मंगलवार, 1 मई 2018

अब याद नहीं आते भोजपुरी के तुलसीदस कहे जाने वाले कवि बावला

-एम. अफसर खां सागर

हम फकीरों से जो चाहे दुआ ले जाए,
फिर खुदा जाने किधर हमको हवा ले जाए,
हम सरे राह लिये बैठे हैं चिंगारी,
जो भी चाहे चरागों को जला ले जाए,
हम तो कुछ देने के काबिल ही कहां हैं लेकिन,
हां, कोई चाहे तो जीने की अदा ले जाए।


कुछ इसी अंदाज में जिंदगी को बिल्कुल सरल और सहज ढंग से जीने वाले, आम जन की आवज़ जनकवि रामजियावन दास बावला फक्कड़ स्वभाव के कवि थे। उनकी रचनाओं में बसा गवईं अंदाज लोगों को बरबस ही उनकी तरफ खींच लाता है। जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव आने के बावजूद भी बावला जी अपने वसूलों से कभी समझौता नहीं किया। वो जो भी रचते उसमें आम आदमी की पीड़ा, कलरव और उल्लास होता था। उन्होने गांव, गरीब, किसान और वनबासी समाज को बड़े करीब से देखा था, यही वजह था की उनकी रचनाओं में इनका आसान चित्रण मिलता है।
उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद का चकिया तहसील विंध्यपर्वत श्रृंखला से आच्छादित है। पहाड़ों के बीच बहते झरनें व नदियों की कल-कल आवाजें बरबस ही लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करती हैं। विंध्यपर्वत श्रृंखला की पहाड़ों में न जाने कितने रहस्य व तिलिस्म छुपे हैं। नौगढ़ और चुनारगढ़ की घाटियों में चंद्रकान्ता की याद आज भी ताजा है। चंद्रप्रभा वन जीव अभ्यारण्य में न जाने कितने जंगली जानवर विचरण कर रहे हैं। सामाजिक सद्भाव के प्रतीक लतीफशाह बाबा की आत्मा इसी घाटी में बसती है। राजदरी व देवदरी जैसे मनोरम जलप्रपात इसी घाटी में हैं। बात चाहे मूसाखाड बांध की हो या विंडमफाल की सब यहीं हैं। चन्दौली जनपद की चकिया तहसील कभी भारत की पौराणिक नगरी काशी का अंग हुआ करती थी, उससे पहले रामनगर के राजा आदित्य नारायण की मिल्कियत। इसी तहसील में पहाडिय़ों की गोद में बसा है भीषमपुर गांव, जहां बसती हैै ग्रामीण भारत के लोगों की आवाज भोजपुरी के तुलसीदास कहे जाने वाले रामजियावन दास बावला की आत्मा। भोजपुरी जो कि हिंदी की एक महत्वपूर्ण बोली है, जिसमें कविता की एक लंबी परंपरा मिलती है। कबीर, धरनीदास, भीमा साहब और लक्ष्मी सखी जैसे अनेक रचनाकारों ने भोजपुरी में रचनाएं की हैं।
भोजपुरी में काव्य रचना करने वाले रामजियावन दास 'बावलाÓ किसी पहचान का मोहताज नाम नहीं है। जिन्हें लोग भोजपुरी के तुलसीदास के नाम से भी जानते हैं। आज भले बावला जी हमारे बीच नहीं हैं मगर उनकी आत्मा काव्य के रूप में हमारे बीच मौजूद है।
रामजियावन दास 'बावलाÓ का जन्म एक जून सन् 1922 ई. को चन्दौली जनपद (तब वाराणसी) के चकिया तहसील के भीषमपुर गांव के एक अति सामान्य लौहकार परिवार में हुआ था। पिता रामदेव विश्वकर्मा जातीय व्यवसाय से जुड़े थे तथा माता सुदेश्वरी देवी घर का काम बखूबी संभालती थीं। रामदेव के चार पुत्रों और दो पुत्रियों में बावला जी सबसे बड़े थे, जिसकी वजह से इनका बचपन बहुत दुलार-प्यार में गुजरा। परिवार में शिक्षा की कोई परम्परा नहीं थी फिर भी बावला जी का नामांकन गांव के ही प्राथमिक पाठशाला में हुआ। आपने दर्जा तीन तो पास कर लिया मगर चार में फेल हो गए। कक्षा चार में फिर नाम लिखाया गया तथा नकल के सहारे आपने दर्जा चार भी पास कर लिया। बावला जी कहते थे ''बाबू आजौ हमरे मित्र ताना देवेलन की हम तोहके नकल देखाईले रहली त पास हो गईला, नहीं त चार ना पास भईल होता।ÓÓ
कक्षा चार के बाद आपने पढ़ाई लिखाई को सदा के लिए अलविदा इस तरह किया कि 'सन्तन को कहा सीकरी सो काम।Ó प्राथमिक शिक्षा के समय से ही इनका झुकाव कविता व संगीत की तरफ  था। इसी कारण इन्हे विद्यालय में सरस्वती वंदना का काम सौंपा गया था। कहते हैं कि सोहबत का असर व्यक्ति पर पड़ा है, ऐसा ही इनके साथ हुआ। बावला जी के बड़े पिता रामस्वरूप विश्वकर्मा संगीत व रामायण के मर्मज्ञ थें, जो कि आपको सोहबत में मिली। बावला जी अपने पुश्तैनी पेशे को भी बड़ी आसानी से अपनाया। आप स्वयं कहते थे कि ''हम बसुला लेके बाबू जी के साथ चल देहीं आउर रन्दा भी खूब मरले हई।ÓÓ
इसी बीच रामजियावन दास का विवाह मात्र 16 साल की उम्र में मनराजी देवी के साथ सम्पन्न हुआ। अभी तक तो आप अकेले थें मगर शादी के बाद आप पर पारिवारिक जिम्मदेारियां भी लद गयीं। घर की माली हालत उतना ठीक न था सो आपने भैंस पालने की जिम्मदारी आपने उपर लिया। युवक रामजियावन सुबह भैंस लेकर जंगल की जानिब मुखातिब हो जाता और घूमते-घूमते काफी दूर निकल जाता। भैंस चराते-चराते अक्सर राजदरी के समीप धुसूरिया नामक स्थान पर चले जाते जहां इनका काफी समय व्यतीत होता। धुसूरीया में ही बावला जी की मुलाकात स्थानीय कोल-भीलों और मुसहरों से हुई। स्वाभाविक रूप से वनमार्ग में भैंस के पीछे घूमते-घूमते रामायण भक्त रामजियावन को वनवासी राम का साक्षात्कार हुआ। खुद को कोल-भीलों की भूमिका में अनुभव करते हुये एक दिन अनायास ही मुख से बोल फूट पड़ें -

बबुआ बोलता ना, के हो देहलस तोहके बनबास,
इ विधना जरठ मति अट पट कइलन रे,
किया कौनो भूल तीनों मूरती से भइल रे।
किया रे अभागा कौनो लागा बाधी कइलन,
बबुआ बोलता ना।
हम बनबासी बबुआ माना हमरी बतिया,
बावला समाज में बिताइला एक रतिया।
कन्द, मूल, फल, जल सेवा में जुटैइबे,
बबुआ बोलता ना।
सेवा करिबै माना हमार बिसवास,
बबुआ बोलता ना।।

स्वत: गीत पूरा हुआ और प्राय: वनवासी राम, लक्ष्मण और सीता की करुणा से विह्वल रामजियावन एकांत में घंटों आंसू बहाते और अपने ईष्ट देव के साथ संवाद करते रहते। अपनी रचनाओं के उद्गम स्त्रोत के सम्बन्ध में वे कहते हैं कि ''भइस चरावत-चरावत तुकबन्दी करै लगली।ÓÓ
इनके बावला उपनाम के पीछे भी एक रोचक किस्सा है। शुरू में उन्होने कुछ भजनों की रचना की थी, जिसके प्रकाशन के लिए वे गांव के ही एक मित्र के साथ वाराणसी आये। छ: वर्णों का रामजियावन नाम बैठता ही नहीं था। बनारस में प्रकाशक उन्होने कोई छोटा नाम रखने की सलाह दी, जिसके उधेड़-बुन में वे रात भर मानसिक ऊहापोह में रहे। सुबह हाने पर दशाश्वमेघ घाट पर स्नान करने गए। वहीं पर एक अहिन्दी भाषी से टकरा गए। वह झल्ला कर रामजियावन को कुछ कहने लगा। उसकी बुद-बुदाहट में उन्हें बावला का उच्चारण होता हुआ जान पड़ा। उन्होंने तुरंत ही 'बावलाÓ उपनाम अपना लिया।
प्रथम बार रामजियावन बावला को सन् 1957-58 ई. में कवि के रूप में आकाशवाणी वाराणसी में काव्यपाठ का अवसर प्राप्त हुआ। वहीं पर आकाशवाणी के हरिराम द्विवेदी ने इनके नाम के साथ दास शब्द जोड़ दिया, तब से अब इन्हे रामजियावन दास 'बावलाÓ हो गए। इसी समय आपको कृषि-निष्ठा संस्था वाराणसी द्वारा भोजपुरी गौरव सम्मान से नवाजा गया।
बावला जी की रचनाओं में ग्रामीण समाज व किसान जीवन का अत्यन्त जीवंत चित्रण मिलता है। गांव, समाज की दीन-दशा तथा सुरसा की तरह मुंह बाये खड़ी समस्याओं का इन्होने बड़ी सहजता से चित्रण किया है। किसानों के उद्यम एवं संघर्ष के साथ-साथ ग्रामीण तीज-त्यौहारों का अक्स बावला जी के अनेक छन्दों में उभर कर सामने आता है। उन्होने किसानों के हालात को दर्शाते हुए लिख है कि-
नाहीं भेद-भाव, न त केहु से दुराव बा,
सबसे लगाव बा, मनवा के चंगा।
खेत में किनई, सधुअई समान बा,
सपना के सोध में उधार बा नंगा।।


