाने लगे और उस समय के समाचार पत्रों कानपुर के प्रताप, इलाहाबाद के अभ्युदय और नागपुर के हिंद केशरी में नीलहों के अत्याचार और किसानों की दुर्दशा का जिक्र कर पत्रा छपवाने लगे। इसके अलावा तीन अप्रैल, 1915 को छपरा में आयोजित बिहार प्रांतीय राजनीतिक सम्मेलन के मंच से अपना दुखड़ा कह सुनाया। इसी साल मई 1915 में ब्रज किशोर प्रसाद ने विधान परिषद में भी प्रस्ताव रखा, जिसे अनसुना कर दिया गया। पर उसी साल जून में एक अफसर ने रिपोर्ट प्रस्तुत कर नीलहों के अत्याचार को सही ठहराया। इन सबके बावजूद अत्याचार कम नहीं हो रहे थे और न शुक्ल हार मान रहे थे। अगले साल 1916 के दिसंबर के आखिरी सप्ताह में लखनउ$ में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था तो वहां भी ब्रजकिशोर बाबू के साथ शुक्ल जी गांधी के पैरों पर गिर पड़े। उनसे अनुरोध किया कि चंपारन के किसानों की दुर्दशा पर एक प्रस्ताव लाएं, लेकिन गांधी ने जवाब दिया कि जब तक अपनी आंखों से देख न लें, तब तक इस पर अपना विचार नहीं दे सकता। गांधी के जवाब के बाद प्रस्ताव बाबू ब्रजकिशोर ने पेश किया और राजकुमार शुक्ल ने उसका समर्थन किया।
डॉॅ राजेंद्र प्रसाद ‘ बापू के कदमों में’ में इसका उल्लेख इन शब्दों में करते हैं--‘कांग्रेस के बाद सब लोग अपने-अपने स्थान को चले गए, पर राजकुमार शुक्ल ने गांधीजी से वचन ले लिया कि जब वह कभी बिहार की ओर से गुजरेंगे तो चंपारन भी जाएंगे और वहां की हालत देखेंगे। मार्च 1917 में गांधीजी को एक बार कलकत्ता की ओर जाना पड़ा और उन्होंने राजकुमार शुक्ल को पत्रा लिखा कि उनसे वह कलकत्ता में मिलें और वहां से उनको अपने साथ चंपारन ले जाएं। पर दुर्भाग्यवश यह पत्रा राजकुमार शुक्ल को देर से मिला और तब तक गांधीजी कलकत्ता से वापस चले जा चुके थे।’ हालांकि इसका दुख राजकुमार शुक्ल को हुआ, लेकिन इसमें इनकी क्या गलती। डाक विभाग ने पत्रा ही बहुत देर से दिया। हालांकि दूसरा मौका भी जल्द मिल गया। डॉ राजेंद्र प्रसाद लिखते हैं, ‘अप्रैल 1917 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी की बैठक कलकत्ता में, ईस्टर की छुट्टियों में होने वाली थी। गांधीजी उसमें शरीक होने कलकत्ता गए और इस बात की सूचना उन्होंने राजकुमार शुक्ल को दे दी।’ पत्रा समय से मिल गया और राजकुमार शुक्ल भी समय से कलकत्ता पहुंच गए और गांधीजी को पटना लेकर पहुंचे। इस अधिवेशन में डॉ राजेंद्र प्रसाद भी गए थे, लेकिन उस समय तक गांधीजी और राजेंद्र बाबू एक दूसरे से अपरिचित थे। उन्हीं के शब्दों में, -मैं अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी का सदस्य था और उस जलसे में शरीक था। इत्तिफाक से जलसे में में गांधीजी के बहुत नजदीक बैठा था, पर वह मुझे जानते नहीं थे और न मैं यह जानता कि वह कलकत्ता से ही सीधे बिहार जाने वाले हैं। राजकुमार शुक्ल उनके सभा तक ले गए थे, पर बाहर ही ठहर गए थे, इसलिए मेरी मुलाकात उनसे भी नहीं हुई। सभा समाप्त होने पर मैं जगन्नाथपुरी चला गया और इधर गांधीजी राजकुमार शुक्ल के साथ पटना चले आए।’ राजेंद्र बाबू वहां से पुरी चले गए और गांधीजी को शुक्ल जी साथ लेकर राजेंद्र बाबू के घर पटना पहुंचे।
यहां गांधीजी को समझना जरूरी है। गांधीजी का एक व्यक्तित्व बन चुका था और सादगी ने उनके जीवन में प्रवेश कर लिया था। दूसरे नेताओं की तरह चमक-दमक उनके पहनावे में नहीं था। इसलिए जब वे राजेंद्र प्रसाद के आवास पर पहुंचे तो राजेंद्र बाबू का नौकर उन्हें एक देहाती मुवक्किल ही समझा। राजकुमार शुक्ल तो देहाती थे ही और उनकी बोली-बानी भी। इसलिए नौकर की नजर में दोनों ही देहाती थे। गांधीजी का उस समय का पहनावा ग्रामीण भारतीय की तरह ही था। धोती, अचकन और काठियावाड़ी पगड़ी। कभी-कभी वह धोती-कुरता के साथ एक मामूली टोपी भी पहन लिया करते थे, जो बाद में गांधीटोपी के नाम से मशहूर हो गया। और यह टोपी खादी की होती थी। नौकर ने दोनों के साथ मुवक्किल की तरह ही बरताव किया और उस पाखाने का भी इस्तेमाल करने नहीं दिया, जो खास घर के मालिक के इस्तेमाल में रहा करते थे। गांधीजी ने नित्यक्रिया और स्नानादि नहीं किया था। कुछ समय बाद पटना के मजहरूल हक को खबर लग गई कि गांधीजी पटना आए हैं तो वे खुद राजेंद्र बाबू के घर पहुंचकर अपने घर लिवा आए। मजहरूल साहब इंग्लैंड से वकालत पढ़ने के बाद गांधीजी के साथ ही जहाज से वापस आए थे। इसलिए दोनों के एक दूसरे से पूर्व परिचित थे। यहां से फिर चंपारन की यात्रा शुरू होती है। बीच में कृपलानी मिलते हैं। इस तरह चंपारन की धरती पर गांधीजी के कदम पड़े।
लेकिन यहीं पर यह कहना मुनासिब होगा कि आखिर जब बिहार में एक से एक नेता थे, तो उन्होंने चंपारन के किसानों की दुर्दशा को दूर करने के लिए क्यों नहीं कुछ किया? कुछ वकील मुकदमा तो लड़ते रहे, लेकिन उन्हें अपनी फीस से मतलब थी। इसका दुख पीर मुहम्मद मूनिस ने प्रताप के 13 मार्च, 1916 के अंक में ‘दुखी’ नाम से लिखे अपने लेख ‘चंपारण में अंधेरे’ में किया है। लेख की अंतिम पंक्तियां हैं-‘हमारी समझ में यह बात नहीं आती कि जिस प्रांत में मि. मजहरूल हक, सैयद अली इमाम, स. हसन इमाम, मि. दास जैसे प्रभावशाली नेता रहते हैं, वहां की प्रजा भी अनेक दुःखों से ग्रसित रहे। बिहार के नेताओं को लज्जा आनी चाहिए कि उनके 18 लाख भाई इस प्रकार के दुःख भोगे, पशुवत जिंदगी बिताएं और आप मौज से सुख चैन की बंसी बजाते फिरें, उनकी कोई खबर ही न लें। श्रीयुक्त पांडेय जगन्नाथ प्रसादजी से हमारी प्रार्थना है कि जयप्रकाश मैदान में आकर देश के सामने चंपारण की प्रजा का आर्तनाद सुनने की चेष्टा कीजिए, देश अवश्य सहायता करेगा। मगर जरा यह भी ध्यान रहे कि ‘‘जो अपनी सहायता आप करता है, उसकी सहायता परमात्मा भी करता है।’’
पीर मुनिस के बारे में भी जान लेना जरूरी है। आचार्य शिवपूजन सहाय ने इनके बारे में लिखा है, ‘पीर मुहम्मद मुनिस बिहार के चंपारण जिले के निवासी थे। बेतिया नगर में उनका मकान था। उनकी आर्थिक दशा जितनी शोचनीय थी, उतनी ही उनकी देशभक्ति अभिनंदनीय थी। आजीवन वे हिंदी और हिंदुस्तानी की सेवा में निस्पृह भाव से तत्पर रहे। चंपारण के निलहे गोरों के अत्याचार से उत्पीडि़त जनता की आह से द्रवित होकर उन्होंने अपनी वास्तविक स्थिति बिसार दी। कानपुर के हिंदी साप्ताहिक प्रताप में, उसके प्रकाशन के आरंभ काल 1913 से ही, वे पीडि़त प्रजा की दुःखगाथा नियमित रूप से देशवासियों को सुनाने लगे। प्रताप के प्रतापी संपादक श्री गणेश शंकर विद्यार्थी के उत्तेजन और प्रोत्साहन से वे बड़ी निर्भीकता के साथ आततायी गोरों के भीषण कुकृत्यों का भंडाफोड़ करते रहे।’
ये वही पीर मुनिस थे, जिनसे राजकुमार शुक्ल ने गांधी के नाम पत्रा लिखवाया था। उस पत्रा को भी देख लेना चाहिए ताकि चंपारण के घोर देहात में रहने वाले भी गांधीजी के बारे में क्या-क्या जानते थे। इस पत्रा से भी चंपारण की स्थिति को समझ सकते हैं-
बेतिया
27 फरवरी, 1917
मान्यवर महात्मा,
सुनते ही रोज औरों के
आज मेरी भी दास्तान सुनो।
आपने उस अनहोनी को प्रत्यक्ष का कार्यरूप में परिणत कर दिखाया, जिसे टॉलस्टाय जैसे महात्मा केवल विचारा करते थे। उसी आशा और विश्वास के वशीभूत होकर हम आपके निकट अपनी राम कहानी सुनाने के लिए तैयार हैं। हमारी दुःख भरी कथा उस दक्षिण अफ्रीका के अत्याचार से, जो आप और आपके अनुयायी वरी सत्याग्रही बहनों और भाइयों के साथ हुआ कहीं अधिक है। हम अपना वह दुःख जो हमारी 19 लाख आत्माओं के हृदय पर बीत रहा है, सुनाकर आपके कोमल हृदय को दुखित करना उचित नहीं समझते। बस, केवल इतनी ही प्रार्थना है कि आप स्वयं आकर अपनी आंखांे से देख लीजिए, तब आपको अच्छी तरह विश्वास हो जाएगा कि भारतवर्ष के एक कोने में में यहां की प्रजा, जिसको ब्रिटिश छत्रा की सुशीतल छाया में रहने का अभिमान प्राप्त है, किस प्रकार के कष्ट सहकर पशुवत जीवन व्यतीत कर रही है। हम और अधिक न लिखकर आपका ध्यान उस प्रतिज्ञा की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं, जो लखनउ$ कांग्रेस के समय और फिर वहां से लौटते समय कानपुर में आपने की थी, अर्थात मार्च-अप्रैल के महीने में चंपारण आउ$ंगा, बस अब समय आ गया है। श्रीमान् अपनी प्रतिज्ञा को पूर्ण करें। चंपारण की 19 लाख की दुःखी प्रजा श्रीमान् के चरण-कमल के दर्शन की टकटकी लगाए बैठी है। और उन्हें आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि जिस प्रकार भगवान् श्रीरामचंद्र के चरण स्पर्श से अहिल्या तर गई, उसी प्रकार श्रीमान् के चंपारण में पैर रखते ही हम 19 लाख प्रजाओं का उद्धार हो जाएगा। 
श्रीमान का दर्शनाभिलाषी
राजकुमार शुक्ल

ध्यान दें तो इस पत्रा में गांधीजी को महात्मा संबोधित किया गया है। क्या सबसे पहले राजकुमार शुक्ल ने ही उन्हें महात्मा शब्द से संबोधित किया और दूसरा यह कि बिहार में तमाम बड़े नेताओं के रहते हुए भी चंपारण की अनपढ़ जनता आखिर गांधीजी में ही अपनी मुक्ति क्यों देखती थी? दक्षिण अफ्रीका की कहानी जरूर यहां तक पहंुच चुकी थी, लेकिन भारत आने के बाद उन्होंने ऐसा कोई आंदोलन नहीं किया था, जिसे देखकर चंपारण की जनता आंख मंूद कर विश्वास करे, लेकिन पढ़े-लिखों से चंपारण की जनता दूरदर्शी साबित हुई।


महात्मा गांधी ने राजेंद्र प्रसाद, बाबू ब्रजकिशोर के साथ अपना काम शुरू कर दिया और इधर धीरे-धीरे नीलहों में डर भी पैदा होने लगा। किसानों की दर्दभरी कहानियां लिपिबद्ध होने लगी और इसमें काफी समय लगा। गांधी के इस आंदोलन में शामिल हो जाने के बाद अंगरेज अधिकारियों ने अपने स्तर से इसकी निगरानी शुरू कर दी। गांधीजी ने वहां के किसानों में निडरता भरी। अपनी बात किसी के भी सामने खुलकर बोलने का जज्बा पैदा किया। मजिस्ट्रेट ने एक लंबी रिपोर्ट गवर्नमेंट को लिखी, जिसका सारांश यह था कि रैयतों में इतनी खलबली हो गई कि अब वे नीलहों को ही नहीं, बल्कि सरकारी अफसरों को भी कुछ नहीं समझते। करीब दस हजार से अधिक रैयतों का बयान लिया जा चुका था। इसकी खबर अंग्रेज सरकार को थी। इस बीच गवर्नमेंट का एक पत्रा आया कि जांच पूरी हो गई होगी, इसलिए रेवन्यु बोर्ड के मेंबर को, जो उ$ंचे पदाधिकारी होते थे, एक सीनियर सिविलियन अंगरेज अफसर थे, गवर्नमेंट रांची से पटना भेज रही है। गांधीजी उनसे मिलें और बातें करें और अपनी जांच का नतीजा बतावें। गांधीजी बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद के साथ पटना गए और रेवन्यु मेंबर से मुलाकात की। रेवन्यु मेंबर ने रिपोर्ट पाकर, गवर्नमेंट के हुक्म से उसकी प्रतियां नीलवरों, सरकारी कर्मचारियों और कुछ दूसरे लोगों के पास भेज दी। रिपोर्ट के उत्तर में सरकारी कर्मचारियों और नीलहों ने अपने-अपने बयान गवर्नमेंट को भेज दी। खलबली चारों तरफ थी कि इसी बीच फिर एक पत्रा रांची से चंपारन पहुंचा। सरकार अब गांधीजी को चंपारन से हटाने पर विचार कर रही थी। इसलिए रांची में रह रहे लेफ्टिनेंट गर्वनर सर एडवर्ट गेट चाहते हैं कि गांधीजी उनसे मिल लें। पत्रा पाकर गांधीजी रांची में चंपारन के किसानों की समस्याओं को लेकर आड्रे हाउस में लेफ्निेेंट गर्वनर से मिले। इसके बाद मुख्य सचिव आदि से भी मिले, जो उस समय यहीं रहते थे। गांधी की यह छोटी अवधि की यात्रा थी। इसके बाद वे बिहार चले गए। इसके बाद आठ जुलाई को लिखे गए दो पत्रा भी रांची के पते से मिलते हैं। इसके बाद 23 सितंबर, 1917 का पत्रा रांची से लिखा मिलता है, जिसे मगनलाल गांधी को लिखा गया था। वह फिर चंपारन समिति की बैठक के सिलसिले में रांची आए थे। 24 सितंबर को चंपारन समिति की बैठक रांची में ही हुई थी। यह बैठक काफी लंबी चली और आंदोलन को लेकर काफी विमर्श हुआ। 25 जुलाई 1917 को गांधी जी ने लीडर अखबार के संपादक के नाम पत्रा रांची से ही लिखा। इसमें कहा कि दक्षिण अफ्रिका से भारत आए मुझे ढाई साल से कुछ अधिक समय हो गया। इस समय का एक चतुर्थांश मैंने स्वेच्छापूर्वक भारतीय रेलों के तीसरे दर्जे में यात्रा करने में बिताया। यह पत्रा काफी लंबा है, जिसे लीडर ने चार अक्टूबर को छापा। 25 सितंबर को ही जमनालाल बजाज को भी पत्रा लिखा। इसके बाद मगन लाल गांधी को, जिसें जिक्र किया कि बुखार से मुक्त नहीं हुआ हंू। बुखार में भी वे चंपारन समिति की बैठक में भाग लेते रहे। एक पत्रा 27 सितंबर को जीए नटेसन को लिखा और उसमें भी अंत में लिखा कि ‘मेरे ज्वर के कारण आप चिंतित न हों। वह अपने समय से ही जाएगा। वह यहां अक्टूबर के पहले सप्ताह तक रांची रहे। रांची में गांधीजी के रहने के बारे में चार अक्टूबर 1917 तक का जिक्र मिलता है। चंपारन के इस आंदोलन में रांची भी जुड़ गया और यह एक प्रमुख केंद्र बन गया। गेट ने एक कमीशन बना दी और गांधीजी को इसका मेंबर बनाने के लिए राजी कर लिया। इसके बाद कमीशन का काम बेतिया से शुरू हुआ। राजेंद्र प्रसाद लिखते हैं-‘ कुछ सरकारी अफसरों और कुछ नीलवरों ने अपने-अपने लिखित बयान दिए, उनके जबानी इजहार भी लिए गए। कमिशन मोतिहारी में भी कई दिनों तक बैठा। उनके मेंबरों ने कितनी ही नील-कोठियों में जाकर नीलवरों के इजहार लिए और उनके कागज-पत्रा भी देखे गए।...इजहार का काम खत्म हो जाने पर रिपोर्ट लिखने का समय आया। सर एडवर्ड गेट ने महात्माजी से कह दिया कि कमीशन यदि सर्वसम्मति से रिपोर्ट देगा तो उस रिपोर्ट पर गवर्नमेंट आसानी से काम कर सकेगी। पर यदि रिपोर्ट में भिन्न-भिन्न मत सदस्यों ने प्रकट किए तो गवर्नमेंट को उस रिपोर्ट के आधार पर काम करने में कठिनाई होगी।’ अंततः रिपोर्ट सर्वसम्मति से सरकार को भेजी गई। जांच रिपोर्ट की प्रायः सभी बातें मंजूर कर 18 अक्टूबर 1917 को सरकार ने अपना मंतव्य प्रकाशित कर दिया। उसके बाद निलहों में खलबली मच गई। सरकार ने रिपोर्ट के आधार पर एक कानून बनाया, जिसके जरिए तीन कठिया प्रथा गैरकानूनी करार दी गई और लगान में इजाफा भी उपर्युक्त मात्रा में कम कर दिया गया। 19 नवंबर को विधान परिषद में मि मौड ने चंपारण भूमि विधेयक प्रस्तुत किया। इस अवसर पर उन्होंने एक व्याख्यान दिया और 50-60 वर्षों का चंपारन में नील-संबंधी झगड़ों का संक्षिप्त इतिहास भी प्रस्तुत किया। यह विधेयक एक प्रवर समिति को विचारार्थ भेज दिया गया। समिति ने कुछ संशोधन की बात कही। संशोधित विधेयक 20 फरवरी 1918 को सरकारी गजट मंे प्रकाशित हुआ। अंत में चार मार्च 1918 को परिषद इस विधेयक को स्वीकृति प्रदान कर देती है। इस अधिनियम का सार यह था कि मालिक और रैयत के बीच किसी अनुबंध के बावजूद रैयत मालिक के लिए अपनी जोत के किसी हिस्से में कोई खास फसल उपजाने के लिए बाध्य नहीं होगा तथा उक्त अनुबंध रद समझा जाएगा। इस प्रकार की कोई प्रविष्टि यदि सर्वे खतियान में है तो उसे भी रद कर दिया जाता है। अब रैयत की स्वेच्छा पर निर्भर है कि वह मालिक को किसी खास फसल की निश्चित रकम तौलकर देने के लिए अनुबंध कर सके, पर उसकी जोत पर पाबंदी नहीं रह जाती। इस प्रकार तिनकठिया प्रथा समाप्त हुई और नील का झगड़ा भी। हालांकि कुछ लोगों ने टीका-टिप्पणी भी की, लेकिन गांधीजी को विश्वास था कि तीन कठिया प्रथा उठ जाने के बाद नीलहे यहां ज्यादा दिन ठहर नहीं सकते, क्योंकि उनका कारबार जुल्म और जबरदस्ती से चलता था-अगर यह बंद हो जाए तो वे यहां ठहर नहीं सकते। हुआ भी यही। महात्मा गांधी के चंपारन जाने और इस जांच तथा रिपोर्ट और नए कानून बनने के थोड़े दिन बाद नीलहे अपनी जमीन, कोठी, माल-मवेशी बेचकर चले गए। गांधीजी के पहुंचते ही उनका रोब उठ गया था। उन्होंने उन्हीें रैयतों और बेतिया राज के हाथों में अपना सबकुछ बेच डाला।