समाज के अंदर उत्पन्न बुराइयों का चित्रण करते हुए वे लिखते  हैं-
हाय रे समाज, आज लाज बा न लेहाज बा,
चोर, घुसखोर कुल बन जालन बांका।
घोर अन्याय बा कोट में कचहरी में,
डहरी में लूट-पाट बम क धमाका।
गांधी जी क सपना कलपना बुझात बा,
खात बाये मेवा केहु, केहु करे फाका।।

बावला जी शिव उपासक हैं। अत: आपकी प्रारम्भिक रचनाएं भक्ति परक ही हैं। आप शिव जी की आराधना प्रतिदिन गीतों के माध्यम से करते थें-
    गांव क गवार बस माटी क अधार बा,
    सगरो अन्हार नाहीं पायी उजियारे के।
    कलही समाज दगाबाज क दखल बा,
    कल नाहीं बा बोझ भरत कपारे के।
    छोट-छोट बात उतपात क
    न कह जात न सह जात सुसुक-सुसुक बेसहारे के।
    बाबा शि शंकर भयंकर हो भूज देता
    आवे जे उघार करे 'बावलाÓ बेचारे के।।


भोजपुरी चित्रण में कवि का मन खूब रमता है। बसन्त बावला जी का प्रिय ऋतु है। बसन्त का चित्रण उन्होंने कई छन्दों में किया है। साथ ही वे वियोगिन के साथ सहानुभूति भी रखते हैं। वे लिखतेे हैं -
    बासल बयार रितुराज क सनेस देत
    पेड़ परास क फूल नंग
    अनंग भी अंग बदे सिहरैला।
    बारिन में फुलवारिन में
 भौंरा रसलोभ के मारे मरैला।
    जोरि के गांठ चलै तितली
    कुल गेह, सरेह, सनेह करैला।
    देख बसंत वियोगिन के
    छतिया पर आयेक कोदे दरैला।।


बावला जी भारतय संस्कृति व सभ्यता के मुल्यो में आई  गिरावट से काफी चिन्तित हैं। राजनीतिक मूल्यों का गिरना और जातिगत राजनीति के ये प्रबल विरोधी रहे हैं। परम्परागत सामाजिक संबधों में आई कमी और ग्रामीण समाज के कमियों को दर्शाते हुए उन्होंने लिखा है कि-
    मानवता मरि रहल जहां पर फिर भी देश महान।
    वाह रे हिन्दुस्तान।।
    घूस लेत अधिकारी देखा। हर विभाग सरकारी देखा।
    टोपी सूट सफारी देखा। जरै आग मे नारी देखा।
    साधु संत व्यापारी देखा। उल्टा बेट कुदारी देखा।
    कहां ज्ञान विज्ञान। वाह रे हिन्दुस्तान।।
    मांगत केहु रेगदारी देखा, गइया कटै कटारी देखा।
    दुर्घटना बमबारी देखा। घर-घर खेल मदारी देखा।
    कोठी महल अटारी देखा। दूध भयल तरकारी देखा।
    सहमै सूरज चान, वाह रे हिंदुस्तान।।
    परग परग दंगा देखा। डाकू चोर लफंगा देखा।
    करै घोटाला चंगा देखा। विकास वाली गंगा देखा।
    राजनीत बेढ़ंगा देखा। लोफर लुच्चा नंग देखा।
    चढि़ गइलै परवान। वाह रे हिन्दुस्तान।।
    वेद पुराण अपंगा देखा। वर्गवाद एक लंगा देखा।
नक्सलवाद उतंगा देखा। विद्यालय अड़कंगा देखा।
    चुनि चुनि जायं भुजंगा देखा। झंडा रंग बिरंगा देखा।
    करत 'बावलाÓ मान। वाह रे हिन्दुस्तान।।

बावला जी को तो वैसे अनेकों सम्मान मिले मगर ग्रमीण परिवश के लोगों द्वारा गाये जाने वाले इनके गीत सबसे बड़े सम्मान हैं। भोजपुरी भाषा-भाषी क्षेत्र में बावला जी का नाम अति आदरणीय है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश समेत भोजपुरी भाषियों में इनके गीत काफी लोकप्रिय हैं। गीतों के माध्यम से इनकी पहचान अत्यन्त व्यपक है। बावला जी को सराहते हुए साहित्यकारों ने लिखा है कि 'रामजियावन दास बावला वाचिक परम्परा के जीवन में कविता, कविता में जीवन समेटने वाले कवि हैं।Ó
बावला जी विश्व भोजपुरी सम्मेलन बम्बई, कलकत्ता और बनारस में प्रतिनिधित्व किया है। भोजपुरी का सबसे बड़ा सम्मान सेतु सम्मान से इन्हे सन् 2002 में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल वीरेन्द्र शाह ने प्रदान किया। इसके अलावा आपको काशी रत्न, जनकवि गौरव समेत अनेक सम्मान मिले हैं। गीतलोक आपकी एकमात्र प्रकाशित पुस्तक है। जीवन के अन्तिम समय में भी आधुनिक चकाचौंध से बिल्कुल अछूते रहने वाले बावला जी गांव की प्राकृतिक वादियों में भोजपुरी साहित्य को समृद्ध करने का प्रयास किया। उनका मन हमेश गांव में ही रमा रहता। माटी का घर-आंगन, खेत-खलिहान, फगुआ-गुलाल, बिरहा-लोक गीत, बसन्त, परास, पहाड़, कोयल की कूक, पपीहे की पीउ-पीउ और हरियर मटर की दाल में बावला जी का मन आजीवन लीन रहा।
जिसके बारे में उन्होन स्वयं लिखा है कि -
        आवा चला हमरे देहतवा के ओर तनी।
        जहवां सदेहिए सरग मुसुकाला।।

भोजपुरी साहित्य की सेवा करते हुए बिना किसी सम्मान के लोभ-लालच में पड़े जनकवि रामजियावन दास बावला इस फानी दुनिया को एक मई 2012 को अल्विदा कह चले। भले ही उन्होने सिल्वर स्क्रीन व मीडिया में सुर्खियां न पाई हों मगर उनके गीतों ने ग्रामीण भारत को गुंजायमान किया है, जो हमेशा गांव की पगडंडियों पर चलने वाले किसानों व गवईं इंसानों के जेहन में अमर रहेगा।