गांधीजी की यह पहली जीत थी, जिसमें एक बूंद रक्त भी नहीं बहा था। इस जीत से चंपारन के रैयतों का भी आत्मविश्वास बढ़ा और उनके भीतर का डर गायब हुआ। इसका परिणाम आगे चलकर भी दिखा। पर गांधीजी इस जीत से ही उत्साहित नहीं थे। वे पिछड़े गांवों में कुछ सकारात्मक काम भी करना चाहते थे। छुआछूत का शिकार तो आते ही हुए थे, लेकिन कुछ और भी समस्याएं थीं। वह जानते थे कि शिक्षा बहुत जरूरी है। आज नीलहे गए, कल दूसरे आ जाएंगे और जुुल्म कभी र$केगा नहीं। इसलिए तीन-चार पाठशालाएं खोलीं। इन पाठशालों में पढ़ाने वाले त्यागी कार्यकर्ता बिहार से न्यून महाराष्ट्र और गुजरात से ज्यादा थे। इनमें महिलाएं भी शामिल थीं। बिहारियों में केवल धरणीधर एक स्कूल चलाते थे। बाहर के महादेव भाई देसाई, उनकी पत्नी दुर्गाबाई, साबरमती आश्रम के श्री नरहरि पारिख, उनकी पत्नी मणि बहन, स्वयं कस्तूरबा भी रहीं। बंबई के वामन गोखले सहित कई नाम। पर ये नाम अब खो गए हैं?
बहरहाल, चंपारन नीलहों के आतंक से मुक्त हुआ। इसका पूरा-पूरा श्रेय राजकुमार शुक्ल को जाता है, जिन्होंने गांधीजी को चंपारन आने के लिए विवश किया। चंपारन के बाद गांधीजी अब देश की आजादी में सक्रिय हो जाते हैं और राजकुमार शुक्ल अपने अवसान की ओर। एक बड़ा मार्मिक प्रसंग का हवाला राय प्रभाकर प्रसाद ने दिया है---
शुक्लजी गांधीजी को कई पत्रा लिखते हैं। वे लिखते हैं कि अब बुझने ही वाला हूं, क्या आप चंपारन नहीं आएंगे? शुक्ल जी धैर्य टूट जाता है औरवे एक दिन मोतिहारी से साबरमती के लिए प्रस्थान कर जाते हैं। पंद्रहवें-सोलहवें दिन उन्हें गांधी और बा के दर्शन होते हैं। बा की आंखें भर जाती हैं। पूछती हैं-यह आपको क्या हो गया पंडितजी? शुक्लजी की आंखें डबडबा जाती हैं, गला रुंध जाता है। गांधीजी उनसे कहते हैं, आपकी तपस्या अवश्य रंग लाएगी। आज नहीं तो कल देश आजाद होगा। लेकिन शुक्लजी पूछते हैं, क्या वह दिन मैं देख सकूंगा, तो गांधीजी निरुत्तर हो जाते हैं। आश्रम में कुछ दिन ठहरकर शुक्लजी वापस चंपारन आ जाते हैं और 20मई, 1929 को उनका निधन हो जाता है और चंदे से उनका दाह-संस्कार होता है। जब शुक्लजी के निधन की खबर क्रूर-अत्याचारी नीलहे एमन को मिलती है तो वह खुश नहीं होता है। उसके चेहरे पर विषाद छा जाता है। वह अनायास बोल पड़ता है, ‘चंपारन का वह अकेला मर्द था, जो मुझसे 25 साल तक लड़ता रहा।’ ऐमन इस बात को जानता था कि शुक्लजी के घर-परिवार की सारी संपत्ति कोठियों से मुकदमा लड़ते-लड़ते तथा गरीबों और मजदूरों की मदद करते-करते समाप्त हो गई है। उनके घर परिवार में कोई कमाउ$ व्यक्ति नहीं है। अपने एक कर्मचारी के मार्फत ऐमन शुक्लजी के श्राद्ध के लिए विधवा तथा बेटी दामाद को तीन सौ रुपये भेजवाता है। कर्मचारी रुपये लेकर हक्का-बक्का साहब का मुंह ताक रहा है। कुछ क्षण बाद बोलता है, ‘हुजूर वह तो आपका दुश्मन था...’ बात काटकर ऐमन कहता है, ‘तुम उसकी कीमत नहीं समझोगे।’ 
श्राद्ध के दिन डॉ राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह बाबू, ब्रजकिशोर बाबू आदि दर्जनों नेता सतवरिया में शामिल हुए। ऐमन भी उसमें शामिल हुआ। राजेंद्र बाबू उससे पूछते हैं, आपका दुश्मन तो चला गया, अब खुश होइए। ऐमन वही बात दुहराता है...फिर कहता है, अब ज्यादा दिन मैं भी नहीं बचूंगा। चलते-चलते ऐमन शुक्लजी के बड़े दामाद सरयू राय को अगले दिन कोठी पर बुलाता है। वह मोतिहारी के पुलिस कप्तान के नाम एक पत्रा देता है। उसी पत्रा के आधार पर सरयू राय को पुलिस जमादार की नौकरी मिलती है। उसके सात महीने बाद ऐमन भी इस दुनिया से विदा हो जाता है।
इस शताब्दी वर्ष में अपने भूले नायकों को भी याद करने की जरूरत है, पीछे मुड़कर देखने की भी।


एक गुमनाम साप्ताहिक ‘महावीर’ का सत्याग्रह अंक

  देश की आजादी में पत्रा-पत्रिकाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय के आंदोलन के दस्तावेजीकरण का काम इन पत्रा-पत्रिकाओं ने बखूबी किया। जाने-अनजाने एक तरह से ये पत्रिकाएं ‘इतिहास’ लेखन कर रही थीं। इन्हीं पत्रिकाओं में एक है बिहार से प्रकाशित साप्ताहिक ‘महावीर’। इस पत्रिका के बारे में जो जानकारी मिलती है, वह पर्याप्त नहीं। आधी-अधूरी है। लेकिन इस एक अंक में जो जानकारी मिलती है, वह दुर्लभ है। इस पत्रिका के बारे में पत्राकारिता के इतिहास की पुस्तकें भी सर्वथा मौन है।
  इसका एक विशेषांक ‘सत्याग्रह’ पर आया था। 21 जून, 1931 में यह अंक निकला था। इस अंक के बारे में संपादक ने बहुत ईमानदारी से लिखा है, ‘इन पंक्तियों में उन्हीं घटनाओं का संक्षिप्त विवरण देने का प्रयत्न किया गया है। हम जानते हैं कि सत्याग्रह आंदोलन का ठीक-ठीक वर्णन करने में हजारों हजार पृष्ठों को रंगना पड़ेगा, और आज की अपेक्षा कहीं अधिक खोज ढूंढ और जांच पड़ताल करनी पड़ेगी और उसके लिए तो महान साधनों की आवश्यकता है, जिसका हमारे पास सर्वथा अभाव है। इन्हीं बातों और कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए हम ने इस अंक में सत्याग्रह सिद्धांतों के संक्षिप्त विवेचन के साथ भारतीय सत्याग्रह का थोड़ा वर्णन करते हुए बिहार प्रांत में होने वाली घटनाओं पर अधिक जोर दिया है।’

  अच्छी और लघुपत्रिकाओं के साथ यह दिक्कत आज भी है। उस समय भी थी। साधनों के अभाव और समय पर लेखकों के सहयोग नहीं मिल पाने के बावजूद जो अंक निकला, वह कम महत्वपूर्ण नहीं है। दुर्भाग्य से, ‘महावीर’ का यही ‘सत्याग्रह’ विशेषांक ही उपलब्ध है। डबल डिमाई आकार में यह पत्रिका छपी थी। अंक के मुख्य पृष्ठ पर गांधीजी लाठी लिए हुए सबसे आगे हैं और उनके पीछे सत्याग्रहियों की ‘एस’ आकार में लंबी कतार है। नीचे मध्य में विजय-यात्रा लिखा हुआ है और फिर उसके नीचे सम्पादक का नाम- विश्वनाथ सहाय वर्मा। सबसे उ$पर बाएं संस्थापक श्री जगतनारायण लाल और दाहिने में पंजीयन-नं पी-186।
  सत्याग्रह का यह अंक रांची के संतुलाल पुस्तकालय में ही मिला। हो सकता है, कहीं कोई और पुराने पुस्तकालयों में एकाध फाइलें पड़ी हों, लेकिन ऐसा कम ही जान पड़ता है, क्योंकि बिहार की पत्रा-पत्रिकाओं पर शोधपूर्ण काम करने वाले पं रामजी मिश्र ‘मनोहर’ अपनी शोधपूर्ण कृति ‘बिहार में हिंदी-पत्राकारिता का विकास’ में बस एक पैराग्राफ की ही संक्षिप्त जानकारी ही दे पाते हैं-‘‘सन् 1926-27 में बाबू जगत नारायण लाल ने साप्ताहिक ‘महावीर’ निकाला, जिसके वे स्वयं संपादक भी थे। यह अपने समय का बड़ा ही संदर्भपूर्ण एवं सुसंपादित पत्रा था। जगत बाबू राजनीति से सक्रिय रूप से जुड़े थे, अतः समयाभाव तथा अर्थाभाव के कारण यह मुश्किल से पांच-छह वर्ष ही चल सका। इसके कई महत्वपूर्ण विशेषांक निकले, जिनमें बिहार के राजनीतिक आंदोलन का महत्वपूर्ण छिपा पड़ा है। दुर्भाग्यवश इसकी फाइलें न तो जगत बाबू के परिवार वालों के पास है और न कहीं पुस्तकालयों में ही सुरक्षित हैं।’’  मनोहर जी ने काफी श्रम के साथ काम किया है, लेकिन उन्हें महावीर का कोई अंक सुलभ नहीं हो सका, जबकि यह पटना से ही प्रकाशित होता था।
 इस संक्षिप्त जानकारी से पता चलता है कि इसे संपादक जगत नारायण लाल थे। जगत नारायण लाल के बारे मंे भी बहुत जानकारी नहीं मिलती है। पता चलता है कि ये उत्तर प्रदेश के थे। इनका जन्म उत्तरप्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उनके पिता भगवती प्रसाद वहां स्टेशन मास्टर थे। जगत नारायण ने इलाहाबाद से एम.ए. और कानून की शिक्षा पूरी की और पटना को अपना कार्यक्षेत्रा बनाया। ओम प्रकाश प्रसाद ने ‘बिहार: एक ऐतिहासिक अध्ययन’ में कुछ प्रकाश डाला है। लिखते हैं, जगत नारायण लाल राजेंद्र प्रसाद के कारण स्वतंत्राता संग्राम में शामिल हुए और मालवीय जी के कारण हिंदू महासभा से उनकी निकटता हुई। 1937 के निर्वाचन के बाद लाल बिहार मंत्रिमंडल में सभा सचिव बने। 1940-42 की लंबी जेल यात्राओं के बाद 1957 में वे बिहार सरकार में मंत्राी बनाए गए। सामाजिक क्षेत्रा में काम करने के लिए उन्होंने बिहार सेवा समिति का गठन किया। 1926 में उन्हें अखिल भारतीय हिंदू महासभा का महामंत्राी चुना गया। वे सांप्रदायिक सौहार्द्र के समर्थक थे। छुआछूत का निवारण और महिलाओं के उत्थान के कार्यों में भी उनकी रुचि थी। वे प्रबुद्ध वक्ता और श्रोताओं को घंटों अपनी वाणी से मुग्ध रख सकते थे। अपने समय में बिहार के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में उनका महत्चपूर्ण स्थान था। 1966 में उनका देहांत हुआ।’