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

रांची में कवि त्रिलोचन और मंडा पर्व

जनपद के कवि त्रिलोचन रांची में भी रहे। 1959 में। करीब एक साल वे यहां पुस्तक भवन के अभिज्ञान प्रकाशन में काम किया। कचहरी रोड पर यहा पुस्तक भवन था। रांची से ही राधाकृष्ण के संपादन में निकल रही आदिवासी पत्रिका में उनकी कई कविताएं भी छपीं और उनका एक लेख मंडा पर्व भी आदिवासी के अंक में प्रकाशित हुआ था। मंडा पर्व आदिवासी और मूलवासियों का पर्व है, जहां वे शिव की आराधना करते हैं पूरी पवित्रता के साथ। इस पर्व में आदिवासी-मूलवासी भोक्ता नंगे पैर आग पर चलते हैं। त्रिलोचन जिस वर्ष के मंडा पर्व का उल्लेख करते हैं, वह 1940 के समय का है, जब रांची से 40 किमी दूर रामगढ़ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था और उसमें डा. राजेंद्र प्रसाद, सीमांत गांधी, सरदार बल्लभ भाई पटेल सरीखे नेताओं ने आग पर चलने के इस पर्व को देखा और आश्चर्यचकित भी हुए। त्रिलोचन ने आग पर चलने के इस पर्व पर विस्तार से लिखा और बताया कि अपने देश और विदेश में कहां-कहां आग पर चलने की परंपरा है।
बहरहाल, त्रिलोचन के बारे में यह भी कहा जाता है कि वे रांची में कुछ दिनों तक रिक्शा भी चलाए, लेकिन अब कोई ऐसा व्यक्ति नहीं बचा है, जो बता सके। रांची के वरिष्ठ साहित्यकार विद्याभूषण जरूर बताते हैं कि वे 1959 में रांची में एक साल रहे। यहां काम किया। राधाकृष्ण के पुत्र सुधीर लाल बताते हैं कि त्रिलोचनजी मेरे ही घर पर रहते थे। उनकी कविताएं भी आदिवासी साप्ताहिक पत्रिका में छपती थीं। उनकी एक तस्वीर जरूर मिलीं, जिसमें त्रिलोचन के साथ रांची के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ श्रवणकुमार गोस्वामी हैं। यह तस्वीर रांची में आयोजित किसी पुस्तक लोकार्पण की है। श्रवणकुमार गोस्वामी की स्थिति ऐसी नहीं कि वे कुछ इस बारे में बता सकें। अब सिर्फ संतोष ही करना है। लेकिन इस मंडा पर्व के बारे में भी हमें जानना चाहिए, जिसके बारे में त्रिलोचन ने लिखा है।     
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जातियों को जोडऩे का पर्व
मंडा वैसे तो आग पर चलने का पर्व है, लेकिन है यह जातियों को जोडऩे का पर्व। आदिवासी और मूलवासियों को एकसूत्र में पिरोने का पर्व। इसकी शुरुआत चुटिया से हुई, जो तब छोटानागपुर के नागवंशियों की राजधानी रही। छोटानागपुर शिव का आराधक है। वैसे संताल परगना भी। यहां शिव लिंग और शिव मंदिरों की बहुतायत है। बाबा बैजनाथ से लेकर गुमला के टांगीनाथ तक। मंडा पर्व इसी का एक रूप है। इसे शिव मंडा पूजा भी कहते हैं। नागवंशी राजाओं ने सभी जातियों को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। यह इस पर्व से समझा जा सकता है। राजा ने इस पर्व में सभी जातियों को जोड़ा और हर जाति को अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी। मंडा पूजा कराने के लिए पांडे समाज, पाट भोक्ता के लिए तेली समाज, राजा भक्तों के लिए अहीर (गोप), बाला भोक्ता के लिए मुंडा, भंडारी के लिए राजपूत समाज, ढकाहा के लिए नायक समाज, हजामत एवं पूजा के लिए ठाकुर समाज को भूमि (जमीन) दी गई थी। इसके अलावा बनिया समाज को मुन्नी पूजा, कोईरी समाज को भोक्ताओं को मुंडा खुटा में घुमाने एवं आदिवासी समाज के लोगों को मचान बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। यह पर्व वैशाख महीने में मनाया जाता है। चुटिया से इसकी शुरुआत होती है। इसके बाद गांव-गांव यह मनाया जाने लगता है। इसमें कई अनुष्ठान होते हैं।

डगर: ढाक द्वारा लगातार पांच दिनों तक डगर देकर सभी देवी देवताओं को जगाते हैं साथ ही लोगों तक यह संदेश पहुंचते है कि अब मंडा पर्व का शुभारंभ हो चुका है।

मुंडन:  इस दिन सभी प्रमुख भोक्ता क्रमश: पंडित, पाट भोक्ता, राजा भोक्ता, बाला भोक्ता और भंडारी के घर ढाक, नगाड़ा और शहनाई लेकर निमंत्रण देते हैं। इन्हें घर से ले जाकर इनका मुंडन संस्कार कराया जाता है।

उत्तरी : मुंडन संस्कार के बाद दूसरे दिन अर्धरात्रि में सभी भोक्ताओं को करीनाथ तालाब में उतरी लेकर सभी भोक्ता ढाक नगाड़े की थाप पर नाचते गाते शिव बरात के लिए चल पड़ते हैं शिव बरात गोसाई टोली स्थित लोहार के घर पर सतबहिनी मंदिर में शिव विवाह होता है। उसके बाद माता पार्वती (पाट) की विदाई होती है। भोक्तागण माता पार्वती (पाठ) को लेकर शिव मंदिर महादेव मंडा आते हैं।

नगर भ्रमण : सुबह में ढकहा ढाक बजाते पाटभोक्ता के घर जाकर उठाते हैं और पाटभोक्ता पाठ लेकर चुटिया के तालाबों में जाकर उत्तरी अन्य भोक्ताओं को पंडित देते हैं। यहां सिलसिला फुलखुंदी के दिन तक चलता है। इसमें माता पार्वती (पाठ) को चुटिया के सभी घरों में ले जाया जाता है। माता पार्वती (पाट) की पूजा घर की महिलाएं करती हैं। इस दौरान भोक्ता गण भी साथ में चलते हैं और घरों के आंगन में भोक्ता गण ढाक नगाड़े के थाप पर नाचते हैं। दोपहर में भोक्ता शिव मंदिर महादेव मंडा में कुछ देर आराम करते हैं और सात्विक भोजन गुड़ का शरबत और चना दाल का सेवन करते हैं। सभी भोक्ता 11 दिनों तक अनुष्ठान में शामिल होते हैं और भोक्ता जमीन पर ही सोते हैं। यह एक कठिन दिनचर्या होती है और पवित्रता का ख्याल रखा जाता है।
शोभायात्रा:  रात्रि में रोजाना चुटिया के प्राचीन श्री राम मंदिर से शोभायात्रा भोक्ताओं की निकलती है। भोक्ता गुलैची फूल से सज धज कर अर्धनारी का रूप धारण कर एक हाथ में चावर और दूसरे हाथ में बेत लिए बाबा भूतनाथ का जयकारा लगाते चलते हैं। 'बले शिवा मनी महेश काशी बैजनाथ उड़ीसा जगन्नाथ गजा गजाधर आधव माधव गौरीशंकर महेश दाता दिगम महेश बले शिवा मनी महेशÓ यही जयकारा लगाते हैं। ढोल नगाड़े एवं शहनाई पर भोक्तागण नाचते हुए शिव मंदिर महादेव मंडा पहुंचते हैं। उसके बाद सभी भोक्तागण एक दूसरे से गले मिलते हैं और फिर देर रात बाबा भोले शंकर की श्रृंगार कर पूजा अर्चना करते हैं।

फुलखुंदी : इस दिन सुबह से ही कई अनुष्ठान होते हैं। सबसे पहले स्वर्णरेखा नदी पर स्थित दादुल घाट जाते हैं जहां पर मिट्टी की ढकनी को भोक्ता गण बालू से बनी शिवलिंग पर हाथों से फोड़ते हैं जिससे भोक्ता का ढकनी फूट गया, उसकी तपस्या सफल समझी जाती है। जिस भोक्ता की ढकनी नहीं टूटी, उसे पंडित द्वारा दंड दिया जाता है। इस अनुष्ठान के बाद सभी भोक्ता नगर भ्रमण पर निकल पड़ते हैं। शाम में फुलकुंदी के लिए भोक्ता गण चुटिया के मुख्य मार्ग के घरों से लकड़ी लेकर आते हैं लकड़ी जमा कर के फिर दूसरे अनुष्ठान में चले जाते हैं। यहां अनुष्ठान को लोटन सेवा कहते हैं। इसमें सभी भक्तों एक दूसरे को आपसी भाईचारा का परिचय देते हुए 21 बार गले मिलते हैं फिर लपरा भांजने का समय आता है। इस समय भोक्ताओं को एक खूंटा में उल्टा लटकाकर अग्निकुंड में आस्था का परिचय दिलाया जाता है। फिर समय आता है निशा पानी लाने का अनुष्ठान। पाटभोक्ता निशा पानी एक घड़े में लाने के लिए हटिया तालाव जाता है। इस दौरान पाट भोक्ता को पीछे मुड़कर नहीं देखना होता है। निशा पानी मंदिर में पहुंचने के बाद बकरे की बलि भी दी जाती है। इसके बाद अंतिम अनुष्ठान भोक्ताओं को लहलहाते आग के अंगारों के ऊपर नंगे पांव चल कर अपनी भक्ति और शक्ति का परिचय देते हैं। इस फूलखुन्दी इसे ही कहते हैं।

राधा चक्र, शोभायात्रा एवं झूलन : अगले दिन अनुष्ठान विशू के दिन मनाया जाता है। पूजा अर्चना करने के बाद मंदिर के पुजारी पंडित जी सभी भोक्ताओं को गुड़ का शरबत एवं कच्चा आम प्रसाद के रूप में खिलाते हैं। यह भी माना जाता चुुटिया में विशू के दिन ही सभी घरों में आम का स्वाद चखते हैं। इससे पहले आम का सेवन नहीं करते हैं। फिर भोक्ता गण सज धज कर अर्थ नारी का रूप लेकर प्राचीन श्री राम मंदिर से चल पड़ते हैं। इस समय एक खास अनुष्ठान का आयोजन होता है। जिसे राधा चक्र कहते हैं। राधा चक्र एक बैलगाड़ी में लगाकर, जिसमें पाट भोक्ता को अर्धनग्न अवस्था में नुकीली किलो के बीचो-बीच लिटाकर शिव मंदिर महादेव मंडा घुमाते हुए लाते हैं। इसके बाद सभी भोक्ताओं को एक लकड़ी के खंभे में बारी-बारी से झुलाया जाता है। भोक्ता गण श्रद्धालुओं को ऊपर से आस्था के फूल ब
रसाते हैंञ इस दिन मंदिर परिसर में मेला का भी आयोजन होता है।

छठी : मंडा पर्व छठी के साथ संपन्न होता है। इस दिन सभी भोक्ता हजामत करा कर एक दूसरे के शरीर में तेल हल्दी लगाकर अपना व्रत को तोड़ते हैं और खिजुरिया तालाब में स्नान करने के बाद बाबा का श्रृंगार पूजा करते हैं और अंत में भोक्ताओं के लिए भंडारे का आयोजन होता है। इस तरह यह पर्व संपन्न होता है।


रविवार, 11 फ़रवरी 2018

राजभवन में उतरा बसंत


बागों में बहार है। कलियों में निखार है। पूरे वातावरण में चतुर्दिक मादकता बिखर रही है। धरती के कण-कण से हास और उल्लास फूट पड़ रहा है। मंद-मंद पवन में सुगंध की सुखद हिलोरे उठ रही हैं। मंजरियों का मुकुट पहने अमराइयों में मधुरिमा अंगड़ाइयां ले रही हैं। राजभवन का उद्यान दुल्हन की तरह सज गया है। पूरे परिसर में फूलों की चादर फैली हुई है। 

राजभवन रांची शहर के बीचोबीच स्थित है। यह कुल 62 एकड़ में फैला है, जिसमें 10 एकड़ में आंड्रे हाउस व राजभवन का सचिवालय है। इसका निर्माण 1930 में शुरू हुआ था यह मार्च, 1931 में तक यह पूर्ण हुआ था। उस समय इसकी लागत सात लाख रुपये आई थी। इसकी डिजाइन मिस्टर सैडो बैलर्ड ने की थी। इस भवन में ब्रिटिश डिजाइन की छाप है। इसके कुछ सुइट यहां के मौसम के हिसाब से बनाया गया है। बिल्डिंगों की छत रानीगंज टाइल्स से बनी है। कुछ में लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है। राजभवन पूरा भवन हरा-भरा है। राजभवन में कई लॉन व गार्डेन हैं, जो महान व्यक्तियों के नाम पर रखे गए हैं। इसमें एक है अकबर गार्डेन, इसका निर्माण हाल में 2005 में किया गया है। यह कई प्रकार के गुलाब और मौसमी फूलों से महंकता है। बुद्धा गार्डेन नाम से एक ग्रीन हाउस है। यहां से खूबसूरत नजारा दिखता है। अशोका करीब 52 हजार फीट का खूबसूरत लॉन है। इसी प्रकार मूर्ति गार्डेन 15 हजार फीट, लीली पॉंड 12 हजार फीट का है। राजभवन में एक बड़ा हॉल है, जिसका नाम बिरसा मंडप रखा गया है। यहां पर सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित होती रहती हैं। राजभवन के दक्षिण में महात्मा गांधी गार्डेन है। यहां पर विभिन्न प्रकार के औषधीय पेड़-पौधे लगाए गए हैं। राजभवन के विशाल प्रांगण में बांसों का विशाल झूरमूट, 150 प्रकार के वृक्ष हैं। राजभवन के सामने ही एक नक्षत्र वन है, जिसका संचालन राजभवन द्वारा किया जाता है। यहां पर भी कई प्रजातीय के पौधे, वृक्ष आदि हैं।

राजभवन का उद्यान अब आम लोगों के लिए खुल गया है। यहां चहकते फूल हैं तो गाते हुए फव्वारे हैं। 52 एकड़ में फैले इस उद्यान में तरह-तरह के फूल, पौधे और औषधि हैं। नाचता हुआ मोर है और मसालों की खुशबू भी है। पिछले 35 सालों से राजभवन उद्यान की देखभाल कर रहे मुख्य उद्यान विक्षक चुलाही मंडल बताते हैं कि यहां 65 प्रकार के अलग-अलग फूल हैं। 1000 फलदार पौधे हैं। पांच सौ सखुआ के पेड़ है। दो सौ केला है। ये सब तो आम हैं। कुछ खास भी इस उद्यान में हैं।

कल्पतरू भी है और चंदन भी
विशाल उद्यान में दुर्लभ कल्पतरू के दो पेड़ भी हैं। चंदन के पेड़ भी हैं। लाल चंदन का पेड़ यहां देख सकते हैं। जिसे लोग रक्त चंदन भी कहते हैं। कल्पतरू के बारे में कई पौराणिक आख्यान है। सभी मनोकामना यहां पूरी होती है। इसलिए, इसका दर्शन जरूर करें।

सिंदूर का भी पेड़
उद्यान में सिंदूर के भी कई पेड़ है। सिंदूर के पेड़ में कांटे भी हैं। इसलिए, संभलकर देखें। सिंदूर के सूखे फल के अंदर गोल-गोल सरसों के आकार का दाना एक दूसरे से जुड़ा होता है। पंजे पर रगड़ते ही लाल हो जाता है।     
रुद्राक्ष भी यहां है
उद्यान में रुद्राक्ष के भी पेड़ हैं। इसके लिए उत्तराखंड जाने की जरूरत नहीं। यहां रुद्राक्ष के पेड़ देख सकते हैं। बड़े बेर की तरह फल लगता है और इसमें ही रुद्राक्ष निकलता है। यहां एक रुद्राक्ष अंडाकार है और एक गोलाकार। दोनों का अपना महत्व है। इसकी यहां माला बनाकर राजभवन में आने वाले विशेष अतिथियों को प्रदान किया जाता है।

किचन गार्डन भी
उद्यान में किचन गार्डन भी हैं। यहां लौंग, इलायची, दालचीनी, तेजपत्ता सहित कई अन्य मसालों का गंध भी ले सकते हैं। इनके अलावा टमाटर, गाजर, बैगन भी है। सभी आर्गेनिक। किसी के उत्पादन में किसी प्रकार का रासायनिक उर्वरता का प्रयोग नहीं किया जाता। गोबर से यहां खाद बनाया जाता है। यहां गोशाला भी है।  
गांधी औषधि गार्डेन
यहां हर्बल मेडिसिनल प्लांट भी हैं, जिसमें 35 प्रकार की जड़ी-बूटियां हैं। कई औषधीय पौधे और पेड़ यहां लगे हुए हैं। बबुई तुलसी, अश्वगंधा, लवंग, बिलायती धनिया, गंध प्रसारिणी, सर्पगंधा, मशकदाना आदि हैं।  

अकबर गार्डन
अकबर गार्डन में फूलों की बहार है। बसंत यहीं पर उतरा है। खिलते और हंसते हुए फूल और संगीत की धुन पर झूमते फव्वारे। यह सेल्फी जोन भी है। यहां हजारों प्रकार के फूल हैं। विदेशी भी देशी। यहां सर्वाधिक भीड़ रहती है। 

गुलाबों की प्रजातियां
उद्यान में दो सौ प्रकार के गुलाब यहां लगाए गए हैं। लाल, गुलाबी, सफेद से लेकर हर रंग। लोग यहां गुलाब के संग भी सेल्फी लेते हैं। गुलाब के कई आकार यहां हैं। पूरा परिसर गुलाबों की सुगंध से महकता रहता है।

असीम शांति बुद्धा गार्डन में
जब घूमते हुए थक जाएं तो बुद्ध की शरण में जा सकते हैं। यहां असीम शांति का अहसास होगा। ध्यानस्थ बुद्ध यहां हैं। खूबसूरत पार्क। बैठने के लिए जगह। ठीक बगल में यहां नाचते मोर का भी दर्शन कर सकते हैं। यहां और भी बहुत कुछ है।

पिछले तीन दशक से उद्यान की सेवा कर रहा हूू। आज यह सब दिखाई दे रहा है, वह तीन दशक मेहनत का नतीजा है। मेरे साथ पचास से ऊपर मजदूर दिन रात लगे रहते हैं। सितंबर में नए फूल-पौधे लगाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। अक्टूबर के पहले सप्ताह में लगा दिया जाता है और फरवरी तक दीदार के लिए यह उद्यान तैयार हो जाता है।
अब्दुस्सलाम, उद्यान विक्षक, राजभवन


राजभवन में बहुत कीमती पेड़ भी लगाए गए हैं। यहां चाइनीज बांस है। कई विदेशी वृक्ष भी यहां लगाए गए हैं। यहां राइस प्लांट है, जो बासमती की तरह महकता है।
चुलाही मंडल मुख्य उद्यान विक्षक, राजभवन