 जगत नारायण का लिखा हो सकता है कहीं सुरक्षित हो, लेकिन उनके द्वारा लिखी एक पुस्तक की भूमिका मिलती है। इस पुस्तक के लेखक रांची के गुलाब नारायण तिवारी थे। पुस्तक का नाम है-‘हिंदू जाति के भयंकर संहार अर्थात् छोटानागपुर में ईसाई धर्म्म’। इसे बिहार प्रांतीय हिंदू सभा, पटना ने प्रकाशित किया था। रामेश्वर प्रसाद, श्रीकृष्ण प्रेस, मुरादपुर, पटना से छपी थी। उसमें संक्षिप्त भूमिका उनके नाम से प्रकाशित है।
  मोहम्मद साजिद ने अपनी पुस्तक ‘मुस्लिम पालिटिक्स इन बिहारः चेंचिंग कंटूर’ में जरूर इस पत्रिका के बारे में कुछ पर्याप्त जानकारी दी है। लिखा है, जगत नारायण लाल बिहार में हिंदू सभा और आल इंडिया हिंदू महासभा के जनरल सेक्रेटरी थे। 1926 में महावीर नामक साप्ताहिक पत्र की शुरुआत की। संपादन भी खुद ही करते थे। इसमें सांप्रदयिक लेख काफी प्रमुखता से प्रकाशित होते थे। वे 1922 से 28 तक बिहार कांग्रेस के सहायक सचिव भी रहे। 1930 में पटना जिला कांग्रेस के सचिव रहे। इसी के साथ सेवा समिति से भी जुड़े रहे। इसी साल उन्हांेने हिन्दुस्थान सेवा संघ की स्थापना की। 1934 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। 1937 में मदन मोहन मालवीय की इडीपेंडेंट पार्टी के साथ जुड़े। जगत नारायण लाल ने अपने संस्मरण में लिखा है कि ‘महावीर’ हिंदू विचारधारा का समर्थक पत्रा है। 1926 में यह पत्रा साप्ताहिक शुरू हुआ। 1932 में यह दैनिक हो गया और 1932 में ही सरकारी विरोध के कारण बंद हो गया। लेखक ने लिखा है कि पहले वह ईसाइयों को संकट के तौर पर देख रहे थे। बाद में मुसलमानों के विरोधी हो गए।’ इसके विश्लेषण में अभी जाने की जरूरत नहीं।

 ‘महावीर’ के इस सत्याग्रह अंक में कुल 49 लेख शामिल हैं। अंतिम 49 वां लेख नहीं, बल्कि ‘बिहार के रणबांकुरे’ नाम से पूरे प्रदेश के राजबंदियों की 12 पेज में सूची है। पूरी नहीं। जितनी मिल सकी। संपादक ने इस बारे में पहले ही संपादकीय में आगाह कर दिया, ‘हम अपनी त्राुटियों और साधनाभावों से सजग हैं। जिस थोड़े समय में और प्रतिकूल परिस्थिति में हमें इसका प्रकाशन करना पड़ा, उसे ख्याल कर घबराहट होती है और अपनी उन त्राुटियों के लिए हम पाठकों से क्षमा चाहते हैं। लेखों के चुनाव में भी हमें बहुत से विद्वानों के लेख और कवितायें अपनी इच्छा के विपरीत इसलिए रख छोड़नी पड़ी कि हमारे पास अधिक स्थान ही न था। हम उन सज्जनों से क्षमा चाहते हैं। इसी प्रकार चित्रों के चुनाव में भी कई प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं के चित्रा हमें अभाग्यवश कोशिश करने पर भी नहीं मिल सके, जिसका हमें हार्दिक खेद है और यह अभाव ऐसा है जो हमें सदा खटकता रहेगा और उसके लिये भी हम क्षमा-प्रार्थी हैं। उसी तरह बिहार के राजबंदियों की नामावली भी अधूरी रह गई है। कई जिलों से तो राजबंदियों की सूची मिली ही नहीं, और कई जगहों की लिस्ट आने पर भी वह अधूरी निकली। इस कारण उन त्राुटियों का ख्याल हमें दुःखित कर रहे हैं।’

 अंक के विषय सूची से कुछ अनुमान लगा सकते हैं। सबसे पहले भारतीय नेताओं के दिव्य संदेश है। उस समय के बड़े नेताओं के संदेश प्रकाशित हैं। महात्मा गांधी के तीन लेख कष्ट सहन का नियम, स्वराज्य का एक लक्षण एवं अहिंसा है। बाबू राजेंद्र प्रसाद का सत्य और सत्याग्रह नामक लेख है। श्री प्रकाश का सत्याग्रह का खतरा, जगत नारायण लाल की राजबंदी जीवन व सत्याग्रह की मीमांसा के साथ स्वामी सहजानंद सरस्वती का लेख सत्याग्रह की कमजोरियां और उनके नेवारण के उपाय आदि शामिल हैं। कविताओं में श्री अरविंद का माता का संदेश, रामधारी सिंह दिनकर की कविता भव, बेगूसराय गोली कांड-श्री कपिलदेव नारायण सिंह सुहृद, बिस्मिल इलाहाबादी की फरियादे बिस्मिल आदि कविताएं प्रकाशित हैं। इसके अलावा सत्याग्रह और महिलाएं, बिहार में सत्याग्रह, बिहार में चौकीदारी कर बंदी, बिहार के शहीद आदि दुर्लभ, जानकारीपरक और महत्वपूर्ण लेख हैं। सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि जिलों के सत्याग्रह की रिपोर्ट है। तब झारखंड भी बिहार का हिस्सा था। कुछ जिलों की रिपोर्ट प्रकाशित है- सारन में सत्याग्रह, मुजफपुर में सत्याग्रह, चम्पारण में सत्याग्रह, दरभंगा में सत्याग्रह, शाहाबाद में सत्याग्रह, भागलपुर में सत्याग्रह, प्रांत के कुल जेलयात्राी, बीहपुर सत्याग्रह, मुंगेर के सत्याग्रह, पटना नगर में सत्याग्रह, पटना जिला में सत्याग्रह, गया में सत्याग्रह, पूर्णिया में सत्याग्रह, रांची में सत्याग्रह, तमिलनाडु में सत्याग्रह आदि। इन लेखों में सत्याग्रह के बारे में संक्षिप्त जानकारी है और किनके नेतृत्व में सत्याग्रह हुए, किन-किन लोगों ने भाग लिया, इसकी भी जानकारी दी गई है। उस समय के कई महत्वपूर्ण लेखकों ने इस अंक में योगदान दिया। प्रांत के कुल जेलयात्राी के अलावा बिहार के वीर बांकुडे़ 12 पेज में दिया गया है। इसमें वृहद बिहार के जिलों के सत्याग्रह और राजबंदियों की सूची है। यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए, महावीर के इस अंक का महत्व बढ़ जाता है। इसके अलावा इसमें उस समय के कई बड़े नेताओं की तस्वीरें भी हैं। डॉ मोख्तार अहमद अंसारी, डॉ सैयद महमूद, अब्दुल गफार खान, पुरुलिया के जिमूत वाहन सेन, हजारीबाग की सरस्वती देवी एवं मीरा देवी, प्रो अब्दुल बारी, जेएम सेनगुप्ता के साथ जगत नारायण लाल एवं उनकी पत्नी की भी। उस समय के प्रमुख सत्याग्रहियों की तस्वीरें, जो सुलभ हो सकीं, दी गई हैं।    


  रामवृक्ष बेनीपुरी अपने संस्मरण ‘पत्राकार जीवन के पैंतीस वर्ष’ में दो पंक्तियों में पत्रिका के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी है-‘‘बाबू जगतनारायण लाल ने महावीर नाम का साप्ताहिक पत्रा निकाला था, जिसके संपादकीय विभाग में श्री विश्वनाथ सहाय और राधाकृष्ण सुप्रसिद्ध कहानी लेखक-रांची थे। यह हिंदू संगठन का हिमायती था।’’ कहा जाता है कि रांची के रहने वाले राधाकृष्ण ने एक तरह से पत्राकारिता जीवन की शुरुआत इसी पत्रिका से की। फिर कहानी लेखन की ओर मुड़ गए। कहानी के साथ-साथ व्यंग्य भी लिखा। प्रेमचंद के निकट हुए। उनके निधन पर कुछ दिनों तक हंस भी संभाला। फिल्म लेखन भी किया। फिर रांची में ‘आदिवासी’ पत्रिका का संपादन किया। ‘महावीर’ के बारे में कुल जमा यही जानकारी मिलती है। इसके अंकों की खोज होनी चाहिए।  

मंगलवार, 16 मई 2017

रांची के पागलखाने में कभी मजाज और काजी साथ साथ थे भर्ती

रांची का पागलखाना (अब केंद्रीय मनश्चिकित्सा संस्थान) आज सौवें साल में प्रवेश कर गया। प्रथम विश्वयुद्ध के समय ब्रिटिश सेना में बढ़ते पागलों की संख्या को ध्यान में रखकर रांची में पागलखाना खोला गया।
हालांकि बांबे में देश का पहला पागलखाना 1745 में खोला गया। इसके बाद 1784 में कलकत्ता में। औपनिवेशिक काल की ऐसी क्या नीतियां रहीं कि लगातार पागलखाना खोले जा रहे थे। आजादी से पहले तक देश में 31 मेंटल हास्पिटल खुल गए थे। मानवाधिकार की रिपोर्ट बताती है कि 1999 तक इनकी संख्या 59 हो चुकी थी।
लेकिन कांके की बात ही कुछ और है। यहां का तापमान रांची से हमेशा एक-दो डिग्री सेल्सियस कम ही रहता है। इसलिए, यहां के मौसम को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने पागलखाना खोलने का निश्चय किया। इस तरह, 17 मई, 1918 को इसका विधिवत उद्घाटन हो गया।