चुटियानागपुर की सुंदरता

  -मिशन इंस्पेक्टर एच. काउश एवं मिशनरी एफ. हान
 
   जब कोई मिशन का मित्र हिंदुस्तान के बारे में सुनता है तो वह एक ऐसे जादुई देश की कल्पना करने लगता है जिसे प्रकृति ने शृंगार किया हो। लेकिन जैसा कि विदित है हिंदुस्तान अपने में एक दुनिया है। सभी जगहों पर उष्णकटिबंध की हरियाली भरी सुंदरता राज नहीं करती। कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं जो कवि की कल्पना से मेल नहीं खाते। विशेषकर उत्तरी हिंदुस्तान प्रकृति की सुंदरता में कई मायने में कम है और चुटियानागपुर का हमारा मिशन क्षेत्र भी सामान्यत: तुलना में श्रीलंका अथवा बड़े सुंडाद्वीप के आकर्षण के बराबर नहीं है। फिर भी चुटिया नागपुर में सुंदरता के कई स्मारक सृष्टिकर्ता ईश्वर की कृपा से मौजूद हैं। हमारी तस्वीर में दिखाया गया सुंदर जलप्रपात इसका प्रमाण है। भूरे ग्रेनाइट की चट्टानों से सफेद झागदार पानी दिल थाम लेने वाली चौड़ाई में 100 फीट नीचे आवाज करता हुआ टूट कर गिरता है। नीचे एक प्यारा नीले रंग का छोटा झील बन जाता है जो साफ और पारदर्शक दिखाई देता है। सभी प्रकार की मछलियां विशेष कर सर्पमीन और कतला जाति की सौर पानी में विचरण करती हैं। बहुत गहराई में उदविलाव मछली, हां, स्वयं घडिय़ाल और बहुत सारे पानी सांप पाए जाते हैं। किनारे पर जहां पानी छिछला होता है, लोग नहाते-धोते हैं।
  इस क्षेत्र के जलप्रपातों में स्वर्णरेखा नदी का हुंडरू घाघ सबसे बड़ा है, जो रांची से 25 मील उत्तर पूर्व में है और 320 फीट की ऊंचाई से गिरता है। हमारी तस्वीर में चट्टानों के ऊपर घने जंगलों का भाग दिखाई देता है, जिसमें विभिन्न चौड़े पत्तों वाले वृक्ष तथा शिरीष के पेड़ दिखाई देते हैं। कहीं पर भी ताड़ के वृक्षों का नामोनिशान नहीं, ताड़ के नाम पर सिर्फ खजूर के पेड़ मिलते हैं। इसके विपरीत जंगल का मुख्य पेड़ सखुआ है, जो हमारे जर्मनी के ओक पेड़ के समान दिखाई देता है। इसकी लकड़ी घर बनाने के काम आती है। उसकी छाल से रस्सी बनाई जाती है। उसकी राल से हिंदुस्तान में अपरिहार्य धुवन बनता है। इसके अलावा जंगल के बड़े हिस्से में बांसों के झुंड पाए जाते हैं।
आगे हम महुआ पेड़ का भी जिक्र कर रहे हैं, जिसके फूलों से मादक द्रव्य बनाया जाता है। कुसुम पेड़ की डालियों पर लाह के कीड़े पाए जाते हैं। सुंदरता में सबसे अलग है आम के पेड़ जिनके बड़े फल हमारे यहां के आलूबुखारा की तरह होते हैं और जिन्हें बड़े चाव से खाया जाता है। करीब सभी गांवों के आने आम के बगीचे हैं। सबसे विशिष्ट है बरगद का पेड़ जो समांतर डालियों से जड़ों को नीचे गिराता है और जब वे जमीन के अंदर पहुंचती है तो उनसे नया पेड़ निकलता है। बहुधा ऐसा होता है कि वर्षों के अंतराल में एक अकेला बरगद एक सरीखे का छोटा जंगल बन जाता है। पीपल के पेड़ को विशेषकर हिंदुओं की ओर से धार्मिक सम्मान मिलता है। प्रत्येक पत्ती पर लोग कहते हैं कि देवता निवास करते हैं। जब बारिश होती है तब लोग इसकी पूजा करते हैं। यह पेड़ समूचे हिंदुस्तान का परोपकारी पेड़ है, क्योंकि यह लोगों को सबसे ज्यादा छाया प्रदान करता है। इमली का पेड़ भी छाया का धनी है और लोग गांव के अखरा में इसे लगाना पसंद करते हैं, क्योंकि बारिश की बूंदों को भी इसी पेड़ की घनी पत्तियां रोक लेती हैं। जंगल जीवन से भरपूर है। चुटियानागपुर में पहले के उल्लेख के अलावा, जंगली जानवरों की भरमार है, यहां वहां हाथी भी दिखाई देते हैं। यहां के रहने वाले हिरण, हिरणी और खरगोश का शिकार करते हैं किंतु बिना आग्नेय शस्त्रों का प्रयोग किए। लोग हो हल्ला कर जानवरों को खदेड़ कर एक जगह लाते हैं और मारते हैं अथवा अधिक से अधिक तीरों से शिकार करते हैं। जंगली सुअर लगाए हुए बीजों को काफी नुकसान पहुंचाते हैं। सियारों की संख्या बहुत अधिक है। विभिन्न तरह की चिडिय़ां मधुर संगीत सुनाती हैं, गरुड़, गिद्ध, बगुला, तोता, कोयल, कौआ, गोरैया, बगेरी और अबावील। कीड़े-मकोड़ों की भरमार के बारे में शायद ही शिकायत सुनने को मिलती है। सबसे ज्यादा परेशानी जाहिर है, दीपक द्वारा होती है जो सभी चीजों को बर्बाद कर देती हैं। मच्छरों से बचाव के बहुत सारे उपाय पहले से मौजूद हैं। काफी संख्या में जुगनू अंधकार में निकलते हैं और भरे जंगल में एकमात्रा लालटेन का काम करते हैं।  
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1885 में लिखा गया लेख। जर्मन से अनुवाद दोमिनिक बाड़ा।

सांप्रदायिकता और प्रांतीयतावाद



जयपाल सिंह मुंडा
 भारतीय राष्ट्रवाद का कीड़ा बहुत पुराना है। यह सच है कि भारतीय राष्ट्रवाद सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद से ऊपर नहीं उठ पाया है न ही स्पष्ट रूप से यह सामंती समाज और धर्म के खिलाफ हो सका है। इसने कभी भी कोई मौलिक क्रांतिकारी मांग नहीं उठाई और इसीलिए व्हाइट हाउस के साम्राज्यवादियों को भारत के मु_ी भर विद्रोहियों को बेहद छोटे स्तर पर भारतीयकरण की तुष्टीकरण कर उनसे निबटने में खास दिक्कत नहीं हुई। धार्मिक कट्टवादियों ने सार्वजनिक मंचों पर कब्जा कर लिया है और वे उन संस्कृतियों पर हमला कर रहे हैं जो उनसे अलग अपनी पहचान रखते हैं। मतभेदों या सहमति के बावजूद विभिन्न राजनीतिक दलों और जो सच्चे हमवतनी हैं उन्हें भी अल्पसंख्यक विरोधी विचार अपनाने के लिए बाध्य किया किया जा रहा है। यह सभी रोग, जो भयावह रूप में व्याप्त हैं, भारतीय राष्ट्रवाद के लिए अनोखे नहीं हैं। ये दूसरे देशों में भी फले-फूले हैं पर वहां के नेता-जनता इनसे ऊपर उठे हैं और राष्ट्रवाद की सीमाओं के परे जाकर उन्होंने अंतर्राष्ट्रीयतावाद और सार्वभौमवाद को अपनाया है। ग्रेट ब्रिटेन में 'लैसेस फेयरÓ (व्यक्तियों और समाज के आर्थिक मामलों में न्यूनतम सरकारी हस्तक्षेप की नीति) या मुक्त व्यापार का इतिहास हमें उन आर्थिक परिस्थितियों के बारे में बताता है, जो राजनीतिक सिद्धांतों के बचाव में आया। विश्व बाजार में ग्रेट ब्रिटेन अपना आधिपत्य तभी तक बरकरार रख सकता है जब तक कि दूसरे देश ब्रिटिश एकाधिकार को यह धमकी देना शुरू नहीं कर देते कि संरक्षणवादी पूंजी की वापसी हो सकती है।
हमारे लोकप्रिय नेताओं ने विरोधाभासी और दमनकारी परिस्थितियों के बीच बहादुरी से संघर्ष किया है। विदेशों में भारतीय छात्रों को खुद को भारतीय मानने में कोई कठिनाई नहीं होती, लेकिन भारत में उनको वही भारतीय राष्ट्रवाद पसंद आता है जिसमें सांप्रदायिक और कट्टरपंथी राजनीति होती है। इस तरह के विरोधाभासों का सबसे बढिय़ा उदाहरण गांधीजी हैं। वह हमेशा रहस्यवादी अहिंसा और पश्चाताप वाली हिंसा के बीच डोलते रहे हैं। पारंपरिक तौर पर बड़ी पूंजी प्रगतिशील अर्थव्यवस्था का कट्टर दुश्मन है। यह बात गांधीजी से अविभाज्य रूप में जुड़ी है क्योंकि उनके पास अपने संरक्षक पूंजीपतियों से अलग होने का साहस बिल्कुल नहीं है। अपने पूर्वाग्रहों और कमजोरियों से वही व्यक्ति ऊपर उठ पाता है जिसके पास अत्यंत तर्कसंगत वैज्ञानिक नजरिया है। सबको पता है कि इस बीमारी की अचूक दवा कहां है तब भी हम ठोस कार्रवाई करने के लिए तैयार नहीं हैं। अगर हम अपने स्वार्थी दावों को त्यागने के लिए तैयार नहीं हैं, तो फिर आपसी सौहार्द, विश्व बंधुत्व, सार्वभौमिक मताधिकार और लोकतंत्र की बात करने का क्या मतलब है? हम अपने अधिकारों के बारे में बहुत अधिक सोचते हैं और उसकी मांग करते हैं, लेकिन हम हद दर्जे की असंवेदनशीलता के साथ अपने प्राथमिक कर्तव्यों की उपेक्षा करते हैं। ऐसी स्थिति में जब हमारे नेताओं ने 20 लाख बंगालियों को मरने के लिए छोड़ दिया है, यह दावा बहुत ही बकवास है कि हम भ्रष्टाचाररहित एक ईमानदार सरकार के लिए राजनीतिक रूप से तैयार हैं। इंग्लैंड में भुखमरी से एक मौत होने पर पूरे राष्ट्र में विद्रोह फूट पड़ेगा और सरकार गिर जाएगी। यहां हमारे नेता उस व्यक्ति को क्लीन चिट दे देंगे जो असंख्य मौतों का जिम्मेदार है और उसके साथ गलबहियां डालकर मजे करेंगे।
मैं अपनी राजनीतिक प्रगति बनाए रखना चाहता हूं, पर इसके साथ ही एकतरफा अधिकारों और विशेषाधिकारोंपर जो जोर है, उससे धीरे-धीरे मुक्त होने की कोशिश भी कर रहा हूं। धर्म, पूंजी और सामंती समाज हमारे दुश्मन हैं। ये बीमारियां हमारे वास्तविक राष्ट्रवाद को निगल रही हैं। इनके खिलाफ साहसपूर्ण संघर्ष चला कर ही भारतीय राष्ट्रवादी एक बेहतर देश की रचना कर सकते हैं। देश को दीमक की तरह खा रहे इन कीड़ों की पहचान मुश्किल नहीं है। हमारा फौरी कार्यभार यही है कि इनका अस्तित्व पूरी तरह से नष्ट कर देने के लिए हम तुरंत ठोस कार्रवाई में उतरें।

(जयपाल सिंह मुंडा का यह अंग्रेजी लेख 'द बिहार हेराल्डÓ, पटना के 13 नवंबर 1945 में छपा था, जिसे शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक 'आदिवासियतÓ से लिया है। आजादी के 70 साल बाद पहली बार हिंदी में प्रकाशित होने वाली 'आदिवासियतÓ में जयपाल सिंह मुंडा के 19 चुनींदा लेख और भाषण हैं जिसका अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद और संपादन अश्विनी कुमार पंकज ने किया है। पुस्तक का प्रकाशन प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची द्वारा किया जा रहा है जो फरवरी दूसरे सप्ताह से पाठकों के लिए उपलब्ध होगी।)

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

अंधकार की आत्मीयता

काका कालेलकर
 एक बार संताल लोगों की परिस्थिति देखने के लिए हम घूम रहे थे। सांझ के समय एक गांव में आ पहुंचे। हम लोगों ने गांव के लोगों के साथ वार्तालाप शुरू की। धीरे-धीरे प्रकाश कम होने लगा। वहां के एक गृहस्थ से मैंने कहा-'अंधकार हो चला है-दीया ले आयें, तो अच्छा होगा!Ó
आश्र्च से मेरी तरफ  देखते हुए, वे बोले-'दीया? इस गांव में दीया कहां से मिलेगा? हम लोग दीया कभी इस्तेमाल नहीं करते। सूरज छिप गया कि, हमारा कारोबार समाप्त हो जाता है। फिर सुबह की पौ फटी कि हमलोग अपने-अपने काम में लग जाते हैं।Ó
 मनुष्य की बस्ती में अंधेरे का यह साम्राज्य? मैं बड़ी चिंता में पड़ गया। पर, इन लोगों को इसका कुछ भी बुरा नहीं लगता। अंधेरा तो रात को आयेगा ही। उसका दु:ख मानना चाहिए, यह बात भी इन लोगों के दिमाग में नहीं आती। भारत-भूमि, भारतीय जीवन और भारतीय संस्कृति के बारे में बराबर बोलते रहने वाले, मुझे इस दीप-विहीन जीवन की तब तक कल्पना ही नहीं थी। थोड़ी देर सोचने पर मुझे लगा कि, वस्तुत: इन लोगों पर तरस खाने के बदले मुझे अपने आप पर ही तरस खाना चाहिए।
 परिपक्वता आने पर, उपनिषद की प्रार्थना 'तमसो मां ज्योतिर्गमय!Ó से, अंधकार और प्रकाश जगत में सर्वव्यापी और परस्पर भिन्न जीवन-तत्व की बात ध्यान में आयी और प्रकाश के प्रति भक्ति दुगुनी हुई; लेकिन इसके साथ-ही-साथ अंधकार भी एक व्यापक व सार्वभौत तत्व है, इसकी कल्पना स्पष्ट हो जाने से अंधकार का महत्व भी समझ में आया। आध्यात्मिक दृष्टि से, हम अज्ञान को अंधकार कहते हैं। समस्त जीवन का विचार करते समय, जगत का अंधकार और हृदयाकाश का अज्ञान, ये भिन्न नहीं हैं-एक ही हैं, ऐसा प्रतीत हुआ।
 अनुभूति की एक और प्रसंग उपस्थित हुआ। एक बार एक कुटुम्ब पर दारुण संकट उपस्थित हुआ। घर के सब बड़े लोग शोक में डूब गये, लेकिन सिर्फ बालक हंस-खेल रहे थे। यह देखकर मन में विचार आया कि, ईश्वर की कितनी बड़ी कृपा है कि, इन बच्चों को कुटुम्ब पर आये संकट की कल्पना ही नहीं हो सकती। अगर उन्हें सच्ची परिस्थिति की कल्पना हो सकती, तो उनके कोमल हृदय पर आघात होने से उनके प्राण ही निकल जाते। मुर्गी के बच्चों का आकार बनने से पहले, जिस प्रकार उन्हें अंडे के कवच का रक्षण चाहिए उसी प्रकार मन पक्का हो, तब तक के लिए बच्चों को ईश्वर ने यह अज्ञान का कवच दिया है। यह उसकी बड़ी कृपा ही है।
 पर जब हम तत्वदर्शी होकर अथवा तत्व-जिज्ञासु बनकर जीवन का विचार करते हैं, तब जीवन और मृत्यु दोनों परस्पर पूरक, पोषक और एक सरीखे आवश्यक तत्व है, यह बात हमारी नजर में आती है। अज्ञान और ज्ञान-अंधकार और प्रकाश-के संबंध में भी ऐसी ही बात है।
 अंधकार-संबंधी एक और प्रसंग याद आ गया। शांति निकेतन में महर्षि देवेंद्रनाथ टैगोर रात की प्रार्थना के समय दीया हटा देते थे। रवींद्रनाथ ने यही परंपरा आगे चलायी। शांति निकेतन की यह पद्धति गांधीजी को इतनी पसंद आयी कि उन्होंने भी रात की और सुबह की प्रार्थना के समय दीय हटा देने की परिपाटी चला दी।
कितने ही योगी सांझ की, जब प्रकाश क्षीण होकर अंधकार प्रारंभ होता है, तब ध्यान में बैठना पसंद करते हैं। कारण, अंधकार एकाग्रता के लिए-अंतर्मुख वृत्ति के लिए-विशेष सहायक होता है। रात की बेला इतनी सौम्य और शांत होती है कि, अंतर्मुख होकर ध्यान करने में बाहर की परिस्थिति जरा भी बाधक नहीं होती।
 भगवान, हमें ऐसे प्रकाश में से शांतिदायक अंधकार की तरफ ले जाओ, ऐसी प्रार्थना करने के दिन सचमुच ही आ गये हैं। प्राकृतिक प्रकाश में मनुष्यता होती है। प्राकृतिक अंधेरे में आत्मीयता होती है और चिंतन के लिए अवसर भी मिलता है। प्राकृतिक प्रकाश और प्राकृतिक अंधकार दोनों ईश्वरदत्त प्रसाद है। दोनों में मनुष्य का व्यक्तित्व निखरता है और विकसित होता है। प्रकाश प्रवृत्तिपरायण होने के कारण विचलित कर सकता है। अंधकार में आत्मपरीक्षण का स्थान है और इसलिए वह साधना के लिए अनुकूल है।
 अंधकार की भावात्मक कही चाहे अभावात्मक, वह मनुष्य के मन के लिए, हृदय के लिए, आत्मा के लिए, पोषक वस्तु है-बहुत-से बंधन तोड़कर छुटकारा देने वाली हितकर वस्तु है। सारी रात कमरे में प्रकाश रखने की सुभीता होने पर भी सोने वाला व्यक्ति अंधकार का ओढऩा ही पसंद करता है। दिन में सोनेवाला व्यक्ति भी प्रकाश कम करके सोता है। नींद जिस तरह थके हुए व्यक्ति को आराम देकर ताजा करती है, उसी प्रकार अंधकार भी थकान दूर करके ताजगी उत्पन्न करता है। मनुष्य अंधकार में जाकर बैठता है, तो उसे नयी-नयी कल्पनाएं सूझती हैं, भरमाये हुए मनुष्य को संकट से मुक्त होने का मार्ग सूझता है और निराश मनुष्य की आशवा की खुराक मिलती है।
गोवा की राजधानी पणजर में एक बार मेरा व्याख्यान था। लोग एकाग्रता से सुन रहे थे। इतने में बिजली बंद हो गयी और दीवानखाने में निरा अमावस-सरीखा घुप्प अंधेरा हो गया। पेट्रोमैक्स लाने केलिए लोग भागे। थोड़ी देर ठहरकर मैंने समझाया-दीए की क्या दरकार है। आपलोगों ने मुझे देखा है, मैंने आपको देखा है। अपने विषय में हतम रंग चुके हैं। हम अंधेरे में ही व्याख्यान अभी क्यों न चलावें? प्रश्नोत्तर भी एक दूसरे का चेहरा देखे बिना चलाए जा सकेंगे। चेहरे पर का भाव यदि न भी दिखाई दिया, तो आवाज से एक दूसरे की वृत्ति ध्यान में आ सकेगी।
 सब शांत होकर एकाग्रता से सुनने लगे। और, सचमुच ही उस दिन का व्याख्यान और उसके बाद के प्रश्नोत्तर आकर्षक और सजीव हुए। सभा का काम समाप्त होते-होते कोई एक मोमबत्ती ले लाया। मोमबत्ती के पीछे-पीछे अपना विज्ञापन करता पेट्रोमैक्स भी आ गया। उसने लोगों की आंखें चौंधिया दी; पर उसके पक्ष की इतनी बात तो कबूल करनी ही चाहिए कि उसके प्रकाश के कारण सभा से लौटने वाले लोगों को अपने-अपने जूत खोज सकना सहज हो गया।
  इस सभा में मुझे एक नया ही अनुभव हुआ। अंधकार में वक्ता और श्रोता के बीच का संपर्क अधिक अच्छी तरह स्थापित हो सका। आपस में चेहरे दिखाई नहीं देते, मानों इसी के कारण हम सब अभिन्न मित्रा हो गए। एक दूसरे को देख नहीं सकते। इस अड़चन के कारण सबको सबके बारे में सहानुभूति हो गयी थी और अंधेरे की अड़चन की भरपाई करने के लिए सभी लोग, अपनी सज्जनता और आत्मीयता की पूंजी, खुले दिल से व्यवहार करने लगे थे। मुझे लगा कि अंधकार ने एक तरह से उपकार ही किया है। उस दिन अंधकार की इस शक्ति की तरफ मेरा ध्यान पहली बार गया।
-'यात्राओं में झारखंडÓ पुस्तक से साभार।