दो सौ दस एकड़ में फैले इस पागलखाने में आजादी से पहले तक इसमें केवल यूरोपीय मरीजों का ही इलाज होता था। देश आजाद हो गया तो यह पाबंदी स्वत: ही खत्म हो गई और भारतीय मरीजों का इलाज शुरू हो गया। अपनी खास चिकित्सा पद्धति के कारण देश में यह अग्रणी संस्थान रहा। 1919 में यह एशिया का सबसे बेहतरीन संस्थानों में शुमार हो गया। 1922 तक इसे यूरोपियन लूनटिक असाइलम (यूरोपियन पागलखाना)के नाम से जाना जाता था। इसके बाद यूरोपियन मेंटल हास्पीटल हुआ। इसी साल यूनिवर्सिटी आफ लंदन से संबंद्ध हुआ और यहां पढऩे वाले छात्रों को प्रमाण पत्र लंदन से ही मिलता था। देश की आजादी के बाद इसका नाम बदल गया और इंटर प्रोविंसिया मेंटल हास्पिटल हो गया और सभी भारतीयों के लिए यह अस्पताल खुल गया।  
इस संस्थान को यह श्रेय जाता है कि यहां देश में सबसे पहले आक्यूपेशनल थेरेपी विभाग 1922 में खुला। 1943 में इसीटी खुला। 1947 में साइकोसर्जरी एंड न्यूरोसर्जरी खुला। 1948 में क्लीनिकल साइकोलाजी एंड इलेक्ट्रोनसाइकोग्राफी विभाग खुला। 1952 में न्यूरोपैथालॉजी भी यहां खुल गया। यहां और भी बहुत कुछ है। 1948 में देश में पहली बार यहां सइको सर्जरी हुआ। यह ऐसा अस्पताल है, जहां मरीजों को बंद करके नहीं रखा जाता है। यहां खुले में भी मरीज घूमते रहते हैं।

सप्ताह में चार दिन होता था गीत-संगीत 
1925 की वार्षिक रिपोर्ट बताती है, यहां के पागल नाटक करते थे। गीत-संगीत में भाग लेते थे। सप्ताह में चार दिन पुरुष मरीज कार्यक्रम पेश करते थे और सप्ताह में दो दिन महिला मरीज। कार्यक्रम देखने के लिए मरीज काफी उत्सुकता से प्रतीक्षा करते थे।

फुटबॉल व हॉकी भी खेलते थे
यहां मरीज स्टाफ के साथ फुटबॉल, हॉकी, बैडमिंटन से लेकर शतरंज भी खेलते थे। इलाज का यह भी एक हिस्सा था। जो जिस खेल में रुचि लेता था, उसे वह सुविधा प्रदान की जाती थी। 1925-29 के बीच यहां के पागलों ने रांची के सभी खेल क्लबों को हराकर फुटबाल और हॉकी के सारे टूर्नामेंट मैच जीत लिए थे।

बाजार भी करते थे
यही नहीं, यहां के मरीज रांची बाजार भी मोटर से जाते थे। जरूरत की चीजें खरीदकर लाते थे। पिकनिक मनाने जाया करते और सर्कस-जादू, थिएटर का आनंद लेते थे।

अखबार भी खूब पढ़ते थे
यहां पर हिंदी, अंग्रेजी, ओडिय़ा, बांग्ला आदि भाषाओं में 10 से ज्यादा अखबार आता था, जिसे बड़े चाव से ये पढ़ते थे। स्टेट्मेन, अमृतबाजार पत्रिका, बंगाली, सर्चलाइट आदि समाचार पत्र आते थे। चूंकि ब्रह्मपुर, ढाका, पटना के मेंटल अस्पताल में लाइब्रेरी नहीं थी। कुछ पुस्तकों को मेजर बीसी चक्रवर्ती ने ब्रह्मपुर को पुस्तकें भेंट की थी। यही नहीं, 1940 में सिर्फ एक साल के दौरान हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला की 58 फिल्में देख डाली थीं, वह भी मुफ्त में।

मजाज का भी हुआ था इलाज
उर्दू के मशहूर शायर मजाज का भी इलाज रांची के पागलखाने (केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान है) में हुआ। 11 मई, 1952 में उन्हें यहां भर्ती कराया गया था। नवंबर तक यहां वे रहे। रांची में मजाज की देखभाल सुहैल और अपने जमाने के मशहूर कथाकार राधाकृष्ण करते थे। रांची में जब भर्ती हुए तब उन्हें तीसरा और अंतिम नरवस ब्रेक डाउन का हमला हुआ था। तीन साल बाद उनका निधन हो गया।

काजी भी 1952 में यहां थे भर्ती
मई के महीने में ही 1952 के उसी साल में बांग्ला के मशहूर विद्रोही कवि काजी नजरूल इस्लाम भी इलाज के लिए यहां भर्ती हुए थे। कहते हैं, मजाज और काजी मिलते भी थे। काजी की तो आवाज की चली गई थी। उन मुलाकातों का अनुभव ही कर सकते थे। काजी को बाद में लंदन और फिर बियना ले जाया गया, लेकिन में अंत तक ठीक नहीं हो सके।




शनिवार, 29 अप्रैल 2017

स्वामी सहजानंद सरस्वती और झारखंड के किसान


जब आप अफ्रीका या एशिया के कुछ हिस्सों में गरीबी, भूख से बिलखते बच्चों और कुपोषण को देखते हैं, उस समय हमें खुद को भी देखना चाहिए, जो बेहद आरामदायक जिंदगी जी रहे हैं। मुझे लगता है कि हमें सिर्फ सामग्री देकर उनकी मदद नहीं करनी चाहिए। हम जिस समुदाय में रहते हैं, उसको समृद्ध बनाना चाहिए।’                                                                                              -रतन टाटा

यह उद्गार रतन टाटा ने न्यूयार्क में 27 जून, 2012 को व्यक्त किया। उन्हें परोपकार के लिए रॉकफेलर फांउडेशन ने लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया। सम्मानित किए जाने पर यह सद्विचार उनके श्रीमुख से निकला। उन्होंने यह भी कहा कि ‘जिस जगह वह कारोबार चला रहे हैं, उसके विकास की जिम्मेदारी उन्हें ही संभालनी होगी। उद्योगों को समाज को समृद्ध बनाने के कदम उठाने चाहिए। बताया कि विकासशील देशों में आर्थिक विषमता बहुत ज्यादा है। अगर उद्योग जगत इसे लेकर संवेदनशील नहीं बना तो उस क्षेत्रा का विकास संभव नहीं हो पाएगा, जहां वे कारोबार करना चाहते हैं।’

टाटा के इस नेक विचार को उनके कामों से देखना चाहिए। यहां हम झारखंड की चर्चा करेंगे, जहां उनका विशाल संयंत्रा है, जिसे आज उस शहर को उनके पिता जमशेदपुर के नाम से जाना जाता है। यहां पर 1908 में जमीन का अधिग्रहण किया गया था। जमीन अधिग्रहण के लिए छोटानागपुर टीनेंसी एक्ट को पांच साल तक ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था ताकि टाटा को जमीन अधिग्रहण के लिए कानूनी पचड़ों में न उलझना पड़े। सौ साल से उपर इस कंपनी ने क्षेत्रा का कितना विकास किया, इसकी चर्चा यहां फिजूल है।

   लेकिन कुछ बातें सहजानंद सरस्वती के मार्फत करेंगे और इसी के बहाने झारखंड के किसानों की चर्चा भी कि आज झारखंड के किसान किस हाल में जी रहे हैं। स्वामी सहजानंद सरस्वती 29 अप्रैल 1940 से लेकर 8 मार्च 1942 तक हजारीबाग सेंटल जेल में बंद थे। यहीं पर उन्होंने झारखंड के किसान नामक पुस्तक लिखी। जेल में ऐसे कई किसान थे, जो अपनी सिधाई के चलते सजा भुगत रहे थे। सहजानंद उनसे बार-बार मिलते, बातें करते, उनकी समस्याओं को समझने की कोशिश करते। ऐसी स्थिति में उनका ध्यान झारखंड की किसान समस्या की ओर गया। स्वामी जी ने झारखंड को किताबों के जरिए नहीं, अपनी आंखों से देखा-पढ़ा। कारावास की सजा से पहले वे झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर चुके थे। कई किसान सभाओं को वे संबोधित कर चुके थे। किसानों की समस्याओं को नजदीक से देखा। 3-4 जुलाई, 1939 को
घाटशिला में संपन्न सिंहभूम जिला का किसान सम्मेलन के अध्यक्ष पद से उन्होंने किसानों की अनेक समस्याओं पर रोशनी डाली थी। राज्य के सबसे पिछड़े इलाके, अब नक्सल प्रभावित पलामू का दौरा दिसंबर, 1939 में किया था। महुआडाड़, जो अब लातेहार जिले का हिस्सा बन गया है, में सभा को संबोधित किया था। यहां उनको झारखंडी किसानों की समस्याओं के साथ उनकी जीवंत और उत्कृष्ट संस्कृति को भी देखा। सभा के बाद आधी रात को जब उनकी नींद टूटी तो ‘मांदर-बांसुरी की ध्वनि के साथ गाने की तान सुनी। बाहर निकलकर देखा तो जगह-जगह स्त्रा पुरुष अर्धवृाकार होकर नाच रहे थे। कितने ही गरोहों में एक दल स्त्रियों का और दूसरा दल पुरुषों का आमने-सामने खड़ा चक्कर देता नाचता-गाता है। ऐसी सुंदर चीज को क्या कहा जाए! नाच-गाने के साथ व्यायाम और परिश्रम कितना सुंदर! नजदीक से देखा! स्त्रा-पुरुषों की होड़ भी खूब थी।’ दिसंबर का महीना, पहाड़ की ठंड, नीचे पथरीली जमीन, पर खुला आसमान, तन पर साबूत कपड़े नहीं, मगर वह सारी रात किसानों ने नाचते-गाते बिता दी। स्वामी सहजानंद यह सब देख अभिभूत थे। स्वामी जी लिखते हैं, वह स्वर्गीय दृश्य मैं भूल नहीं सकता।

  आदिवासी समाज का यह विद्रूप सच है। उन्होंने तमाम दुख-तकलीफों को सहते हुए, अपनी अमूल्य सांस्कृतिक विरासत, अटूट परंपरा एवं लोकाचार की निधि को बचाकर-संजोकर रखा है। उनकी धरती के नीचे सोना, कोयला, अभ्रक, हीरा, यूरेनियम न जाने कितने अनमोल खजाने हैं, लेकिन ये इनके जीवन में खुशहाली नहीं ला सके। लाया तो गरीबी, विस्थापन, पलायन, शोषण का अंतहीन सिलसिला। जमीन की लड़ाई पहले भी थी और आज भी कायम है। झारखंड के दुरुह इलाकां में, पहाड़ों पर, पहाड़ के शिखरों पर जैसे-जैसे प्राचीन जनजातियां आती गईं, बसती गईं, वैसे-वैसे इनका आपस में संघर्ष भी बढ़ता गया। राज्य में 32 जनजातियां हैं। इनमें पांच आदिम जनजाति की श्रेणी में आते हैं। सबकी अपनी-अपनी संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज है, जिसे ये जीते हैं। एक बात सब आदिवासियों में कॉमन है, वह है इनका प्रकृति के साथ तादात्म्य और साहचर्य। जमीन इनके लिए मां है। जंगलों को साफ करके इन्होंने खेती लायक जमीन बनाई। सामूहिकता इनकी जातीय विशेश्षता है। यहां कोई बड़ा नहीं, छोटा नहीं। न राजा न रंक। सब समान। इनके अपने पुजारी, पाहन, राजा भी हैं, लेकिन सब खेती पर निर्भर। मैदानी इलाकां की तरह इनका कोई राजमहल नहीं होता, जहां राजा अपने दरबारियों के साथ रहता है। यहां सब बराबर हैं। अखड़ा में सभी नाचते हैं। स्त्रा-पुरुष में कोई भेद नहीं। अपने में ही सिमटे-सिकुड़े और मस्त। लेकिन जैसे-जैसे बाहरी लोगों का इन इलाकों में प्रवेश होता गया, इनकी जिंदगी में दखलंदाजी भी बढ़ने लगी। पहले भारत के दूसरे हिस्से से लोग आए इसके बाद अंग्रेज। फिर शुरू हुआ जल, जंगल, जमीन बचाने को लेकर आंदोलन। देश-दुनिया में चलने वाला सबसे लंबा
संघर्ष। 18 वीं शताब्दी से जो आंदोलन शुरू हुआ, वह आज तक किसी न किसी प्रकार से, किसी न किसी बहाने जारी है। बिना इनके इतिहास को देखे-समझे आप इनकी संघर्षशील मन को नहीं समझ सकते। ये जितने भोले हैं उतने ही क्रांतिकारी और लड़ाकू भी। सहज-सरल भी उतने ही। संस्कृति-प्रकृति से लगाव कोई इनसे सीख सकता है कि आधी रोटी खाकर भी ये अपनी इंसानियत नहीं भूलते। लेकिन ये अपने हक के लिए अपनी जान की परवाह भी नहीं करते।
                               
                                                                        ।। 2।।  

  स्वामी सहजानंद के कदम बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में झारखंड की धरती पर पड़े, लेकिन जमीन की लड़ाई और पीछे से जारी है। कुमार सुरेश सिंह ने ‘बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन’ में लिखा है कि 18 वीं शताब्दी के उारार्द्ध में जनजातीय क्षेत्रों में बाहरी लोग भारी संख्या में पहुंचने लगे थे। व्यापारी के अलावा इनमें किसान भी थे, जिन्हें जमीन की बेइंतहा भूख थी और जिनके खेती करने के तरीके बेहतर थे। यही वह समय था जब ब्रिटिश सत्ता भी जनजातीय क्षेत्रों में अपने पांव जमा रही थी और जिसका विरोध जनजातीय या आदिवासी शुरू कर चुके थे। हालांकि यह भी सच है कि अंग्रेजों के शासन काल से पहले ही भूमि को लेकर अशांति के बीज बो दिए गए थे। यह सब मध्ययुग में सामंती व्यवस्था के प्रभाववश हुआ था। मुंडाओं की परंरागत भूमि व्यवस्था को नष्ट करने में बाहरी तत्वों का हाथ था-इनमें राजा और उनका परिवार-संबंधी, जागीरदार व जमींदार, ब्रिटिश शासक व स्थानीय छोटे अफसर। 1874 तक आते-आते हालत इस कदर बिगड़ चुके थे कि पुराने मुंडा और उरांव सरदारों का प्रभाव समाप्त हो चुका था। इनके स्थान पर प्रभावशाली हो जाने वाले गैरआदिवासी किसान थे, जिन पर बड़े जमींदारों का वरदहस्त था। जमींदार-जागीदार और प्रभावशाली तबके ने अंग्रेजों से मिलकर आदिवासियों पर अत्याचार शुरू किए। शोषण के नए-नए तरीके अख्तियार किए। मैदानी इलाकां से आए ये दिकू वही शासन-पद्धति और अत्याचार शुरू किए। लेकिन इनके अत्याचार सहने की भी एक सीमा थी। झारखंड तब और आज भी मोटे तौर पर दो भागों में बंटा है। एक छोटानागपुर और दूसरा संताल परगना। समस्याएं दोनों क्षेत्रों में व्याप्त थीं। शोषण दोनां जगहों पर जारी था। आखिरकार किसी से भी न दबने व सहने वाले आदिवासियों ने 1789 में विद्रोह कर दिया, जिसका सामना अंगरेजों को करना पड़ा। यह छह साल तक चला। यह विद्रोह रांची जिले के तमाड़ क्षेत्रा से शुरू हुआ और पूरे कोल्हान में फैल गया। नतीजतन तमाड़ में पुलिस थाना स्थापित किया गया और थानेदार नियुक्त किए गए और आदिवासी मुंडा, हो और उरांव क्षेत्रा को राजा के अंतर्गत लाया गया। फिर भी आदिवासियों का जो ग्राम संगठन या अपनी शासन पद्धति थी, भूमि व्यवस्था के मामले में कोई समर्पण नहीं किया और बंगाल रेगुलेशन संख्या 20 सन् 1793 एवं रेगुलेशन संख्या 18 सन् 1805 के प्रावधान उनको डिगा नहीं सके। नतीजा, संघर्ष कभी विराम नहीं लिया। अंग्रेजों को जल्द ही समझ में आ गया कि आदिवासियों की अस्मिता और उनके व्यक्तिगत या समुदायगत अधिकार एवं रीति-रिवाज से छेड़खानी न कर, उनके इन अधिकारां एवं व्यवस्था की रक्षा कर ही इस भूभाग पैर जमाया जा सकता है। अंततः 1837 में कैप्टन विल्किंसन ने कोल्हान क्षेत्रा में रहने वाले लोगां के लिए नियम बनाए जो कुछ हद तक सर्वमान्य रहे और आदिवासियों को शांत रख सके। यह बिल्किंसन रूल आज भी अपनी अहमियत रखता है और कानूनी रूप में वैध है।
 