बुधवार, 17 जनवरी 2018

मेरी मनोरंजक भूलें

राधाकृष्ण
जब स्कूल में नाम लिखाकर पढऩे के लायक पैसे नहीं, साथ खेलने के लायक उपयुक्त साथी नहीं, तमाम खाली-खाली वक्त और करने को कुछ काम नहीं। ऐसी हालत में कोई लड़का क्या कर सकता है? या तो वह पाकेटमारी और लफंगेबाजी करके अपनी आर्थिक स्थिति सुधारेगा या इधर-उधर फटीचरी करके अपनी तबीयत बहलाता रहेगा। उस समय रांची छोटा-सा नगर था और हां पाकेटमारी की कला विकसित नहीं हुई थी। बदमाशी को भी उस समय पेशे के रूप में नहीं लिया गया था।
 सबसे बड़ी बात यह भी थी कि मुझे ऐसे साथी भी नहीं मिले थे और मैं अपने ढंग का अकेला लड़का था। अतएव मैंने अपने मनोरंजन के लिए एक अच्छे उपाय का आविष्कार कर लिया था और उससे मेरा इतना पर्याप्त मनोरंजन होता था कि उसकी याद आने पर मैं बड़ी देर तक हंसता रहता था। करता क्या था कि जब तबीयत नहीं लगती और कुछ फटीचरी का विचार आता, तो मन बहलाने के लिए किसी दूसरे मुहल्ले में चला जाता। वहां सड़क के किनारे उपयुक्त स्थान देखकर कुछ खोजना शुरू कर देता। इधर देखता, उधर देखता, बड़ी तन्मयता के साथ किसी काल्पनिक चीज की खोज करता रहता। विस्मय प्रकाश करते हुए दूसरे लड़के आते और पूछते, क्या हुआ जी, कुछ खो गया है क्या?
मैं उदास लहजे में कहता, क्या बतलाऊं, एक रुपया था। सो, यहीं गिर गया है और खोज रहा हूं तो मिलता नहीं।
उस समय एक रुपये का अच्छा-खासा महत्व था। रुपया पाने के लोभ में वे लड़के भी लग जाते और तन्मयता के साथ खोजना शुरू कर देते। कभी-कभी एक आध बड़ी उम्र के आदमी भी आते और उस काल्पनिक रुपये को खोजने लगते। जब खोजने वाले की संख्या पांच-छह हो जाती और मैं देख लेता कि लोग रुपया पाए बिना खोजना बंद नहीं करेंगे तो मैं वहां से चुपचाप खिसक जाता और ये रुपया खोजने वाले खोजते रहते।
मैं यह भी जानता था कि यह किस्सा एक ही जगह अधिक दिनों तक चलने वाला नहीं है। इसलिए मैं दूर-दूर के मुहल्लों की यात्राएं करता। कभी इस मुहल्ले, कभी उस मुहल्ले में वहां जाकर मेरा काल्पनिक रुपया खो जाता और मैं उसे ध्यानपूर्वक खोजना शुरू कर देता। सदा की तरह उत्सुक लड़के आ जुटते, फिर बड़-बूढ़े आते और इस तरह रुपया न भुलाने का आदेश दे कर वे भी उस रुपये को खोजने लगते। मौका देखकर मैं चुपचाप फिरंट हो जाता।
इस खेल में इतना मजा आता था कि मैं रात के समय भी अकेले में हंसता रहता था। मेरा यह खेल काफी जम गया था और मैंने इस बात की ओर ध्यान भी नहीं दिया कि कुछ लड़कों ने मेरी शैतानी भांप ली है।
इस कारस्तानी के लिए जब मैं एक दिन हिंदपीढ़ी मुहल्ले पहुंचा तो एक लड़का एक लंबी सी डोर का छोर पकड़ मानो मेरे स्वागत में ही खड़ा था। मुझे देखते ही उसने कहा, या, जरा इस डोर को पकड़ कर खड़े हो जाओ, तो मैं तुम्हें एक तमाशा दिखलाऊं।
मैंने पूछा, क्या तमाशा?
उसने कहा, तुम इसे पकड़कर खड़े रहो और मैं जाकर इसका कनेक्शन ग्रामोफोन से मिला देता हूं। तब पांच मिनट में ही तुम्हें तरह-तरह के गाने सुनाई देने लगेंगे।
बड़ा कुतूहल मालूम हुआ। यह तो बड़े मजे की चीज है। मैं डोर पकड़कर खड़ा हो गया और मेरा यह अनजान मित्र एक गली में मुड़ा और ओझल हो गया।
मैं खड़ा हूं और खड़ा हूं। ग्रामोफोन की आवाज आती नहीं। कोई गाना सुनाई नहीं देता। पांच की जगह पंद्रह मिनट बीत गए। तब मुझे संदेह हुआ और मैंने गली में जाकर देखा कि उस डोर का दूसरा छोर एक दीवार की खिड़की में फंसाकर छोड़ दिया गया था। मेरे उस अनजान मित्र का पता नहीं था।
मैंने समझा कि बदला लिया गया है और मुझसे भूल हा गई है।
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धर्मयुग, 16 जनवरी, 1972