                                                                             ।।3।।

   इतिहास की मुख्यधारा में 1857 के विद्रोह को प्रथम स्वतंत्राता संग्राम कहा गया है। लेकिन झारखंड में इसके दो साल पहले, 1855 में ही संताल परगना में अंग्रेजों के खिलाफ हूल विद्रोह हुआ था। यह विद्रोह भी, जल, जंगल, जमीन पर अपने अधिकार को लेकर आदिवासियों ने छेड़ा था। इस विद्रोह में काफी संख्या में आदिवासी मारे गए। इस विद्रोह में हर जाति ने आदिवासियों की मदद की। क्षणिक हार आदिवासियों की जरूर हुई, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अंततः अंग्रेजों ने संताल परगना अधिनियम 1855 बनाया। इसी तरह छोटानागपुर में बिरसा मुंडा ने 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में आंदेलन 1872-1901 छेड़ा। लंबा संघर्ष चला। बिरसा मुंडा मुखबिरी के शिकार हुए और पुलिस ने उन्हें गिरतारी कर लिया और रांची जेल में उनकी मृत्यु हुई। बिरसा तब तक धरती आबा बन चुके थे। उनकी शहादत बेकार नहीं गई। अंग्रेजों को अंततः आदिवासियों के साथ समझौता करना पड़ा और उन्हांने छोटानागपुर टीनेंसी एक्ट बनाया। यह कानून तो 1903 में ही बन गया, लेकिन इसे लागू 1908 में किया गया। पांच साल तक इसे ठंडे बस्ते में इस लिए रखा गया ताकि टाटा कंपनी को जमीन लेने में कोई परेशानी न हो। टाटा ने जमीन अधिग्रण कर लिया। जमशेदपुर में उसने अपना विशाल संयंत्रा स्थापित किया। टाटा ने कितना विकास अपने क्षेत्रा का किया, इसे सहजानंद सरस्वती ने भी विस्तार से लिखा है। जिस पर आगे बात की जाएगी। टाटा पर बात करने से पहले यह सवाल भी मौजू है कि जब आदिवासियों के लिए तीन कानून बन गए इसके बाद भी इनकी जमीन अधिग्रहण क्यां होती रही? पलायन क्यों होता रहा? विकास के नाम पर विस्थापन क्यों होता रहा? और, आज भी इनकी जमीनें कैसे बिक रही हैं? यह एक लंबी और अंतहीन बहस है। कानून इनकी रखवाली नहीं कर सका। क्योंकि ये कानून के पचड़े नहीं जानते। इनके भोलेपन का फायदा कानून के रखवाले, दलालां, अफसरों ने उठाया। लंबे संघर्ष के बाद 2006 में वनाधिकार कानून आया। लेकिन आज तक झारखंड की सरकार या वन विभाग के अफसर इसे सही ढंग से लागू नहीं कर रहे है। 35 साल बाद पंचायत चुनाव हुए। आठ महीने से पंचायतों को उनके अधिकार नहीं सौपे गए। राज्य पेसा के अंतर्गत आता है। यहां पांचवीं अनुसूची लागू है, लेकिन कोई भी कानून इनकी सुरक्षा नहीं कर सका न कर रहा है। जमीन और जंगल इनकी आजीविका के मुख्य स्रोत हैं। पर, दोनों से इन्हें बेदखल करने का कोई मौका संबंधित अधिकारी-जमीन दलाल नहीं छोड़ते।
    स्वामी सहजानंद सरस्वती ने जंगलों पर आदिवासियों के अधिकार और जमींदारों द्वारा वंचित और शोषित किए जाने का हवाला दिया है। झारखंड की लड़ाई और फ्रांस की लड़ाई में कोई अंतर नहीं। स्वामी जी ने फ्रांस के पाल लाफार्ग की किताब ‘संपत्ति का विकास’ से एक लंबा उद्धरण दिया है, उसका एक अंश पेशे खिदमत है-‘ अधिक निर्दयता के साथ जंगलों को हथिया लिया गया। कानूनी बातों को ताक पर रखके जमींदारों ने जंगलों और झाड़ियों पर अपना अधिकार जमा लिया। उनने जंगलों को घेर दिया रिजर्व और प्रोटेक्टेड बना लिया, उनने औरों का शिकार खेलना रोक दिया और घर गिरस्ती के लिए काठबांस वगैरह लेना खत्म कर दिया, जिससे ईंधन तथा घर, घेरा, औजारों की मरम्मत वगैरह के लिए कुछ भी जंगल से नहीं लिया जा सकता था। जो जंगल बराबर गांवों की सार्वजनिक संपत्ति थे, उन्हें इस तरह जमींदारां द्वारा हथियाए जाने का नतीजा यह हुआ कि किसानों के भयंकर विद्रोह होने लगे।’ ठीक यही स्थिति झारखंड में अंग्रेजी काल के दौरान भी रही। जमीन और जंगल को लेकर पूरे झारखंड में हूल होते रहे। आजादी मिली तो लगा कि आदिवासियों के दिन सुधरेंगे, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। बाहरी लोगों का यह आंतरिक उपनिवेश बना रहा। 2000 में यह राज्य अलग हुआ तो फिर एक बार उम्मीद जगी, लेकिन यह उम्मीद भी 12 साल से दम तोड़ रही है। जब से राज्य बना है, आदिवसी ही राज्य का  मुखिया रहा और है। पर आदिवासियों की किस्मत नहीं बदली। जो स्थिति आजादी से पहले थी, वही आज भी है। जमीन की लड़ाई आज भी जारी है। विकास के नाम पर। उद्योग स्थापित करने के नाम पर। आदिवासियों की बेहतरी के नाम पर। आज पूरे राज्य में जगह-जगह जमीन को लेकर संघर्ष चल रहे हैं। सौ से पर राज्य की सरकार ने कंपनियों के साथ एमओयू किए हैं। सबको जमीन चाहिए, पानी चाहिए। आधारभूत संरचना चाहिए। जमीन कोई रबर तो है नहीं उसे फैला देंगे। किसान अपनी उपजा जमीन देना नहीं चाहते। कंपनियां कहीं-कहीं दलालों के माध्यम से जमीनें खरीद रही हैं, जिसका विरोध किया जा रहा है। राज्य की पुलिस किसानों की नहीं, कंपनियों के साथ खड़ी है, जिसके कारण तनाव, कहीं-कहीं संघर्ष का रूप ले ले रहा है। इसे राज्य की सरकार समझने की कोशिश कतई नहीं कर रही है। दुर्भाग्य यह है कि राज्य में सौ साल से जो सरकारी-गैर सरकारी कंपनियां काम कर रही हैं, उन्हांने राज्य और यहां के लोगों का कितना विकास किया है? इसका कोई आकलन नहीं किया? कितनी जमीनें बंजर हुईं, कितनी नदियां बेपानी और प्रदूषित हो गई, इस पर सरकार आंख मूंदे हैं। जबकि यहां की सभी नदियां और यहां तक कि जो लाइफ लाइन नदियां हैं, स्वर्णरेखा-दामोदर वे आज दम तोड़ रही हैं। इन्हें बचाने की कवायद स्वयं सेवी संगठन अपने स्तर से कर रहे हैं। यहां अब तो जो भी विकास हुआ, उसने बड़े पैमाने पर विस्थापन और पलायन को जन्म दिया।    
    राज्य में विकास के नाम पर क्या चल रहा है, इसे एक दो उदाहरण से समझने का प्रयास करेंगे। रांची के पास कांके ब्लाक के नगड़ी गांव के ग्रामीणों की जमीन 1957-58 में कृषि विवि के विस्तार के लिए अधिग्रहित की गई थी। ऐसा सरकार का कहना है। ग्रामीण कहते हैं, उस समय इसका विरोध किया गया था, जिसके कारण सरकार ने मुआवजा राशि कोषागार में जमा करा दिया। अब सरकार उस 227 एकड़ भूमि पर, जिस पर वह दावा कर रही है, बिना किसी नई अधिसूचना के वहां विधि विश्वविद्यालय, केंद्रीय विश्वविद्यालय, आइआइएम एवं टीपल आइटी खोलने का निर्णय लिया। इस साल के जनवरी में सुरक्षाबलों की मौजूदगी में जमीन की चहारदीवारी का निर्माण शुरू कर दिया गया। जनवरी में किसानों ने जो फसल-सब्जियां लगाई थीं, उसे रौंद दिया गया। ग्रामीण में रात में चहारदीवार को गिरा देते। मामला हाईकोर्ट में गया। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की और सुरक्षा बलों की संख्या काफी बढ़ा दी गई। ग्रामीण गोलबंद हुए और खेत में ही धरना देना शुरू कर दिया। करीब चार महीना तपती धूप में भी ग्रामीण किसान शांतिपूर्ण धरना देते रहे। इसके बाद एक विशाल रैली निकाली गई। आदिवासी अपने पारंपरिक हथियारों से लैस राजधानी में रैली निकाली। 24 जून को किसानों ने अपने खेत पर हल चला दिया। पुलिस से काफी नोकझोंक हुई। संघर्ष तेज हुआ। चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया, जो अभी जेल में बंद है। किसानों का कहना है कि वे 1957 से जमीन की रसीद कटवाते आ रहे हैं। सरकार ने भू राजस्व मंत्रा मथुरा महतो के नेतृत्व में एक जांच कमेटी भी बना दी है। मथुरा शिबू सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा से हैं। राज्य में गठबंधन की सरकार है। मोर्चा के मुखिया शिबू सोरेन भी15 जुलाई को नगड़ी गांव पहुंचे और भरी सभा में जमीन पर हल चलाओ। उन्होंने आदिवासी-मूलवासी को एकजुट रहने की सलाह भी दी। यह आंदोलन अब व्यापक हो गया है। इसमें 35 गांव के किसान भी शामिल हो गए हैं, जिनकी जमीन ग्रेटर रांची के प्रस्तावित है। भाजपा, आजसू, वामदल व अन्य भी नगड़ी के किसानों के साथ खड़े हो गए हैं। कई बार सरकार के प्रतिनिधियों एवं ग्रामीणों के बीच बैठकें हुई, लेकिन नतीजा सिफर रहा। ग्रामीणों ने एक सुर में कहा, जमीन नहीं देंगे। इस आंदोलन में भाकपा माले के एकलौते विधायक विनोद सिंह के अलावा विधायक बंधु तिर्की व अरुप चटर्जी शुरू से साथ खड़े हैं। वाम दल के अन्य घटक सीपीएम और सीपीआई भी  किसानों के पक्ष में रैलियां निकालें। 16 जुलाई को हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए फिर सरकार को फटकारा, नगड़ी में कानून का राज चलेगा या सड़क का। हालांकि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पदेन विधि विश्वविद्यालय के चांसलर होते हैं। वे ही इस केस की सुनवाई कर रहे हैं। पार्टियां और अन्य सामाजिक कार्यकर्ता राज्यपाल से भी हस्तक्षेप की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन राज्यपाल ने अपनी चुप्पी अभी नहीं तोड़ी है। चूंकि राज्य 5वीं अनुसूची में आता है, इसलिए राज्यपाल को यहां असीमित अधिकार मिले हुए हैं। वह संसद व विधानमंडल के कानून को भी यहां के परिप्रेक्ष्य में बदल सकता अथवा उसे लागू नहीं कर सकता। यहां वह अपने विवेक से आदिवासियों के पक्ष में फैसला ले सकता है। किसानों का कहना है कि यह जमीन तीन फसली है और इस पर पांच हजार आबादी निर्भर है। खेत छिन जाएगा तो हम कहां जाएंगे। इस सवाल का जवाब कोर्ट के पास भी नहीं है।  
   इसी तरह रांची से सटे सोनाहातू में भी किसानों ने भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। यहां जिंदल और बिड़ला कंपनी का संयंत्रा स्थापित होना है। यहां पर किसानों की लड़ाई सीपीएम लड़ रही है। पोलित ब्यूरो की सदस्य व झारखंड प्रभारी वृंदा करात यहां पर सभाएं कर चुकी हैं। खूंटी में मित्तल कंपनी का बड़ा प्लांट लगना था, किसानों के विरोध के चलते अभी स्थगित है। अभ्रक के लिए ख्यात कोडरमा के जयनगर प्रखंड के पपरांव गांव में 20 जून को जनसुनवाई के दौरान किसानां ने कहा, जान देंगे पर जमीन नहीं। यहां पर रिलायंस पावर के चार हजार मेगावाट क्षमता प्लांट के लिए जमीन का अधिग्रहण होना है। 20 जून को उपायुक्त समेत कई अधिकारी पहुंचे, लेकिन आक्रोशित  किसानों ने कहा कि कृषि योग्य जमीन हम नहीं देंगे। ग्रामीणों का कहना है कि कोडरमा थर्मल पावर स्टेशन के लिए बगल के गांव के लोगों का जमीन अधिग्रहण किए जाने के बाद उनका हश्र देख चुके हैं। इसलिए, उन्हें ऐसा विकास नहीं चाहिए। इस संयंत्रा के लिए 971 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जाना है, इसमें करीब 283 एकड़ जमीन रैयती है। इय तरह देखें तो पूरे राज्य में जमीन को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। यहां के किसान पिछले पचास साल से विकास को देखते आ रहे हैं। बड़ी-बड़ी कंपनियां स्थापित हुईं, उद्योग लगे, लेकिन उनकी जमीन गई और वे बेघर हो गए। पिछले सौ सालों में लाखों लोग विस्थापित हो गए। विकास का रट लगाए लोगों से यहां के किसान पूछते हैं, जिनकी जमीने गईं  वे तो कुली बन गए, आज हम अपनी जमीनें दे दें तो हमारा क्या हश्र होगा, मालूम है। जमीन है तो पेट में दो रोटी तो जाता है। विकास के नाम पर सरकार दो रोटी में छिन लेना चाहती है।          खैर, राज्य में किसान अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे हैं। राज्य भर के आंदोलन को एकसूत्रा में पिरोने के लिए कोई केंद्रीय नेतृत्व नहीं उभर पाया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोई किसान नेता उभर कर नहीं आया है। आंदोलनों की इस भूमि में जिसकी सख्त जरूरत है।
       