सोमवार, 8 जनवरी 2018

डोंबारी बुरू : जहां हुआ थाा अंतिम उलगुलान, पर आज है उपेक्षित

बिरसा मुंडा की अंतिम लड़ाई का गवाह उपेक्षा का शिकार
-बिरसा स्मारक बहुउद्देशीय विकास समिति ने कराया था निर्माण
-समिति के सचिव थे डॉ रामदयाल मुंडा
-तत्कालीन मंडलायुक्त सीके बसु ने किया था स्मारक का उद्घाटन
-9 जून, 1991, बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर हुआ था लोकार्पण
100 फीट ऊंचा है डोंबारी बुरू का स्मारक
30 फीट कास्य की प्रतिमा अब हो रही है जर्जर


आज से ठीक 118 साल पहले नौ जनवरी, 1900 को डोंबारी बुरू पर ब्रिटिश सेना-पुलिस और बिरसा मुंडा के आंदोलनकारियों बीच जंग छिड़ी थी








। सईल रकब से लेकर डोंबारी बुरू तक घाटियां सुलग उठी थीं। 25 दिसंबर 1899 से लेकर नौ जनवरी 1900 तक खूंटी का कई इलाका अशांत था। रांची से लेकर खूंटी-चाइबासा तक। मुंडा आंदोलनकारियों के साथ नौ जनवरी की लड़ाई अंतिम लड़ाई साबित हुई। इसके बाद बिरसा मुंडा के साथियों की धर-पकड़ तेज हो गई। बिरसा मुंडा भी तीन फरवरी, 1900 को बिरसा मुंडा गिरफ्तार कर लिए और नौ जून को उन्होंने अंतिम सांस ली।      
डोंबारी बुरू बिरसा मुंडा के जन्म स्थान उलिहातु से थोड़ी दूर है। उस ऐतिहासिक युद्ध की स्मृति में उस पहाड़ पर एक विशाल स्तंभ निर्माण मुंडारी भाषा के विद्वान जगदीश त्रिगुणायत के प्रयास से किया गया। इसके लिए बिरसा स्मारक बहुउद्देशीय विकास समिति का गठन किया गया और इस समिति के सचिव बनाए गए डॉ रामदयाल मुंडा। ऐतिहासिक लड़ाई की स्मृति को बनाए रखने के लिए स्मारक के गठन का प्रयास शुरू हुआ। इसके बाद पहाड़ पर 100 फीट ऊंचा है डोंबारी बुरू का स्मारक पत्थरों से बनाया गया। यह स्मारक दूर से दिखाई देता है। उस समय मंडलायुक्त थे सीके बसु। उन्हीं के कर-कमलों से स्मारक का उद्घाटन 9 जून, 1991 बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर किया गया था। पहाड़ की तलहटी में एक मंच भी बनाया गया और उसके पास ही 30 फीट की बिरसा मुंडा की कास्य प्रतिमा भी स्थापित की गई। कास्य प्रतिमा का निर्माण नेतरहाट के राजेंद्र प्रसाद गुप्ता ने किया है। इस साल भी अंकित है 1990। प्रतिमा तक पहुंचने के लिए सीढिय़ां बनाई गई हैं, लेकिन आज जर्जर हो चुकी हैं। लोहे की रेलिंग में जंग लग गया है। सीमेंट जगह-जगह से छोड़ रहा है। प्रतिमा का बेस कभी भी क्षतिग्रस्त हो सकता है। पिछले 28 सालों से इसका रंग-रोगन भी नहीं हुआ है।
यहीं पर एक छोटा सा मैदान भी है। एक विशाल मंच भी है। इसके बाद अंदर स्मारक तक जाने के लिए सीमेंटेड सड़क बनी है। यहां तक पहुंचने के लिए सीधी चढ़ान है। यहीं से सइल रकब भी दिखाई देता है। सरकार का विकास केवल बिरसा मुंडा के जन्मस्थल तक ही सिमट गया है, जबकि उनसे जुड़े ऐतिहासिक स्थल उपेक्षा के शिकार हैं। एक महत्वपूर्ण स्मारक, उपेक्षित है। जबकि उस समय यहां एक छोटा सा अस्पताल और स्कूल खोलने की बात भी थी। पर, बिहार के समय जो काम हुआ, राज्य बनने के बाद फिर एक ईंट भी नहीं रखी गई। अलबत्ता स्थानीय लोगों ने ग्राम पंचायत गुटुहातु, मुरहू के सौजन्य से यहां नौ जनवरी 2014 को एक पत्थलगड़ी जरूर कर दी है, जिस पर अंग्रेजों के गोलीकांड में शहीद छह लोगों के नाम दर्ज है।

शनिवार, 2 दिसंबर 2017

दो साल में भी नहीं बन सका अलबर्ट एक्‍का का स्‍मारक

बड़े ताम-झाम के साथ रांची राजधानी से 175 किमी दूर परमवीर अलबर्ट के गांव जारी में उनकी जमीन पर मुख्यमंत्री रघुवर दास ने स्मारक समाधि-शौर्य स्थल का शिलान्यास किया था। यह तारीख थी, तीन दिसबंर, 2015। तीन दिसंबर को ही अलबर्ट देश के लिए शहीद हो गए थे। साल था 1971। जारी गांव में शिलान्यास के 22 महीने बीत जाने के बाद आज तक वहां एक ईंट भी नहीं रखी गई।
यह तब है, जब अलबर्ट एक्का के शहीद होने के 44 साल बाद उनके गांव को उनकी मिट्टी नसीब हुई थी, जिस मिट्टी में खेलकूद कर बड़े हुए थे। उनकी मिट्टी त्रिपुरा से ले आई गई। मिट्टी आई तो रांची से लेकर गुमला-जारी तक उत्सव का माहौल था और इस उत्सव के दौरान ही शौर्य स्थल की नींव रखी गई और आज तक वहां एक ईंट भी नसीब नहीं हुई। सरकार शिलान्यास कर जारी गांव को भूल गई। भूली न होती तो कम से कम चैनपुर से उस गांव तक एक बेहतर सड़क बना सकती थी। चैनपुर से जारी गांव का 12 किमी का सफर तय करना किसी पथरीली चढ़ाई से कम नहीं है। जारी गांव अब प्रखंड बन गया है, लेकिन विकास से अब भी कोसों दूर है।  
एक ओर भारतीय सैनिकों के प्रति पाकिस्तान की बर्बरता को लेकर लोगों के मन में आक्रोश और दुख है। आक्रोश पाक के प्रति और दुख शहीद सैनिकों के परिवारों के प्रति। हम सैनिकों को लेकर भी राजनीति करने से बाज नहीं आते। सरकार की घोषणाएं कागजों पर ही सिमट गई है। समाधि स्थल की चारदीवारी भी नहीं की गई है। समाधि पर एक छोटा सा क्रास है। मैदान में चारों तरफ गोबर फैला रहता है। गाय-भैंसों की आवाजाही मैदान में होती रहती है।
पुश्तैनी मकान भी ढह गया
अलबर्ट जिस खपरैल के मकान में पैदा हुए थे, वह मकान भी ढह रहा है। यहां कोई नहीं रहता। कुछ गांव में ही 1994 में बने मकान में रहते थे। अब उस पुश्तैनी मकान को देखने वाला कोई नहीं। अलबर्ट एक्का की पत्नी बलमदीना एक्का रुआंसे गले से गुहार लगाती हैं कि उनका वह पैतृक खपरैल का मकान बन जाए। वह कहती हैं, उस मकान से मेरी भी यादें जुड़ी हैं। इसी मकान में अलबर्ट जवान हुए और सेना में भर्ती हुए। इसी घर में खेलते-कूदते बड़े हुए। उनकी यह निशानी है। सरकार ध्यान दे तो यह निशानी बच सकती है और यहां एक स्मारक बन सकता है।
2013 में बेटे को लगी नौकरी
अलबर्ट एक्का के एकलौते बेटे विनसेंट एक्का अपनी मां एवं अपने परिवार के साथ चैनपुर में रहते हैं। यहीं पर अपने बेटों को पढ़ाते हैं। सरकार ने बस दस क_ा जमीन दे दी। उनके बेटे ने खुद ही यहां एसबेस्टस का मकान बनाकर रहते हैं। चैनपुर में 2013 में लिपिक की नौकरी सरकार ने दी।    

अब याद नहीं आते भोजपुरी के तुलसीदस कहे जाने वाले कवि बावला

-एम. अफसर खां सागर हम फकीरों से जो चाहे दुआ ले जाए, फिर खुदा जाने किधर हमको हवा ले जाए, हम सरे राह लिये बैठे हैं चिंगारी, जो भी चाहे चरागो...