                                                                      ।।4।।
 
   स्वामी सहजानंद सरस्वती ने अपने समय में भी इस कमी को महसूस किया था। यह कमी आज भी बरकरार है। यही हाल उनके जंगल को लेकर भी है। वन अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद भी आदिवासियों को उनका अधिकार नहीं दिया जा रहा। वन विभाग आज भी लोगों को जंगल से लकड़ी काटने के एवज मेंं जेल भेज देता है। स्वामी सहजानंद सरस्वती ने ‘जंगल की तकलीफें’ में इसका विस्तार से जिक्र किया है। तब कानून नहीं था। आज कानून है, लेकिन कानून को सही ढंग से लागू नहीं किया जा रहा। वन विभाग जंगल से अपनी जमींदारी छोड़ना नहीं चाहता। अधिकार के बावजूद वे जंगल से जलावन नहीं ले सकते, घर-घेरा बनाने के लिए लकड़ी नहीं काट सकते। लेकिन जंगल माफियाओं के लिए छूट है। पूरा सारंडा, जो एशिया में साल वृक्ष के लिए सबसे घना जंगल जाना जाता था, जहां दोपहर बाद थोड़ी-थोड़ी सूरज की रोशनियां जमीन पर गिरती थीं, नंगा हो गया। वन अधिकारियों और जंगल माफियाओं की मिलीभगत से राज्य के दूसरे जंगल भी खत्म होते जा रहे हैं। इन अधिकारियों पर कोई अंकुश नहीं। स्वामीजी ने 1939 में पलामू, महुआडाड़ आदि क्षेत्रों का दौरा किया था और उस समय किसानों और जंगल से अपनी आजीविका चलाने वाले आदिवासियों के दर्द से रूबरू हुए थे। स्वामीजी लिखते हैं, ‘सबसे दर्द की बात तो यह है कि उन महुवा, पलाश आदि पेड़ों का बंदोबस्त उसके किसान के साथ न करके हमेशा गैरों के साथ ही ये जमींदार भलेमानुस करते हैं? क्यों? इसीलिए कि अपने खेतों में दूसरां को जाने देगा किसान चाहेगा नहीं। फलतः मजबूरन औरों से भी ज्यादा पैसे देके खुद बंदोबस्त लेगा। इसे ही रक्तचूसना कहते हैं। जमींदार किसानों से खून निकालने की बेदर्द कोशिश उसी तरह करते हैं, जिस तरह सूखी हड्डी से खून निकालने की कुत्ते करते हैं। किसान हजार चिल्लाए। मगर सुने कौन? सरकार बहरी, उसकी कचहरियां बहरी, हाकिम बहरे, पुलिस बहरी, नेता बहरे, साधु-महात्मा बहरे, देवी-देवता बहरे और भगवान भी बहरा।’
    स्वामी जी के इस उद्धरण से किसानों के दर्द को समझा जा सकता है। स्थिति आज भी नहीं बदली है। स्वामी जी ने अपने एक अध्याय में ‘कमिया के कष्ट और सूदखोरी की लूट’ में झारखंड के खेतों के मजदूरों की, जिन्हें कमिया भी कहते हैं, की भी बड़ी दुर्दशा का जिक्र किया है। ‘पलामू जिले में इन्हें सेवकिया कहते हैं। सेवकिया शब्द सेवक से बना है और पलामू में सेवक का अर्थ है आमतौर से गुलाम। कमिया भी काम से बना है; काम के मानी हैं वही सेवा या सेवकाई। बिहार में यह काफी प्रचलित है।’ स्वामी जी ने सूदखोरों का भी जिक्र किया है, ‘ये सूदखोर होते हैं यों तो गांवों और शहरों के बनिए। मगर शोषक गृहस्थ और टुटपूंजिए जमींदार भी यही पेशा करते हैं। इनके अलावे काबुली, गोसाई, मुसलमान, पंजाबी, कान्यकुब्ज, भूमिहार, मारवाड़ी और अग्रवाल बनिए भी यह काम झारखंड के विभिन्न जिलों के यही कारबार करते हैं। रांची जिले में तो बिहार से गोसाई और ब्राण भैंसा काड़ा बेचने आते हैं। क्योंकि भैंसे हल में जोते जाते र्हैं। यहां आज भी भैंसे से खेत जोते जाते हैंवही लोग उन्हीं रुपयों को सूद पर लगाकर चले जाते हैं और फिर समय पर आके सूद दर सूद के साथ वसूलते हैंश्श्। ’ श् श् श्  स्वामी जी गोसाई, काबुली और पंजाबी की बेमुरव्वती का भी जिक्र करते हैं कि ये पापी ताक में रहते हैं। ये किसानों के साथ बेरहमी से पेश आते हैं। आज इसी सूदखोरी में लाखों आदिवासियों ने अपनी जमीन गंवा दी और मजदूर बन गए।
    आइए, अब बात टाटा पर कर लेते हैं। शुरुआत में रतन टाटा का उद्धरण दिया था। स्वामी जी की टाटा के बारे में क्या राय रही है, इसे जान लेने के बाद टाटा की कथनी-करनी का अंतर समझ सकते हैं। स्वामीजी ने इस अध्याय का शीर्षक दिया है, ‘ताता और होमी।’ स्वामी जी ने टाटा को ताता लिखा है। इसलिए, हम यहां अब ताता ही लिखेंगे। इसका थोड़ा विस्तार से जिक्र भी करेंगे। होमी की चर्चा फिर कभी करेंगे। यह टाटा का आदमी था।
   स्वामी जी लिखते हैं, ‘झारखंड की बात अधूरी रह जाएगी यदि ताता का विशेष वर्णन न किया जाए। पारसनाथ पहाड़ के सिलसिले में जैनी सेठों की करतूतों का जिक्र तो होई चुका है। मगर ताता का महत्व उनसे कहीं ज्यादा है। ताता का यहां जमींदार और पूंजीपति दोनों ही हैसियत से प्रभाव है। लाखों मजदूरों पर उसकी हुकूमत चलती है। जानें कितने नेताओं और कार्यकर्ताओं को अपने पाकेट में रख लिया है। श् श् श् सभी नेता वहीं जमशेदपुर में ही हजम हो जाते हैं। श् श् श्यह ताता की चातुरी और व्यवहार कुशलता का ज्वलंत प्रमाण है।’
   स्वामी ने यहां केवल किसान के बाबत ही बात की है। बहुतों को नहीं पता होगा कि ताता ने यहां जमींदारी भी की है लाखों लगान भी वसूलते थे। ये गांव जमशेदपुर के आस-पास के थे-इनके नाम हैं, उलियान, भाटिया, गोभरोगोड़ा, सोनाड़ी, बेलड़ी, साकची, बारा, बारीडीह, महरड़ा, मुड़कटी, निलदी, कालीमाटी, सुसनिगड़िया, सिद्धगोड़ा, वगैरह। ताता के लिए सरकार ने इन मौजों को 1919-20 में ले लिया। अप्रैल के महीने में स्वामी जी जब इधर आए थे तो वहां के किसानों ने अपनी आपबीती सुनाई थी। स्वामी जी ने उन्हीं के शब्दों में लिखा है, ‘ जमशेदपुर और आस-पास के जो गांव पहले दलभूम के राजा के मातहत थे हम उन्हीं के शुरू के ही वाशिंदे हैं; कंपनी के लिए सरकार ने इन्हें तथा गांवों को 1919-20 में ही राजा से हासिल किया था। कंपनी ने हमें कहा कि आप लोग पूर्ववत पड़े रहें, क्योंकि हमें अपने ही लिए आपकी सेवाओं की मजदूर, गाड़ीवान, साग तरकारी उपजाने वाले आदि के रूप में जरूरत है। इसलिए गांवों को राजा से लिया जाना तो केवल कागजी लिखा पढ़ी है। स्थिति में अंतर न होगा।’ श् श् श्‘चंद साल के बाद, जबकि बिना हमारी मदद के भी कंपनी का कारोबार चलने लगा, उसने हमें अपनी झोपड़ी और घरों से निकाल के अपने काम के लिए सब कुछ कब्जाना चाहा। फलतः इस तरह से हमें परीशान किया जाने लगा। 1932 में लगान न देने के बहाने हमारी बेदखली के केस किए गए। मगर हम लोग सभी केस जीत गए। तब बल प्रयोग शुरू हुआ और इसके चलते कंपनी का जो प्रधान रूप से इस शहर का प्रबंधक है, वही नोटिफाइड एरिया का चेयरमैन भी है। वह कुछ औरों के साथ नाजायज दूसरे के घर आदि में घुसने के लिए फौजदारी में भी फंसा था और हाईकोर्ट तक सजा बहाल रही। उसके बाद हम लोगों के विरुद्ध 145 धारा के अनुसार फौजदारी के बहुत मुकदमे चलवाए गए। मगर उनमें भी हम जीते।’ श् श् श्‘ताता कंपनी के मिल का निकला हुआ पानी नदी को गंदा करता है। मगर क्या मजाल कि किसान उससे अपना खेत पटा लें ? गाड़ी पर टैक्स है और जानवरों के मरने पर उन्हें हटाने के लिए जो पांच रुपया टैक्स है, वह तो हमें तबाह कर रहा है।’ श् श् श्‘सिंचाई की सुविधा पहले थी। मगर अब नहीं रही। लगान की बकायदा रसीद नहीं मिलती। छह मास हुए हम बिहार के अर्थमंत्रा से और बाद में प्रधानमंत्रा के भी लिखित प्रार्थना ले के पहुंचे थे। मगर, नतीजा अब तक कुछ मालूम नहीं हुआ।’ आज टाटा के अरबों-खरबों के विस्तार को देखें और पर उद्धरित रतन टाटा के नेक विचार से मिलान करें। इसके आगे और कुछ कहने की जरूरत रह जाती है क्या?
     झारखंड आंदोलन के शीर्षस्थ नेताओं में रहे व पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो ने अपनी नई पुस्तक ‘झारखंड की समरगाथा’ प्रकाशक निधि बुक्स, नई दिल्ली, जनवरी 2011 में लिखते हैं, ‘ 1907 में टिस्को कारखाना और जमशेदपुर शहर बसाने के क्रम में करीब दो दर्जन गांवों का अधिग्रहण किया गया, जहां हजारों झारखंडी किसान विस्थापन के शिकार हुए। सबसे आश्चर्यजनक नतीजा जो सामने आया वह यह था कि झारखंड में जहां हर आंदोलन आदिवासी आंदोलन की जड़ था और टिस्को कारखाना स्थापित करने के पांच साल पहले अंग्रेजों ने जिस प्रकार बिरसा आंदोलन को दमनपूर्वक कुचल दिया था, जिसके फलस्वरूप सिंहभूम में इस विस्थापन के खिलाफ कोई आंदोलन या प्रतिरोध नहीं हुआ। बिरसा आंदोलन के बाद लोग डरे हुए, सहमे हुए थे। विस्थापित लोग चुपचाप अपना हांडी बर्तन लेकर कहीं गुमनाम जगहों पर चले गए या तो ठेकेदार मजदूर बनकर पालतू हो गए। ये लोग कहां गए?  कहां पुनर्वासित किए गए?  कहां हैं वे ? कितने विस्थापित लोगों को नौकरी दी गई? इन ढेर सारे प्रश्नों का जवाब किसी के पास नहीं है।’
   एशिया की पहली स्टील कंपनी थी टाटा जो आज टाटा ग्रुप के नाम से जानी जाती है और अब 94 कंपनियां इसमें शामिल हो गई हैं। आज इसके पास 4 श्25 लाख कर्मचारी हैं और 4 श्62 लाख करोड़ संपत्ति है। इसी साल के 28 दिसंबर को  निःसंतान रतन टाटा रिटायर हो रहे हैं। उन्होंने अफसोस है कि वे कंपनी को पारदर्शी नहीं बना पाए। मीडिया घरानों का मानना है कि टाटा ऐसे कारपोरेट लीडर हैं, जो मानव मूल्यों को मुनाफे से पर रखते हैं। नए चेयरमैन की घोषणा हो चुकी है। अब साइप्रस मिस्त्रा होंगे टाटा समूह के मुखिया। आज सौ कंपनियां झारखंड में उद्योग लगाने का आतुर हैं। उनका मकसद झारखंड का विकास नहीं, धरती के नीचे खनिजों को दोहन करना है। जो अब तक यहां कंपनियां करती आई हैं। यहां के लोगों के हिस्से आएगा मजदूरी। पलायन। विस्थापन। यही सच है।
  यह विस्थापन आज भी जारी है। किसानों को उनकी अपनी जमीन से विकास के नाम पर बेदखल किया जा रहा है। हालांकि एकबार फिर किसान प्रतिरोध के उठ खड़े हुए हैं। जगह-जगह, टुकड़ों में ही सही आंदोलन कर रहे हैं। वे अब विस्थापित नहीं होना चाहते। पलायन नहीं करना चाहते। अब सरकार को भी सोचना होगा कि विकास की कीमत केवल आदिवासी-किसान ही क्यों चुकाएं ? जिसका फायदा उन्हें कभी नहीं मिलता।